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किताबों के बिकने का सेलिब्रेशन, लेकिन सेलिब्रेशन पर भी खतरा

किताबों के बिकने का सेलिब्रेशन

किताबों के बिकने का सेलिब्रेशन, लेकिन सेलिब्रेशन पर भी खतरा
नई दिल्ली. पिछले 3 सालों से हमने 1000 से 5000 तक की बिक्री संख्या का सेलिब्रेशन किया। 1000-1500 प्रतियों की प्रीबुकिंग को अपूर्व बताया और जश्न मनाया। ये सेलिब्रेशन इसलिए भी था क्योंकि मौलिक हिंदी किताबें लगभग पाठकीय अकाल से गुज़र रही हैं। हिंद युग्म के ज़्यादातर लेखक ऐसे थे जिनकी लेखन की दुनिया में लोकप्रियता किताब के आने से पहले लगभग शून्य थी। यानी पाठकों के सामने दोस्ती के अलावा किताब ख़रीदने की शायद कोई बड़ी वजह भी न रही हो। बाद में कंटेट के आधार पर किताब ने अपने पाठक जोड़े और लेखकों ने लोकप्रियता और पाठकों की मुहब्बत। इस साल के शुरू में रवीश कुमार की किताब आई और उसकी 2000 से 10,000 प्रतियों के बिकने का सेलिब्रेशन हुआ। यह सेलिब्रेशन कई तरह के ख़तरे की ओर भी
संकेत करता है।
हिंदी किताबों के कम बिकने के पीछे आमतौर पर ख़राब डिस्ट्रीब्युशन, प्रचार-प्रसार का अभाव बताया जाता है। लेकिन यदि हम हिंदी की पिछले 2-3 सालों में आई सबसे अधिक बिकने वाली किताब ‘इश्क़ में शहर होना’ की तुलना अमीश की आनेवाली किताब ‘सायन ऑफ़ इच्छाकु’ के हिंदी संस्करण ‘इच्छाकु के वंशज’ से करें तो पाएँगे कि रवीश की किताब की लोकप्रियता अमीश की किताब के हिंदी संस्करण से कम है। अब हम यहाँ कमज़ोर डिस्ट्रीब्युशन का रोना भी नहीं रो सकते क्योंकि ‘इच्छाकु के वंशज’ की अभी केवल ऑनलाइन प्रीबुकिंग चल रही है। यानी किताब अभी छपी भी नहीं है तो डिस्ट्रीब्युशन का सवाल ही कहाँ से उठता है! जितना प्रचार हम अपनी किताबों का प्रीबुकिंग के समय करते हैं, उतना प्रचार अमीश की हिंदी किताब का तो नहीं ही हुआ। और ना ही हमारा जो लेखक और पाठक समाज है जो हमसे फेसबुक पर कनैक्टेड हैं, उनके द्वारा अमीश की हिंदी किताब को ख़रीदकर उत्साहित होकर फेसबुक पर स्टेटस चढ़ाते देखा। लेकिन सवाल उठता है कि अमीश की हिंदी किताब को हज़ारों की संख्या में पाठक कहाँ से मिल रहे हैं!
रवीश कुमार हिंदी के लगभग लोकप्रियतम व्यक्ति हैं। ज़्यादातर युवा पीढ़ी (और कुछ हद तक अधेड़ और प्रौढ़ पीढ़ी भी) इनके प्रसंशक भी हैं। रवीश टीवी पर भी पर्याप्त दिखते हैं। शायद किसी भी फ़िल्मी हस्ती या राजनैतिक हस्ती के बराबर। अखबारों और पत्रिकाओं में भी दिखाई देते हैं। यानी रवीश की किताब का 10 हज़ार बिकना हमारी लेखन बिरादरी के अधिकतम थ्रेशोल्ड की तरफ़ इशारा करता है। यानी हिंदी की मौलिक किताबों का न बिकना इतनी आसान गुत्थी भी नहीं है। सवाल ये है कि क्या हिंदी के पास ऐसा कंटेंट ही नहीं है जो बिकाऊ हो? क्या हिंदी का लेखक बिकने के लिए लिख ही नहीं रहा? क्या हिंदी का लेखक और प्रकाशक बिकने वाली सामग्री का चुनाव नहीं कर पा रहा? ज़्यादा सोचने पर माथा घूम जाता है। Ajay Anand जैसे युवा और उत्साही प्रकाशक तरह-तरह के सपनों और सवालों से दिमाग़ घुमाने में और मदद करते रहते हैं।
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