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रातों रात नायक बने केजरीवाल सरकार की हैरतअंगेज छलांग और पतन

आप नाम का हसीन ख्वाब इतनी जल्दी टूटकर बिखरने लगेगाए यकीन नहीं होता।

रातों रात नायक बने केजरीवाल सरकार की हैरतअंगेज छलांग और पतन

रातों-रात नायक बनने वाले अक्सर लोगों की आकांक्षाओं को पूरा नहीं कर पाने पर उतनी ही तेजी से अपनी आभा भी खो देते हैं। आप नाम का हसीन ख्वाब इतनी जल्दी टूटकर बिखरने लगेगाए यकीन नहीं होता। परंतु ख्वाब तो ख्वाब ही होता है। कभी.कभी ही हकीकत में बदलता है। अरविंद केजरीवाल के राजनैतिक तौर.तरीकों पर सवाल तो शुरू से उठने लगे थे परंतु वह इतनी जल्दी बेपरदा हो जाएंगेए इसकी उम्मीद नहीं थी।

लाखों.करोड़ों लोगों का भरोसा जब टूटता हैए तब बदलाव का दंभ भरकर सत्ता की दहलीज तक पहुंचने वाले ऐसे नायक तो चमक खोते ही हैंए वह उम्मीदें भी तोड़ते हैंए जिस पर लोग अपने सुनहरे भविष्य की इमारत बनाकर उसमें खूबसूरत रंग भरने का ख्वाब देख रहे होते हैं। व्यवस्था में आमूल.चूल बदलावों का सपना देखने वाले जिन करोड़ों देशी.विदेशी भारतीयों ने उनमें संभावना देखी और हर तरह का सहयोग दियाए अब वही उनसे सवाल पूछ रहे हैं।

अण्णा हजारे के चेहरे को सामने करके इंडिया एगेंस्ट करप्शन के बैनर तले बड़ा जन आंदोलन खड़ा करने वाले केजरीवाल सत्ता में आने से पहले रोजाना प्रेस कांफ्रैंस करके नेताओं और उद्योगपतियों से सैकड़ों सवाल पूछते थे परंतु अब चुप्पी साधे हुए हैं। फरवरी 2015 के विस चुनाव में उन्होंने चमत्कारिक छलांग लगाई थी। दिल्ली की जनता ने 70 में से ६७ सीटें देकर उन पर आंख मूंदकर पूरा भरोसा किया था परंतु उस जनादेश का गलत अर्थ निकालकर उन्होंने एक के बाद एक कई गलतियां कीं।

अण्णा हजारे के शब्दों में कहें तो उन्हें यह भ्रम हो गया कि अब वह देश के प्रधानमंत्री बन सकते हैं। इस भ्रम ने उनसे लगातार गलतियां कराईं। राजनीति के विद्यार्थियों के लिए यह शोध का विषय है कि जिस पार्टी ने अल्प समय में इतनी चमत्कारिक छलांग लगाई होए उसका इतनी जल्दी राजनीतिक पतन क्यों और कैसे हुआ। पता नहीं किस संदर्भ में केजरीवाल ने खुद को अराजक बताया था परंतु उन्नीस फरवरी की रात को उनके सरकारी आवास पर उनकी मौजूदगी में दिल्ली के मुख्य सचिव अंशु प्रकाश के साथ जो कुछ हुआए वह उनके अहम की ही नहींए अराजकता की भी पराकाष्ठा है। दिल्ली के सबसे बड़े नौकरशाह के साथ यदि सीएम आवास में विधायक धक्कामुक्कए मारपीट और हद दर्जे की बदसलूकी करें और मुख्यमंत्री खामोश बने रहें तो इसका क्या मतलब निकलता हैघ् जो भी उस दिन हुआए जाहिर है पूर्व नियोजित था। तीन.तीन बार मुख्य सचिव को फोन करना। उन्हें उसी दिन रात में बारह बजे अकेले मुख्यमंत्री आवास पर बुलाना और वहां विज्ञापन जारी नहीं करने के सवाल पर उनके साथ मारपीट करना क्या मामूली घटना हैघ् मुख्य सचिव सर्वोच्च न्यायालय के एक आदेश का पालन कर रहे थे और हर संभव दबाव के बावजूद वो विज्ञापन जारी करने को तैयार नहीं हुए थेए जो मुख्यमंत्री को नागवार गुजरा। मारपीट का खुलासा होने पर इस घटनाक्रम को जिस तरह दूसरा रंग देने की कोशिश की गईए वह और भी दुर्भाग्यपूर्ण है। कहा गया कि मुख्य सचिव दो लाख लोगों को राशन वितरित नहीं होने दे रहे थेए इसलिए तू.तू मैं.मैं की नौबत आई। मारपीट जैसी कोई घटना नहीं घटी। आप नेताओं के इस झूठ की कलई मेडीकल रिपोर्ट ने खोल दीए जिसमें कहा गया है कि अंशु प्रकाश के चेहरे पर सूजन भी है और कट के निशान भी। मुख्यमंत्री की मौजूदगी में मुख्य सचिव के साथ मारपीट करने के अपराधी दोनों विधायकों को तिहाड़ जेल भेजा जा चुका है। जांच की आंच मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री सहित उन सारे विधायकों तक भी पहुंच रही हैए जो वहां मौजूद थे और मारपीट को नहीं रोकने के अपराधी हैं। पुलिस सीएम हाउस की सीसीटीवी फुटेज और उपकरण सीज कर चुकी है। आईएएस एसोसिएशन मुख्य सचिव के साथ मारपीट से काफी खफा है। मामला उपराज्यपालए गृह मंत्रीए प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति तक पहुंच चुका है। दिल्ली में अफसरों और सरकार में बैठे लोगों के बीच जैसे हालात बन गए हैंए वैसे शायद स्वतंत्र भारत के इतिहास में कभी निर्मित नहीं हुए। अविश्वास का आलम यह है कि कोई अधिकारी उन बैठकों में शामिल नहीं हुआए जो मंत्रियों ने आहूत कीं। अफसरों ने फोन तक रिसीव नहीं किए। अधिकारी और कर्मचारी हड़ताल पर चले गए। यह और भी हैरतंगेज है कि गलती मानने के बजाय इसके पीछे आम आदमी पार्टी के नेता भारतीय जनता पार्टी का हाथ बता रहे हैं। भाजपा नेता पलटकर उनसे सवाल कर रहे हैं कि क्या केजरीवाल ने भाजपा के कहने पर मुख्य सचिव को आधी रात को अकेले अपने आवास पर बुलाया था। विधायकों के जरिए उनसे मारपीट क्या भाजपा ने करवाई है घ् इससे भी दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि मारपीट के दोषी विधायक अमानतुल्ला की गिरफ्तारी को साम्प्रदायिक रंग देने की कोशिश की गई। विधायक जब टीवी चैनलों पर झूठ बोलते हुए सफाई दे रहे थेए तब उनके सिर पर गोल टोपी नहीं थी परंतु जब पुलिस ने उन्हें अदालत में पेश किया तो वह गोल टोपी लगाकर मुसलमान बन गए। आप नेताओं ने बयान दिए कि मोदी सरकार मुसलमानों के खिलाफ काम कर रही है। किसी नेता अथवा राजनीतिक दल को झूठ बोलने और चीजों को दूसरा रंग देने की जरूरत कब पड़ती हैए शायद बताने की जरूरत नहीं है। पूरी दिल्ली को वाई.फाई से जोड़ने से लेकर ऐसे तमाम वादे तीन साल बीत जाने के बाद भी केजरीवाल सरकार धरातल पर नहीं उतार सकी हैए जिनके बल पर वोट हासिल करके वह विपुल बहुमत के साथ सत्ता में लौटी थी। जमीन पर ऐसा कुछ दिखाई भी नहीं दे रहा हैए जिससे लगे कि उनके सत्ता में आने से दिल्ली में किसी तरह के बदलाव हुए हैं। इसलिए विज्ञापनों के जरिए अपनी और सरकार की हवा बनाना चाहते हैं। सर्वोच्च न्यायालय सरकारी विज्ञापनों को लेकर कुछ दिशा.निर्देश जारी कर चुका है। मुख्य सचिव सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन कर रहे हैं। इस सरकार की निगाहों में शायद यही उनका कसूर बन गया है। केजरीवाल सरकार को विज्ञापनों के जरिए ढिंढोरा पिटवाने की जरूरत क्यों पड़ रही हैए यह समझने की जरूरत है। पंजाब विधानसभा का चुनाव वह बुरी तरह हारे हैं। दिल्ली में तीनों नगर निगम के चुनाव में असफलता हाथ लगी है। राजौरी गार्डन सीट के उप चुनाव में आप उम्मीदवार की जमानत भी नहीं बची। हांए बाहरी दिल्ली का एक विधानसभा उप चुनाव वह जरूर जीतने में सफल रही है। लेकिन गुजरात चुनाव में उन्होंने जितने प्रत्याशी खड़े किएए उन सबकी जमानत जब्त हो गई। पार्टी के भीतर जबरदस्त असंतोष पनप रहा है। शाजिया इल्मीए योगेन्द्र यादवए प्रशांत भूषण जैसे चेहरे तो काफी समय पहले पार्टी से बाहर जा चुके हैं। राज्यसभा चुनाव के समय कुमार विश्वास को जिस तरह बेइज्जत किया गयाए उससे अंदरूनी कलह और मुखर हो गई है। अब तो खुलेआम यह आरोप लगने लगे हैं कि तीन.चार लोगों की टोली सारे फैसले ले रही है और आम आदमी पार्टी में लोकतंत्र नाम की चीज बची ही नहीं है। चाहे चंदे को लेकर परादर्शिता नहीं बरते जाने का आरोप हो या फैसलों में मनमानी का आरोपए केजरीवाल जवाब नहीं दे पा रहे हैं। पार्टी का विस्तार तो छोड़िएए जो जमा पूंजी है उसे बचाने में भी उन्हें अब पसीने छूट रहे हैं। इस तरह की बढ़ती घटनाओं के मूल में यही सब कारण हैं।

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