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प्रमोद जोशी का लेख : लाल गलियारे की चुनौती बरकरार

वर्तमान आंदोलन पीपुल्स वॉर ग्रुप (पीडब्लूजी) और माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर (एमसीसी) के विलय के बाद शुरू हुआ है, जिसका केंद्र आंध्र और तेलंगाना में है। परंपरागत नक्सली संगठन अब या तो मुख्यधारा की राजनीति से जुड़ चुके हैं या निष्िक्रय हो चुके हैं। अलबत्ता उन्हीं इलाकों में यह नया संगठन सक्रिय है। बिहार, उड़ीसा, बंगाल, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और महाराष्ट्र समेत 13-14 राज्यों में इनके पदचिह्न हैं, जो देश का लाल गलियारा कहलाता है। देश के एक तिहाई जिले हिंसा की गिरफ्त में हैं।

प्रमोद जोशी का लेख : लाल गलियारे की चुनौती बरकरार
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प्रमोद जोशी 

प्रमोद जोशी

कोरोना, बंगाल के चुनाव और आईपीएल की खबरों में उलझे देश के लिए माओवादी हिंसा ने जोरदार झटके का काम किया है। इन सभी खबरों के तार देश की राजनीति से जुड़े हैं। यह अपने आप में एक समस्या है। आमतौर पर राजनीतिक प्रतिक्रिया होती है, सुरक्षा-व्यवस्था ठीक नहीं थी, इंटेलिजेंस की विफलता है वगैरह। आम जनता की प्रतिक्रिया होती है कि बहुत हो गया, अब फौजी कार्रवाई होनी चाहिए। कुछ लोग हवाई हमले की बातें भी करते हैं।

माओवादियों के हमले आमतौर पर सुरक्षा बलों पर होते हैं, पर बस्तर की झीरम घाटी में 25 मई 2013 को हुए हमले में छत्तीसगढ़ कांग्रेस पार्टी की पहली कतार के ज्यादातर बड़े नेताओं समेत 29 लोग मारे गए थे। उस हमले से यह बात भी रेखांकित हुई थी कि माओवादियों का इस्तेमाल मुख्यधारा की राजनीति में भी परोक्ष रूप से होता है। राजनीतिक दलों के बीच तू-तू, मैं-मैं माओवादियों की मदद करती है। वे बच्चों और महिलाओं को ढाल बनाते हैं, ताकि सरकार के प्रति आदिवासियों का गुस्सा भड़के।

माओवादी रणनीति

बीजापुर में माओवादियों के साथ मुठभेड़ में सुरक्षा बलों के 22 जवानों की मौत के बाद तमाम तरह के सवाल हवा में हैं। कहा जाता है कि उनकी पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी की बटालियन नंबर 1 के कमांडर हिडमा ने जंगल में होने की ख़बर प्रचारित की। सुरक्षा बलों के दो हज़ार से अधिक जवान इस बटालियन को घेरने के लिए निकले और माओवादियों के जाल में फंसते चले गए। सुरक्षा बलों की कार्रवाई से वर्ष 2010 से अब तक माओवादियों के नेतृत्व-वर्ग से जुड़े 1,378 लोग मारे जा चुके हैं, पर सुकमा और बीजापुर के जंगलों में सीपीआई (माओवादी) सेंट्रल कमेटी सक्रिय है। इसे सेंट्रल रीजनल कमांड कहा जाता है। इस कमांड की बटालियन 1 का कमांडर है माडवी हिडमा। केंद्रीय रिजर्व पुलिस फोर्स (सीआरपीएफ) का ताजा अभियान इस बटालियन के सफाए के लिए चलाया गया था। हाल के अभियानों के कारण माओवादियों की ताकत में कमी अवश्य ही आई है, परंतु वे पूरी तरह से समाप्त नहीं हुए हैं। ताजा हिंसा इस बात की पुष्टि कर रही है।

मांद में प्रवेश

सुरक्षा बल माओवादियों की मांद में घुसे थे। उग्रवादियों को स्थानीय लोगों की मदद मिलती है और उन्हें जंगल के रास्तों की बेहतर जानकारी होती है। वे पहली बार सफल नहीं हुए हैं। 11 साल पहले 6 अप्रैल 2010 को दंतेवाड़ा में ऐसे ही हमले में सीआरपीएफ के 76 जवान शहीद हुए थे। वे जवान तीन दिन के ऑपरेशन से लौट रहे थे, जब माओवादियों ने योजनाबद्ध तरीके से उन पर हमला बोला था।

उस हमले में भी माडवी हिडमा की महत्वपूर्ण भूमिका थी। उसके बाद ही उसे संगठन में महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी दी गई। उस पर 35 लाख रुपये का इनाम है। हालांकि 2010 से अब तक कम से कम तीन बार हिडमा के मारे जाने की खबरें भी आई है। उग्रवादी संगठनों में अक्सर किसी व्यक्ति को अलौकिक बना दिया जाता है। दंतेवाड़ा की घटना के फौरन बाद 29 जून, 2010 को नारायणपुर जिले में 26 जवानों की हत्या हुई। इसके बाद 24 अप्रैल, 2017 को सुकमा जिले में हुए एक हमले में सीआरपीएफ के 25 जवान शहीद हुए थे।

माओवादी कमजोर हुए

साउथ एशिया टैररिज्म पोर्टल (एसएटीपी) के अनुसार 25 अप्रैल, 2017 से 3 अप्रैल, 2021 के बीच देशभर में कम से कम 18 ऐसे बड़े हमले हुए हैं, जिनमें तीन या ज्यादा मौतें हुई हैं। तीन घटनाओं में शहीदों की संख्या 15 से ज्यादा रही है। बहरहाल इस हिंसा ने सरकार के उन सभी दावों पर सवालिया निशान लगाया है, जिनमें कहा जा रहा था कि माओवादी कमज़ोर हुए हैं। राज्य के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का कहना है कि माओवादी सीमित क्षेत्र में सिमटकर रह गए हैं और वे अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। दूसरी तरफ इस घटना के दो हफ्ते पहले से एक के बाद एक कई घटनाएं हुई हैं। माओवादियों ने 23 मार्च को नारायणपुर ज़िले में एक बस को विस्फोटक से उड़ाया, जिसमें पंाच जवान मारे गए। इसके पहले और बाद में भी कुछ न कुछ हो ही रहा है। मुठभेड़ और आत्मसमर्पण की ख़बरों के बीच शांति-वार्ता की पेशकश भी सुनाई पड़ती हैं, पर असल में होता कुछ नहीं है।

सबसे बड़ा खतरा

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस हिंसा को देश के सामने सबसे बड़ा खतरा बताया था। इससे निपटने के लिए केवल सशस्त्र कार्रवाई ही अकेला विकल्प नहीं है। आदिवासी क्षेत्रों के विकास-कार्यों और राजनीतिक विकल्पों को मजबूत करने की ज्यादा बड़ी जरूरत है। माओवादी हिंसा का वर्तमान दौर 2004 में सीपीआई (माओवादी) के गठन के बाद से शुरू हुआ है। हालांकि इसे नक्सलवादी आंदोलन भी कहा जाता है, पर यह उस परंपरागत नक्सली आंदोलन से अलग है, जो साठ के दशक में बंगाल से निकला था। वर्तमान आंदोलन पीपुल्स वॉर ग्रुप (पीडब्लूजी) और माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर (एमसीसी) के विलय के बाद शुरू हुआ है, जिसका केंद्र आंध्र और तेलंगाना में है। परंपरागत नक्सली संगठन अब या तो मुख्यधारा की राजनीति से जुड़ चुके हैं या निष्िक्रय हो चुके हैं। अलबत्ता उन्हीं इलाकों में यह नया संगठन सक्रिय है। बिहार, उड़ीसा, बंगाल, छत्तीसगढ़, आंध्र, तेलंगाना और महाराष्ट्र समेत 13-14 राज्यों में इनके पदचिह्न हैं, जो देश का 'लाल गलियारा'कहलाता है। देश के एक तिहाई जिले हिंसा की गिरफ्त में हैं।

खनन-क्षेत्रों पर कब्जा

पिछले कुछ वर्षों के आंकड़े देखें तो पाएंगे कि समस्या का केंद्र छत्तीसगढ़ में है, जहां देश के दो प्रमुख दलों के बीच सत्ता की लड़ाई है। पिछले साल खनन अधिनियम में संशोधन के बाद सशस्त्र बल उन खनन क्षेत्रों को मुक्त कराने का काम कर रहे हैं, जो माओवादियों के कब्जे में हैं। यह भारत के विकास की समस्या है। पिछड़े इलाकों का विकास नहीं हो पाने के कारण समस्या पैदा हुई, पर माओवादी विकास होने नहीं देंगे। वे क्यों नहीं चाहते कि बच्चों के लिए स्कूल खोले जाएं, अस्पताल बनें, सड़कें आएं? यह व्यवस्था की साख का सवाल है। अरुंधती राय के शब्दों में, जहां पुलिस वाला वर्दी में जाते डरता है। वह सादी वर्दी में जाता है और माओवादी वर्दी में रहता है। समानांतर सरकार नहीं, उनकी वहां पर बाकायदा सरकार चलती है।

राजनीति की विफलता

ऐसी स्थिति मुख्यधारा की राजनीति की विफलता के कारण पैदा हुई। माओवादियों की आड़ में कई तरह के अपराधी अपहरण और वसूली का धंधा भी चलाते हैं। हजारों साल से आदिवासी जंगलों में रहते आए हैं। आर्थिक-विकास में उन्हें भागीदार बनाया जाना चाहिए। कॉरपोरेट घरानाें को औद्योगिक विस्तार के लिए ज़मीन चाहिए। इससे आदिवासियों के विस्थापन का खतरा पैदा हो गया है। व्यवस्था ने उनका दोहन और शोषण किया और उन्होंने शिकायत की तो उल्टे मार पड़ी। इन बातों में आंशिक सच है, पर सच यह भी है कि माओवादी रणनीतिकारों के पास अराजकता की योजना है, किसी व्यवस्था का सपना नहीं। वे आदिवासियों की बदहाली का फायदा उठाते हैं। इनके पास आधुनिक हथियार कहां से आते हैं और कौन ट्रेनिंग देता है? इनके पीछे विदेशी ताकतें भी हैं, जिनकी दिलचस्पी अराजकता में है। क्या उनके साथ संवाद संभव है? इसमें दो राय नहीं कि वे हमारी राज-व्यवस्था की विफलता की देन हैं और उसे विफल बनाए रखना उनका लक्ष्य है। माओवाद से ज्यादा बड़ी चुनौती एक जिम्मेदार राजनीतिक व्यवस्था को विकसित करने की है। वह फौजी कार्रवाई से नहीं बनेगी। माओवादियों को अलग-थलग भी करना होगा। इसमें राजनीतिक, आर्थिक, फौजी और भावनात्मक कदमों की जरूरत होगी।

ये लेखक के अपने निजी विचार हैं

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