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सतीश का लेख : फंसे कर्ज की चुनौती

कोरोना महामारी के कारण फिलहाल ऋण की लागत बढ़ गई है साथ में बैंकों (Banks) का एनपीए बढ़ने की संभावना है। अगर ऋण ईएमआई स्थगन यानी मोरेटोरियम अगस्त महीने में समाप्त होती है तो परिसंपत्ति गुणवत्ता के बारे में स्पष्टता सितंबर तिमाही में सामने आ जाएगी। सरकारी बैंक कोरोना से निपट सकें इसके लिए सरकार, बैंकों को स्वतंत्र निदेशक खुद चुनने का अधिकार दे सकती है ताकि सरकारी बैंकों को यह अधिकार मिलने से वे ऋण खातों का पुनर्गठन कर पाएं।

सतीश का लेख :  फंसे कर्ज की चुनौती
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बीते कुछ वर्षों से अर्थव्यवस्था बुरे दौर से गुजर रही है, खासकर सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्योगों की हालत ठीक नहीं है। अधिकांश कंपनियां (Companies) ऋण के किश्तों एवं ब्याज का भुगतान महीने के आखिरी सप्ताह या महीने के आखिरी दिन में कर रही हैं अर्थात ऐसी कंपनियों के ऋण खाते इसलिये एनपीए में तब्दील नहीं हो रहे हैं, क्योंकि वे अंतिम समय में किश्त चुका रहे हैं।

उनकी वित्तीय स्थिति खस्ताहाल है। ऐसी कंपनियों को कोरोना ने बुरी तरह से तहस-नहस कर दिया है। इसलिए उन्हें वित्तीय संकट से उबारने के लिए रिजर्व बैंक ने ऋण खातों के पुनर्गठन की अनुमति दी है।

भारतीय रिजर्व बैंक ने एमएसएमई क्षेत्र के ऋण खातों के एसएमए के किसी भी श्रेणी में रहने पर पुनर्गठन की अनुमति दे दी है, लेकिन मामले में शर्त यह है कि ऋणी को कुल 25 करोड़ रुपये से ज्यादा का ऋण (loan) नहीं दिया गया हो। 25 करोड़ रुपये से अधिक ऋण लेने वाले उद्योग जो एसएमए-1 और एसएमए-2 श्रेणियों में आते हैं, के ऋण का पुनर्गठन नहीं किया जाएगा।

कुछ बैंकों को छोड़कर अधिकांश बैंकों का एनपीए जून तिमाही में कम हुआ है, लेकिन सितंबर और दिसंबर तिमाही में एनपीए में बढ़ोतरी की आशंका है। हालांकि, जून तिमाही में भी कुछ बैंकों ने परिसंपत्ति गुणवत्ता में गिरावट आने का अनुमान लगाकर एनपीए के लिए प्रावधान किए हैं।

बैंकों का मानना है कि आर्थिक गतिविधियों में तेजी आने में अभी भी कुछ समय लगेगा, जिससे ऋण अदायगी स्थगन का लाभ लेने वाले कर्जदारों को ऋण की किश्त एवं ब्याज चुकाने में और भी समय लग सकता है।

भारतीय रिजर्व बैंक ने ऋण पर पहले मार्च से जून और फिर अगस्त तक 6 महीनों के स्थगन की घोषणा की है। बैंकों के अनुसार ऋण के किश्त एवं ब्याज का स्थगन समस्या का समाधान नहीं है, क्योंकि विमानन, पर्यटन, यात्रा तथा निर्माण जैसे प्रभावित उद्योगों को ऋण स्थगन सुविधा का लाभ देने के बाद भी उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार आएगा कहना मुश्किल है।

वैसे भी ऋण के किश्तों एवं ब्याज स्थगन की योजना कर्जदारों के बीच लोकप्रिय नहीं है। एक अनुमान के अनुसार केवल 15 प्रतिशत बड़े कॉर्पोरेट्स ने ही इस विकल्प को चुना है, जबकि खुदरा क्षेत्र में सिर्फ 20 से 30 प्रतिशत लोगों ने इस विकल्प को चुना है। अगर सभी क्षेत्रों को मिला दिया जाए तो कुल 30 प्रतिशत कर्जदारों ने इस विकल्प को चुना है, जबकि यह विकल्प सभी के लिए उपलब्ध था।

किश्त एवं ब्याज को टालना अस्थायी प्रक्रिया है। इसकी एक सीमा है। लंबे समय तक इस प्रक्रिया को जारी नहीं रखा जा सकता है। ऐसा करने से ऋण की राशि, टाली गई राशि को मिलाकर इतनी बड़ी हो जाएगी कि उसकी वसूली बैंकों के लिए नामुमकिन हो जाएगी।

वैसे भी जून 2020 की तिमाही में ऋणों के भुगतान पर रोक से परिसंपत्ति गुणवत्ता पर दबाव बना रहा। इस तिमाही में बैंकों को एनपीए के मद में बड़ी राशि का प्रावधान करना पड़ा। प्रमुख निजी बैंकों की पहली तिमाही के आय विश्लेषणों से पता चलता है कि समग्र आधार पर, आकस्मिक प्रावधान, परिसंपत्ति गुणवत्ता में कमी की वजह से किए गए। कोरोना महामारी से बैंकों के परिचालन लाभ का लगभग 27 प्रतिशत हिस्सा प्रभावित हुआ।

हालांकि, यह प्रभाव सभी बैंकों के लिए उनके सेगमेंट, ग्राहक आधार और आंतरिक जोखिम आकलन के अलावा मार्च 2020 तिमाही में किए गए कोरोना महामारी से संबंधित प्रावधान की मात्रा आदि के आधार पर अलग-अलग है।

सकल एनपीए, जो मार्च 2018 में 12.5 प्रतिशत था, वह मार्च 2019 में कम होकर 9.7 प्रतिशत हो गया और सितंबर 2019 में 9.3 प्रतिशत तथा मार्च 2020 में महज 8.5 प्रतिशत रह गया, लेकिन कोरोना महामारी से आगामी महीनों में एनपीए की स्थिति बिगड़ जाएगी ऐसी संभावना है। रिजर्व बैंक की वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट, 2020 के मुताबिक मार्च 2021 तक सकल एनपीए का स्तर बढ़कर 14.7 प्रतिशत हो सकता है।

यदि मार्च 2021 तक सकल एनपीए 14.7 प्रतिशत हुआ तो यह 22 वर्षों का उच्चतम स्तर होगा। इससे पहले वर्ष 1999 में सकल एनपीए 15.9 प्रतिशत के स्तर पर पहुंचा था, जो वर्ष 2000 में घटकर 14 प्रतिशत और वर्ष 2003 में 9.3 प्रतिशत रह गया था।

वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट के मुताबिक सरकारी बैंकों की स्थिति निजी बैंकों से ज्यादा खराब हो सकती है। भारी-भरकम एनपीए का असर बैंकों की पूंजी और ऋण देने की क्षमता पर भी पड़ेगा। रिपोर्ट के अनुसार दबावग्रस्त परिसंपत्तियों की वजह से कम से कम 5 बैंक, मार्च 2021 तक न्यूनतम पूंजी स्तर का पालन करने में चूक कर सकते हैं।

सितंबर 2020 में 53 देशी-विदेशी बैंकों की पूंजी पर्याप्तता अनुपात कम होकर 14.1 प्रतिशत होने का अनुमान है,जो सितंबर 2019 में 14.9 प्रतिशत थी। निजी बैंक पूंजी बढ़ा चुके हैं या इस प्रक्रिया में हैं, लेकिन सरकार को अभी भी सरकारी बैंकों में पूंजी डालने की योजना की घोषणा करनी है।

कोरोना महामारी के पहले एनपीए का स्तर घट रहा था। पूंजी पर्याप्तता अनुपात भी मजबूत था। इसलिए माना जा रहा है कि कोरोना महामारी से उत्पन्न संकट से निपटने में भी भारतीय बैंक कामयाब रहेंगे। ज्यादातर बैंक संकट से निकलने की कला जानते हैं।

वित्त वर्ष 2012-13 में बैंकों ने बड़े पैमाने पर ऋण खातों का पुनर्गठन किया था। फिर भी, वे संकट से उबर गए। हालांकि, बैंकों की बैलेंस शीट प्रभावित हुई थी, लेकिन पुनर्पूंजीकरण, आईबीसी और कुशल प्रबंधन के जरिए बैंकों ने प्रतिकूल स्थिति पर काबू पा लिया।

कोरोना महामारी के कारण फिलहाल ऋण की लागत बढ़ गई है। साथ में, आगामी महीनों में एनपीए बढ़ने की संभावना भी प्रबल है। अगर ऋण ईएमआई स्थगन यानी मोरेटोरियम अगस्त महीने में समाप्त होती है तो परिसंपत्ति गुणवत्ता के बारे में स्पष्टता सितंबर तिमाही में सामने आ जाएगी।

सरकारी बैंक कोरोना महामारी से निपट सकें इसके लिए सरकार, सरकारी बैंकों को स्वतंत्र निदेशक खुद चुनने अधिकार दे सकती है। इस संबंध में 5 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सरकारी बैंकों के मुख्य कार्याधिकारियों के साथ बात की है।

सरकार मामले में पीजे नायक समिति की सिफारिशों को लागू करने वाली है। सरकारी बैंकों को यह अधिकार मिलने से वे किन ऋण खातों का पुनर्गठन करना है के संबंध में बिना किसी दबाव के निर्णय ले सकेंगे। एक अनुमान के मुताबिक कोरोना वैक्सीन दिसंबर महीने तक बाजार में आ सकती है। ऐसा होता है तो आर्थिक गतिविधियों के सामान्य होने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा।

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