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बरकरार हैं औद्योगिक मोर्चों पर चुनौतियां

चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही के आंकड़े कुछ माह पूर्व जारी हुए थे।

बरकरार हैं औद्योगिक मोर्चों पर चुनौतियां

नई दिल्ली. चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही के आंकड़े कुछ माह पूर्व जारी हुए थे तब केंद्र सरकार ने उसे अपने द्वारा उठाए गए कदमों की सफलता के तौर पर प्रचारित किया था, लेकिन विश्लेषकों ने कोईजल्दीबाजी नहीं दिखाई थी। दरअसल, उसके पीछे कृषि और निर्यात क्षेत्र का बेहतर प्रदर्शन रहा था। इस वर्ष मानसून बेहतर रहा है, जिससे कृषि को फलने-फूलने का मौका मिला और वहीं रुपये का अवमूल्यन होने से निर्यात में वृद्धि हुई है।

विश्लेषक मान रहे थे कि भारतीय अर्थव्यवस्था के समक्ष असली चुनौती अभी बरकरार है। और वह शुक्रवार को सामने आई जब केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (सीएसओ) ने औद्योगिक उत्पादन के आंकड़े जारी किए। विनिर्माण और उपभोक्ता सामान वर्ग में उत्पादन घटने से नवंबर में औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) एक साल पहले की तुलना में 2.1 प्रतिशत गिर गया। पिछले छह महीनों के दौरान औद्योगिक क्षेत्र का यह सबसे खराब प्रदर्शन है।

इससे पहले मई में औद्योगिक उत्पादन में ढ़ाई फीसद की कमी दर्ज की गई थी। अर्थव्यवथा उद्योगों के मोर्चे पर संघर्षकर रही है। जब तक देश में औद्योगिक सुस्ती बनी रहेगी। विकास दर में बेहतरी की उम्मीद बेमानी ही रहेगी। सत्ता पक्ष वित्त वर्ष2013-14 में जीडीपी विकास दर को पांच फीसदी करने की बात कर रहा है, लेकिन उसे यह समझना होगा कि उद्योगों की सूरत को संवारे बिना यह दूर की कोड़ी ही बनी रहेगी। केंद्र सरकार को ऐसे फैसले लेने होंगे, जिससे उद्योग जगत में छाई निराशा दूर हो सके। हालांकि देखा जाए तो केंद्र सरकार इस वर्ष बहुत कुछ कर नहीं पाई है।

वह अपने सरकार को बचाने, भ्रष्टाचार के आरोपों और महंगाई के सवालों में ही उलझी रही। वहीं साल के अंत में चार राज्यों के चुनावों के कारण भी अर्थव्यवस्था के इस बड़े सेक्टर पर बहुत चर्चा नहीं हो पाई। और अब जब वित्त वर्ष खत्म होने में कुछ ही माह शेष हैं तब थोड़ी उम्मीद की जा सकती थी कि सरकार माहौल सुधारने के लिए लंबित कायरें को तेजी से पूरा करती पर आम चुनाव दहलीज पर हैं।

और जिस तरह के समीकरण बन रहे हैं उससे प्रतीत होता हैकि उसकी तरफ से औद्योगिक मंदी को दूर करने के लिए कोई नये कदम शायद ही उठाए जायेंगे! ऐसे में रिर्जव बैंक से ही उम्मीद की जा सकती है। 28 जनवरी को रिर्जव बैंक को निवेश और मांग को बढ़ावा देने वाली नीतियों को ध्यान में रखकर ही मौद्रिक नीति समीक्षा करनी चाहिये। उद्योग रोजगार का बड़ा जरिया है। मंदी ज्यादा दिनों तक बनी रही तो रोजगार के मोर्चे पर पहले से ही जूझते देश के सामने और बड़ी चुनौती आ सकती है।

प्रधानमंत्री कह चुके हैं कि रोजगार का सृजन उनकी सरकार की विफलता रही है। उद्योग चैंबर फिक्की के अध्यक्ष सिद्धार्थ बिड़ला इसे भयंकर मंदी का संकेत मानते हैं। केंद्र सरकार दावा करती रही हैकि उसने कई बड़े कदम उठाए हैं परंतु आंकड़े यह दर्शाते हैं कि कथित कोशिशों में वह पूरी तरह नाकाम रही है। जब सरकार को पता है कि रोजगार देने वाले और अर्थव्यवस्था में अहम भूमिका निभाने वाले उद्योगों की दशा दिन पर दिन खराब होती जा रही है तो पहले से कारगर कदम क्यों नहीं उठाए गये? यह प्रश्न तो उठता ही है।

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