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मुख्य सचिव अंशु प्रकाश पिटाई मामला: आखिर जवाबदेही किसकी?

दिल्ली के मुख्य सचिव अंशु प्रकाश को मुख्यमंत्री के सरकारी आवास पर मध्य रात्रि बुलवाकर विधायकों के द्वारा बदसलूकी का मामला अपने आप में अकल्पनीय और शर्मनाक है।

मुख्य सचिव अंशु प्रकाश पिटाई मामला: आखिर जवाबदेही किसकी?

दिल्ली के मुख्य सचिव अंशु प्रकाश को मुख्यमंत्री के सरकारी आवास पर मध्य रात्रि बुलवाकर विधायकों के द्वारा बदसलूकी का मामला अपने आप में अकल्पनीय और शर्मनाक है। ऐसी घटना पहले न कभी देखी गई और न सुनी गई। तो क्या अब कोई शक-शुबहा बचा है जिसके आधार पर कहा जा सके कि दिल्ली सरकार अपने आप में अराजकतावादी नहीं है।

संकेत साफ है कि अंशु प्रकाश जैसे वरिष्ठ, ईमानदार और नियमों का सख्ती से पालन करने और करवाने वाले नौकरशाह से बदतमीजी करने के लिए ही देर रात में बैठक बुलाने का बहाना किया गया था। हालांकि, कहने को बैठक दिल्ली में राशन वितरण जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे पर बुलाई गई थी। क्या यह बैठक दिन में कार्यालय में ही या कम से कम काम के समय में ही आयोजित नहीं हो सकती थी? हां, आपातकालीन स्थिति में बैठक रात में भी बुलाई जा सकती थी।

इस तरह की बैठकें होती ही रहती हैं। इसमें कुछ भी गलत नहीं है, लेकिन बैठक में तो सचिव और संबंधित मंत्री ही होते हैं। विधायकों को ‘दाल-भात में मूसलचंद’ की हैसियत से वहां बुलाने की क्या ज़रूरत थी। संभवत: यहां पर सारी पटकथा पहले से ही तैयार कर ली गई थी। सत्ता के नशे में चूर केजरीवाल, उनके मंत्रियों और विधायकों को तो बस अराजकता की स्थिति पैदा करनी है!

वे अपने निकम्मेपन दिखाने से बाज नहीं आ रहे। अब इन्हें किसी ने यह भी समझा दिया है कि एफएम रेडियो पर अपने विज्ञापन करके ये बहुत बड़ा काम कर सकते हैं, इसलिए इनके मुखिया अरविंद केजरीवाल और उनके सखा मनीष सिसोदिया बार-बार एफएम रेडियो पर प्रवचन देते हुए सुने जा सकते हैं। खैर, ये इनका आंतरिक मामला है।

बहरहाल, अब किसी को संदेह नहीं होना चाहिए कि केजरवाली एंड कंपनी किसी के साथ मिलकर लोकतांत्रिक ढंग से काम कर ही नहीं सकते। न उप राज्यपाल के साथ, न केंद्र सरकार के साथ और न ही नौकरशाहों के साथ। इनकी नजरों में सब चोर हैं, बस सिर्फ आप वाले ही दूध के धुले हैं। ये नजीब जंग के साथ काम नहीं कर सके। अब अनिल बैजल से भी रोज लड़ते ही रहते हैं।

अब मुख्य सचिव अंशु प्रकाश को मारा, इससे पहले दिल्ली की महिला कार्यकारी मुख्य सचिव शकुंतला गैमलिन को भ्रष्ट बताया। गैमलिन ने केजरीवाल से पूछा था कि उन्हें बिना साक्ष्यों के भ्रष्ट क्यों कहा गया। तब केजरीवाल गायब हो गए। गैमलिन की नियुक्ति पर केजरीवाल कह रहे थे कि उन्हें दिल्ली के उप राज्यपाल नजीब जंग उनकी पसंद का मुख्यसचिव नहीं दे रहे।

हालांकि, जंग का कहना था कि दिल्ली सरकार को शंकुतला गैमलिन के रूप में एक योग्य अफसर को दिया गया है। दिल्ली सरकार को उनसे कार्यकारी मुख्य सचिव के रूप में काम लेना चाहिए। उन्हें गैमलिन पर तमाम आरोप लगाने से बचना चाहिए। आपको याद होगा कि उस विवाद के कारण भी दिल्ली सरकार का कामकाज पंगु हो गया था। अंशु प्रकाश से मारपीट के बाद पूर्व रक्षा सचिव अमिताभ पांडे की कठोर प्रतिक्रिया को समझा जा सकता है।

वे कहते हैं कि ‘आप के नेताओं का आचरण लफंगों वाला है। अंशु प्रकाश बेहद भद्र अधिकारी हैं। उन्हें जानने वाले यह मान ही नहीं सकते हैं कि वे अभद्र व्यवहार किसी के साथ भी करेंगे। दिल्ली सरकार के शिखर अफसर के साथ मारपीट की घटना का होना अविश्वसीय है।’ अंशु प्रकाश के साथ मारपीट करने वाले विधायकों के सरगना आम आदमी पार्टी के बदनाम विधायक एवं वक्फ बोर्ड के पूर्व चेयरमैन अमानतुल्ला खान थे।

उन पर भ्रष्टाचार के तमाम आरोपों के बीच तत्कालीन उप राज्यपाल नजीब जंग ने दिल्ली वक्फ बोर्ड भंग कर दिया था। अक्टूबर 2016 में इसकी जांच सीबीआई से कराने के आदेश दिए थे। भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे अमानतुल्लाह खान मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के परम प्रिय हैं। उनके लिए केजरीवाल ने कुमार विश्वास सरीखे लोकप्रिय नेता को ही नजरअंदाज कर दिया था।

आपको पता होगा कि कुमार विश्वास पर भी अमानतुल्लाह खान ने आरोप लगाए थे। अंशु प्रकाश से मारपीट के बाद कुमार विश्वास ने अरविंद केजरीवाल और अन्य पर तंज कसा है। कुमार विश्वार ने डॉ. नवाज देवबंदी के एक शेर को ट्वीट किया। उन्होंने लिखा, ‘जो झूठ बोल के करता है मुतमईन सबको, वो झूठ बोल के खुद मुतमईन नहीं होता।’

आप समझ सकते हैं कि केजरीवाल से किस हद तक दूर जा चुके हैं उनके अपने घनिष्ठतम मित्रगण। आजाद भारत ने टीएन कौल, पीएन हक्सर, ज्ञान प्रकाश, के. सुब्रमण्यम, अजीत योगी, सरीखे बीसियों शानदार सरकारी अफसर देखे हैं। कई सरकारी बाबू अपने सेवाकाल में ही या फिर सेवा से रिटायर होने के बाद राजनीति में गए। उन्होंने राजनीति के मैदान में भी अपनी शानदार पारी खेली, कई अभी भी खेल ही रहे हैं।

इनमें सत्यपाल सिंह, हरदीप पुरी, यशवंत सिन्हा, आरके सिंह, आरसीपी सिंह आदि शामिल हैं। ये अपनी ब्यूरोक्रेसी के दिनों के अनुभव से सांसद और मंत्री के रूप में अपने कार्य को और बेहतर करके दिखाते रहे हैं। यहां पर दो बातें साफ है। पहली, सरकार के कार्यक्रम और योजनाओं को लागू करने का काम नौकरशाही पर ही होता है। भारतीय संविधान ने विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की सीमायें लगभग तय करके रखी हैं।

यदि इन्हें काम करने ही नहीं दिया जाएगा तो फिर काम कौन करेगा? कौन सरकारों की जनकल्याकारी नीतियों और कार्यक्रमों को लागू करेगा? यह कहना भी सही नहीं होगा कि सरकारी विभागों में अब सब कुछ सुधर चुका है। वहां पर काम करना अब भी कुछ बाबू अपनी शान के खिलाफ समझते हैं। ये सारा दिन अगली छुट्टियों पर व्यर्थ की बहस करने में ही निकाल देते हैं, इसलिए विधायिका और कार्यपालिका को मिल-जुलकर काम करना सीखना होगा।

दूसरी, किसी भी हालत में भ्रष्ट नौकरशाहों को या भ्रष्ट राजनेताओं और मंत्रियों को भी माफ नहीं किया जा सकता। अब अखिल भारतीय सेवाओं के काहिल,नकारा और निकम्मे सरकारी बाबुओं को और झेलने के मूड में नहीं है मोदी सरकार। विगत दिनों सरकार ने छतीसगढ़ कैडर के दो आईपीएस अफसरों की सेवाएं समाप्त करके यह स्पष्ट संकेत दे भी दिया है।

आजादी के बाद भ्रष्ट अफसरों पर इतनी सख्त कार्रवाई शायद ही हुई हो। यानी अब अपने कर्तव्यों का सही प्रकार से निर्वाह करो, नहीं तो जाओ वापस अपने घर। अब सरकार भ्रष्ट और संदिग्ध छवि वाले अफसरों को बख्शने के लिए कतई तैयार नहीं दिखती, पर अंशु प्रकाश तो जाने माने बेदाग और निर्भीक अधिकारी रहे हैं। उनके जानने वाले यह बताते हैं कि अंशु का करियर खुली किताब की तरह का ही रहा है। उन्हें कोई प्रलोभन नहीं दे सकता। वे कभी भी नियमों के विरुद्ध कतई नहीं जाते। तो क्या इसलिए ही उन्हें मारा-पीटा गया? जवाब तो देना होगा केजरीवाल को।

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