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प्रो. रणबीर सिंह का लेख : चौ. बंसीलाल की दूसरी पारी और राजनीतिक सरगर्मियां

चौधरी बंसीलाल की मुख्यमंत्री के रूप में पहली पारी में 1969 और 1970 में अपनी सरकार बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ा वहीं दूसरी पारी में उनके राज को कोई चुनौती देने वाला नहीं बचा। चौधरी रणबीर सिंह की टिकट काटने और ओमप्रभा चुनाव के चुनाव हारने के साथ ही चौधरी बंसीलाल चैन की बंसी बजाने की पॉजिशन में आ चुके थे।

हरियाणा की कहानी: प्रोफेसर रणबीर सिंह।
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हरियाणा की कहानी: प्रोफेसर रणबीर सिंह।

प्रो. रणबीर सिंह

मार्च 1972 से 30 नवंबर 1975 तक हरियाणा का राजनीतिक कालखंड चौधरी बंसीलाल के एकछत्र राज करने का था। चौधरी बंसीलाल की मुख्यमंत्री के रूप में पहली पारी में 1969 और 1970 में अपनी सरकार बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ा वहीं दूसरी पारी में उनके राज को कोई चुनौती देने वाला नहीं बचा। चौधरी रणबीर सिंह की टिकट काटने और ओमप्रभा चुनाव के चुनाव हारने के साथ ही चौधरी बंसीलाल चैन की बंसी बजाने की पॉजिशन में आ चुके थे। कांग्रेस पार्टी के शीर्ष नेतृत्व का विश्वास भी वो हासिल कर चुके थे इसलिए केंद्र से मनमाफिक जरूरत भी उनकी तत्काल पूरी हो रही थी।

इंदिरा गांधी के वे खासे विश्वासपात्र सिपहसालार बन चुके थे। राज्यपाल बीए चकवर्ती के साथ भी उनके बहुत मधुर संबंध थे और हरसंभव सहयोग वो उन्हें देते थे। इस पारी के दौरान चौधरी बंसीलाल ने खुलकर बैटिंग की। नौकरशाही और अफसरशाही की लगाम को उन्होंने कसकर पकडा और अधिकारियों में जनता के प्रति जवाबदेही का डर पैदा हुआ। केंद्र से और योजना आयोग से पहले से ज्यादा धनराशि हरियाणा को मिलने लगी थी। राज्यमंत्री चंद्रावती ने उन्हें तेवर दिखाने की कोशिश की तो चौधरी बंसीलाल ने उन्हें बर्खास्त कर दिया। चौधरी भजनलाल ने बायॅपास होकर पार्टी आलाकमान से संबंध बनाने की कोशिश की तो उन्हें भी पार्टी से त्यागपत्र देने को मजबूर कर दिया। हरियाणा लोकसेवा आयोग के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने अपने विश्वासपात्र चौधरी हरफूल को नियुक्त करवाया। कर्मचारी चयन आयोग के अध्यक्ष के रूप में वे पहले ही अपने चहेते मुंशीराम को नियुक्त करवा चुके थे। युवा कांग्रेस का नियंत्रण पूरी तरह से उनके बेटे चौधरी सुरेंद्र सिंह के हाथों में आ चुका था। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ साथ अब चौधरी बंसीलाल संजय गांधी के भी विश्वासपात्र बन चुके थे।

इसका सकारात्मक प्रभाव तो ये हुआ कि हरियाणा में विकास ने गति पकड ली। अपने पहले कार्यकाल में वे देश में सबसे पहले हरियाणा राज्य को पूर्ण विद्युतीकरण के राज्य का दर्जा दिलवा चुके थे। विकास के आधारभूत ढांचे को मजबूत करने में चौधरी बंसीलाल जुट गए थे। सिंचाई की नई योजनाएं लागू की गई। हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय और कृषि विभाग के प्रयासों से उन्होंने हरित क्रांति को और तेजी प्रदान कर दी थी। हरियाणा में औद्योगिक विकास भी और तेज गति से होने लगा था। हरियाणा जो पहले पंजाब से पिछडा हुआ इलाका था, अब देश के सबसे विकसित राज्यों की होड में शामिल हो गया था। मारूति उद्योग की स्थापना से हरियाणा में औद्योगिक माहौल बना। राज्य में दूध के रूप में श्वेत क्रांति लाने में भी चौधरी बंसीलाल का अहम योगदान रहा। अपने कामों के बूते उन्हें विकास पुरुष भी कहकर पुकारा जाने लगा था। इसी के विपरित एक पहलू और भी था। ये पहलू था राज्य में निरंकुश व्यवस्था का स्थापित होना। एक अधिनायकवादी प्रवृति और चौधरी बंसीलाल के अकडू स्वभाव के चलते मंत्रियों की स्थिति काफी कमजोर हो गई थी। किसी भी अधिकारी या कर्मचारी का तबादला मुख्यमंत्री की स्वीकृति के बिना नहीं किया जा सकता था। तब ये कहावत हो गई थी कि हरियाणा में एक कहावत हो गई थी तब कि हरियाणा में एक मंत्री है बाकी तो सब संतरी हैं। मंत्री मतलब मुख्यमंत्री था। मुख्यमंत्री का सचिवालय इतना अधिक मजबूत था कि मुख्य सचिव की तुलना में मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव अधिक शक्तिशाली थे। जिलो के उपायुक्तों के पास अथाह पावर थी और वे मुख्यमंत्री के अलावा किसी की नहीं सुनते थे।

बताते हैं चौधरी बंसीलाल सोने से पहले सभी जिलों के उपायुक्तों से बात किया करते थे। इसके कारण जिलों में नौकरशाही हावी हो गई थी और नेता हाशिए पर चले गए। मंत्रियों, सांसदों और विधायकों को कोई पूछने वाला नहीं था। अधिकतर नगर परिषदों में प्रशासक नियुक्त हो गए थे। अधिकतर को भंग कर दिया गया था और कहीं अवधि पूरी हुई तो चुनाव नहीं करवाए गए थे। जिला परिषदों को तो मुख्यमंत्री ने समाप्त ही कर दिया था और उनकी सारी पावर उपायुक्तों को दे दी थी। इस तरह के फैसलों ने हरियाणा की पंचायती राज व्यवस्था को भी काफी चोट पहुंचाई। जबकि उस समय चौधरी माडूराम की अध्यक्षता में बनी कमेटी ने सुझाव दिया था कि महाराष्ट्र की तर्ज पर जिला परिषदों को मजबूत बनाया जाए पर चौधरी बंसीलाल ने इस सुझाव को नहीं माना और विपरित काम किया।

इसके अलावा सरकार ने सारे कर्मचारी नेताओं को भी अपने खिलाफ कर लिया। मास्टर की मरोड और रोड का मोड तो बंसीलाल छोडता ही नहीं जैसी कहावतें तब काफी लोकप्रिय हो गई थी। अध्यापक आंदोलन को चौधरी बंसीलाल ने सख्ती से कुचलते का प्रयास किया वहीं बिजली कर्मचारियों पर उनकी नजरें टेढी होती थी। अध्यापक संघ के कई नेताओं को मुकदमें झेलने पडे। इतना ही नहीं उनके पुत्र सुरेंद्र सिंह पर भी दमन के आरोप लग रहे थे।इन दोनों पहलुओं को देखते हुए भी चौधरी बंसीलाल के विकास कार्यों के प्रति जुनून को कम करके नहीं आंका जा सकता है। उन्हें आधुनिक हरियाणा के निर्माता की संज्ञा देना भी गलत नहीं है। शिक्षा के विकास में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। उन्होंने न केवल कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के साथ राज्य के सभी कॉलेजों को जोडने का फैसला लिया बल्कि महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय की भी स्थापना की। वे पूरे हरियाणा को एक नजर से देखते थे और किसी क्षेत्र विशेष पर फोकस नहीं करके पूरे हरियाणा के विकास का टारगेट सामने रखा। इससे पूर्व हरियाणा के कालेज पंजाब विश्वविद्यालय से संबंधित थे।

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