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विवेक कुमार बडोला का लेख: चौथे चरण में बढ़ेंगी चुनौतियां

सच यह है कि गैर-भाजपाई राज्यों के मुख्यमंत्री महामारी में बंद को बढ़ाने अथवा नहीं बढ़ाने, चरणबद्ध तरीके से बंद खोलनेे के प्रधानमंत्री के दृष्टिकोण से पूरी तरह सहमत नहीं हैं।

विवेक कुमार बडोला का लेख: चौथे चरण में बढ़ेंगी चुनौतियां

क ल प्रधानमंत्री की मुख्यमंत्रियों के साथ वीडियो वार्ता में जो मूल बात निकलकर सामने आई वो यही है कि देश अब बंद के चौथे चरण में प्रवेश करने जा रहा है। पांच राज्यों के मुख्यमंत्री अभी भी बंद को जारी रखना चाहते हैं। स्पष्ट है इनमें वे ही राज्य शामिल हैं जहां कोरोना संक्रमण का आंकड़ा बढ़ता ही जा रहा है। इन राज्यों में महाराष्ट्र, बिहार, पंजाब, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल शामिल हैं। पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और तेलंगाना ने 12 मई से ट्रेनें चलाने का विरोध भी किया। राजस्थान और केरल के मुख्यमंत्री लॉकडाउन की राज्य स्तरीय अनुपालना करना चाहते हैं। नहीं भी कहें तो सच यह है कि गैर-भाजपाई राज्यों के मुख्यमंत्री महामारी में बंद को बढ़ाने अथवा नहीं बढ़ाने, चरणबद्ध तरीके से बंद खोलनेे के प्रधानमंत्री के दृष्टिकोण से पूरी तरह सहमत नहीं हैं।

इस महासंकट के समय में मुख्यमंत्रियों को तुच्छ राजनीति छोड़ केंद्र द्वारा कोरोना के विरुद्ध छेड़े गए हर युद्ध में हरसंभव तरीके से सहयोग करना चाहिए। वैसे प्रधानमंत्री ने 15 मई को समाप्त हो रहे बंद के तृतीय चरण के बाद देश में आर्थिक गतिविधियां आरंभ करने के पक्ष में अपने विचार रखे। उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि राज्य सरकारें कोरोना संक्रमण को गांवों तक पहुंचने से रोकने की कार्यनीतियां बनाएं। प्रवासी श्रमिकों का अपने गांव लौटने का सिलसिला निरंतर चल रहा है। विशेषकर यदि गांव पहुंचने वाले कुछ लोगों में अभी नहीं तो 21 दिन या महीने भर बाद, कोरोना के लक्षण दिखते है तो इससे कोरोना के विरुद्ध छिड़ा राष्ट्रव्यापी युद्ध धराशायी भी हो सकता है। अतः राज्य सरकारों पर यह भारी दायित्व है कि वे गांव पहुंचे प्रवासी श्रमिकों की समुचित चिकित्सकीय जांच करें। उनके पृथक-आवासीकरण की उपयोगी व्यवस्था करें। उन्हें सामाजिक दूरी के नियमों का पालन करवाना सिखाएं। उनकी जीविका एवं उनके बच्चों की शिक्षा-स्वास्थ्य-पोषण के लिए सफल कार्ययोजनाएं बनाएं। जब तक यह कार्य नहीं होंगे तब तक गांवों को संक्रमण से मुक्त नहीं रखा जा सकता।

कोरोना के विरुद्ध छिड़े राष्ट्रव्यापी युद्ध की चुनौतियां हर चरण के साथ बढ़ती जा रही हैं। गत सोमवार को पहली बार एक दिन में 5213 कोरोना रोगियों का पता चला और 97 लोगों की मृत्यु हुई। इससे पहले एक दिन में 3900 रोगियों की पहचान हुई थी। इस आंकड़े के साथ पूरे देश में अब तक 71336 रोगी कोरोना पॉजिटिव पाए गए हैं। इनमें से 2206 लोगों की मृत्यु हुई है। ठीक हुए रोगियों की संख्या 20917 है। देश में अब तक 16.73 लाख रक्त नमूनों की जांच की गई है। डेढ़ अरब से अधिक जनसंख्या वाले देश में 16 लाख रक्त नमूनों की जांच उत्साहजनक नहीं हैं। प्रति दस हजार नागरिकों पर पंजीकृत मान्यता प्राप्त चिकित्सों की अति न्यून संख्या को ध्यान में रखते हुए आशा की भी नहीं जा सकती कि सभी नागरिकों के रक्त के नमूने सरकारी चिकित्सा तंत्र के प्रयास से एकत्र किए जाएं। भारत सरकार के पास विशाल जनसंख्या को कोरोना के आक्रमण से बचाने को जो एकमात्र उपाय था, वह लॉकडाउन ही था। लॉकडाउन का तीसरा चरण समाप्त होने वाला है, यानी 15 मई तक भारत देश को बंद हुए पूरे 52 दिन हो जाएंगे। दिल्ली सहित चार-पांच राज्यों में कोरोना के रोगियों की बढ़ती संख्या को देखते हुए अखिल भारतीय रेल और वायु परिवहन को धीरे-धीरे खोलना भी आशंकित ही करता है। सरकारी और निजी कार्यालयों, कारखानों और अन्य उपक्रमों को भी चरणबद्ध ढंग से खोलने के विचार पर भारतीय लोगों की अधीरता और भीड़ बढ़ाने की आदत की शंका भारी पड़ रही है। इन परिस्थितियों में केंद्र सरकार के पास बंद को चौथे चरण तक खींचने के अतिरिक्त कोई अन्य उपाय नहीं है।

स्वयं प्रधानमंत्री, देशी-विदेशी अनेक वैज्ञानिक एवं चिकित्सा विशेषज्ञ अपने-अपने वक्तव्यों में बता ही चुके हैं कि लोगों को अपनी नई जीवनशैली बनानी पड़ेगी और उन्हें कोरोना के साथ ही जीने का व्यवहार अपनाना पड़ेगा। यानी लोगों को लॉकडाउन अवधि में अपनाई जाने वाली सामाजिक दूरी, मास्क पहनने, स्वच्छता का अतिरिक्त ध्यान रखने, इत्यादि जीवन व्यवहारों को अपना स्थायी जीवन व्यवहार बनान होगा। जीवन में बने-रहने के लिए लोगों को ऐसा करना ही होगा। इन परिस्थितियों में देखने वाली बात यह होगी कि कोरोना संक्रमण से बचने के क्रम में दीर्घकालिक पूर्ण या अर्द्ध भारतबंदी में लोग अपनी जीवनचर्या को किस दृष्टिकोण से निर्धारित करेंगे। जीविका संबंधी कार्यों, शिक्षा, स्वास्थ्य, खेती-किसानी, स्वरोजगार, बाजार, रेल व हवाई परिवहन तथा स्थानीय परिवहन व्यवस्थाओं, इत्यादि जनजीवन संबंधी गतिविधियों को अब स्वास्थ्य मानकों के अनुरूप तैयार करते हुए अत्यंत संवेदशीलता और जागरूकता के साथ निपटाना होगा। हर व्यवस्था के प्रबंधकों, कर्मचारियों और व्यवस्था के प्रमुख अंग जनता को अपने कार्य व्यवहार, जीवनचर्या, दिनचर्या और सार्वजनिक व्यवस्था के लिए बाधा उत्पन्न करनेवाली निजी आदतों पर कठोर नियंत्रण रखना होगा। जब तक ऐसा आचरण हमारे व्यक्तित्व में समाहित नहीं होगा तब तक कोरोना पर पूर्ण विजय का संकल्प साकार नहीं हो सकता।

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