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संवेदनशील व जवाबदेह सरकार चुनने की चुनौती

किस पार्टी की सरकार बनेगी और कौन प्रधानमंत्री बनेगा इसका तो अभी कयास ही लगाया जा सकता है।

संवेदनशील व जवाबदेह सरकार चुनने की चुनौती

नई दिल्‍ली. चुनाव आयोग द्वारा बुधवार को 16वीं लोकसभा चुनाव के कार्यक्रमों का ऐलान करने के साथ ही लोकतंत्र के महाकुंभ का औपचारिक आगाज हो गया। चुनाव आयोग ने चुनावों को नौ चरण में कराने का निर्णय किया है, जो सात अप्रैल से शुरू होकर 12 मई को संपन्न होंगे। पूरे ढाई महीने लोकतांत्रिक देश का सियासी पारा चढ़ा रहेगा और 16 मई को मतों की गणना होगी। ऐसा कहा जा सकता है कि उस दिन देश को एक नया प्रधानमंत्री मिल जाएगा।

हालांकि किस पार्टी की सरकार बनेगी और कौन प्रधानमंत्री बनेगा इसका तो अभी कयास ही लगाया जा सकता है, लेकिन एक बात कही जा सकती है कि नई सरकार का इंतजार देश की राजनीतिक पार्टियों से कहीं ज्यादा देश की जनता को है। कांग्रेस नीत यूपीए सरकार के पांच वर्षों के कार्यकाल से जनता बेहद उकताई हुई है। बीते साल के पांच राज्यों के चुनावी नतीजे यह दर्शाते हैं। इसकी तस्दीक हाल में आए ओपिनियन पोल भी कर रहे हैं।

ऐसा भी कहा जा रहा है कि कांग्रेस अपनी ऐतिहासिक हार की ओर बढ़ रही है। देश में स्पष्ट रूप से बदलाव की बयार बह रही है। वैसे भी यूपीए सरकार ने पिछले पांच वर्षों में कमरतोड़ महंगाई, भयंकर भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, नीतिगत अपंगता और कमजोर विदेश नीति के अलावा देश को दिया ही क्या है। अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री की अगुआई में जीडीपी की विकास दर एक दशक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है। देश इन समस्याओं से पार पाना चाहता है।

मतदाता भाजपा के प्रधानमंत्री उम्मीदवार नरेंद्र मोदी को एक उम्मीद की नजर से देख रहे हैं। हाल में जितने भी चुनाव पूर्व सर्वेक्षण आए हैं उसमें मोदी प्रधानमंत्री के रूप में लोगों की पहली पसंद बने हुए हैं। उनकी जनसभाओं में जुटने वाली भीड़ को देखकर भी इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। वहीं आप पर भी सभी की निगाहें होंगी कि उसका दिल्ली प्रयोग देश में कितना सफल होता है। चुनाव से पूर्व बने तीसरे मोर्चे का हर्श भी देश देखना चाहेगा।

इस बार भाजपा की अगुआई में एनडीए, कांग्रेस की अगुआई में यूपीए, ग्यारह क्षेत्रीय दलों का तीसरा मोर्चा और आम आदमी पार्टी के रूप में एक नई ताकत के बीच दिलचस्प सियासी मुकाबला देखने को मिल सकता है। वहीं इस बार का चुनाव कई मायनों में महत्वपूर्ण भी होने जा रहा है। चुनाव आयोग ने बाहुबल पर तो बहुत हद तक अंकुश लगाया है पर धनबल अभी भी एक चुनौती है। मतदाताओं समक्ष भी एक संवेदनशील व जवाबदेह सरकार चुनने की चुनौती है।

वहीं उम्मीदवारों के लिए चुनाव खर्च सीमा 40 लाख रुपये से बढ़कर 70 लाख रुपये हो गई है। इस बार कुल 81.4 करोड़ मतदाता वोट डालेंगे जो कि पिछली बार से 10 करोड़ ज्यादा हैं। पहली बार लोकसभा चुनावों में नोटा का विकल्प भी रहेगा। भारतीय लोकतंत्र धीरे-धीरे परिपक्व हो रहा है और जनता का चुनावों में विश्वास भी बढ़ रहा है। इसका अंदाजा मत प्रतिशत में हो रही वृद्धि से लगता है। देखना है कि इस बार जनता किसमें अपना यह विश्वास जताती है। कुल मिलाकर देश के लोकतांत्रिक इतिहास में इस साल की गर्मी दिलचस्प मुकाबले का गवाह बनने जा रही है।

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