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टीकाकरण पर केंद्र की स्पष्टता स्वागतयोग्य

केंद्र सरकार सभी नागरिकों का मुफ्त टीकाकरण कराएगी, की घोषणा पहले ही कर दी गई होती तो वैक्सीनेशन को लेकर इतना भ्रम नहीं फैलता। विपक्ष को आलोचना का मौका नहीं मिलता। विदेशों में भारत को लेकर टीका-टिप्पणी नहीं होती। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम संदेश जारी कर टीकाकरण पर स्थिति स्पष्ट कर एक साथ सबको जवाब दे दिया है।

पीएम मोदी बोले- हम दुनिया को दे रहे कोरोना वैक्सीन तो बदले में हमें मिल रहा भरोसा
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

Haribhoomi Editorial : सरकार देर आई दुरुस्त आई। केंद्र सरकार को शुरू से ही कोविड टीकाकरण अभियान केंद्रीयकृत रखना चाहिए था। राज्य सरकारों की केवल मदद लेनी चाहिए थी। केंद्र सरकार सभी नागरिकों का मुफ्त टीकाकरण कराएगी, की घोषणा पहले ही कर दी गई होती तो वैक्सीनेशन को लेकर इतना भ्रम नहीं फैलता। विपक्ष को आलोचना का मौका नहीं मिलता। विदेशों में भारत को लेकर टीका-टिप्पणी नहीं होती। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम संदेश जारी कर टीकाकरण पर स्थिति स्पष्ट कर एक साथ सबको जवाब दे दिया है।

32 मिनट के संबोधन में पीएम ने दो बड़े ऐलान किए। पहला, सभी राज्यों को अब केंद्र की ओर से मुफ्त वैक्सीन दी जाएगी, 18+ को भी नि:शुल्क वैक्सीन लगाई जाएगी। 21 जून से इसकी शुरुआत होगी। दूसरा, देश के 80 करोड़ गरीब लोगों को नवंबर तक मुफ्त राशन दिया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने हाल में अपने दो आदेशों में केंद्र सरकार से कोविड से निपटने को लेकर राष्ट्रीय प्लान मांगा था और 18+ को मुफ्त वैक्सीनेशन क्यों नहीं को लेकर सवाल पूछा था। मीडिया में भी वैक्सीन के अलग-अलग दाम को लेकर सवाल उठाए जा रहे थे। कोविड की दूसरी लहर में देश में अचानक ऑक्सीजन व जीवनरक्षक दवा की कमी के साथ अस्पतालों में बेड की किल्लत को लेकर अफरा-तफरी के माहौल बनने से लोग भयभीत हुए, लोगों के मन में सरकार के प्रति असंतोष पनपा। पहले सरकार ने राष्ट्रीय स्तर पर ही वैक्सीनेशन कार्यक्रम शुरू किया था, अभी 47 दिन पहले सरकार ने राज्यों की मांग पर उन्हें भी वैक्सीन अभियान चलाने की छूट दी।

अलग-अलग कंपनियों ने राज्य के लिए अपनी वैक्सीन की कीमतों का ऐलान किया, निजी क्षेत्र के अस्पतालों में भी वैक्सीनेशन शुरू हुआ। बाद में राज्यों में अचानक वैक्सीन की किल्लत की बात उठी, राज्यों को महंगी दर पर टीका देने को लेकर केंद्र पर आरोप लगे, राज्यों की विफलता सामने आने लगी। राज्यों ने अपनी विफलता का ठीकरा केंद्र सरकार पर फोड़ा। देश का राष्ट्रीय कार्यक्रम राजनीति का शिकार होने लगा। वैक्सीनेशन प्रोग्राम डिरेल होते दिखा। इससे केंद्र सरकार की छवि धूमिल होने लगी। कोरोना की दूसरी लहर में अधिक मौत के चलते जनता के एक वर्ग में जनाक्रोश जन्म लेने लगा। केंद्र सरकार पर सवाल उठे। संघ, संगठन और सरकार के स्तर पर गहन मंथन में भी कोरोना से निपटने व वैक्सीनेशन विषयों पर चर्चा हुई। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत सरकार की साख पर आंच आने लगी।

ऑक्सीजन की कमी से मौतों व गंगा किनारे की लाशों की तस्वीरों ने देश के प्रति दुनिया का नजरिया बदल दिया। जिस तरह यूपीए सरकार अपने दूसरी कार्यकाल के दो साल बाद वैश्विक रेटिंग्स में नीचे चली गई थी, वही अब मोदी सरकार के साथ भी हुआ है। मौजूदा आंकड़ा यूनाइटेड नेशंस के 193 देशों की ओर से अपनाए गए 17 सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स (एसडीजी) की ताजा रैंकिंग है, जिसमें भारत 2 स्थान खिसककर 117वें नंबर पर आ गया है। तमाम कारण हैं कि मोदी सरकार के लिए वैक्सीनेशन पर स्थिति स्पष्ट करना जरूरी हो गया था। दूसरी लहर के मिस-मैनेजमेंट और केंद्र की भूमिका पर सवाल उठने पर प्रधानमंत्री ने साफ कर दिया कि राज्यों की मांग पर ही उन्हें कोरोना नियंत्रण और वैक्सीनेशन के अधिकार दिए गए। यह सही है कि देश में एक नया हेल्थ इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार किया गया है, लेकिन दूसरी लहर के दौरान यह स्पष्ट रूप से दिखा नहीं। प्राइवेट हॉस्पिटल को लेकर भी स्पष्टता स्वागत योग्य है। प्राइवेट अस्पताल देश में बन रही वैक्सीन में से 25 फीसदी वैक्सीन ले सकेंगे। प्राइवेट अस्पताल एक डोज पर अधिकतम 150 रुपये ही सर्विस चार्ज ले सकेंगे। इसकी निगरानी का काम राज्य सरकारों के पास रहेगा।

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