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भारत की आजादी का आॅनलाइन का जश्न

योंतो हम 15 अगस्त को अपनी आजादी का जश्न मनाते हैं लेकिन ऑनलाइन बाजार 4-5 दिन पहले से ही ए किस्म-किस्म के ऑफर्स के साथ, आजादी के सेलिब्रेशन में लग जाता है।

भारत की आजादी का आॅनलाइन का जश्न
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योंतो हम 15 अगस्त को अपनी आजादी का जश्न मनाते हैं लेकिन ऑनलाइन बाजार 4-5 दिन पहले से ही ए किस्म-किस्म के ऑफर्स के साथ, आजादी के सेलिब्रेशन में लग जाता है। अखबारों में बड़े-बड़े इश्तिहार देकर हमें ललचाता है कि फलां मोबाइल और फलां टीवी पर इतने-इतने का डिस्काउंट मिल रहा है। कैश बैक और श्नो कॉस्ट ईएमआई का झुनझुना तो सोने पर सुहागा का काम करता है।

मौका चाहे स्वतंत्रता दिवस का हो या अन्य किसी त्यौहार का बाजार कैसे भी करके खुद को भुना ही लेता है। वो बहुत अच्छे से जानता हैए अपने ग्राहकों की पसंद-नापसंद को। ऑन लाइन पोर्टल पर दस का माल पांच में मिले तो भला कोई क्यों न ले। दुनिया को पता है कि हम मुफ्त और छूट के किस कदर दीवाने हैं। अब तो आलम यह है, 15 अगस्त और 26 जनवरी का मतलब ऑन लाइन शॉपिंग हो गया है।

कुछ को तो गणतंत्र दिवस याद ही ऑफर्स के लिए रहता है। ऑन लाइन बाजार जब से मोबाइल पर आया है, तब से लोगों के बीच दीवानगी और ज्यादा बढ़ गई है। न कहीं आना, न कहीं जाना। घर बैठे, अपना बेस्ट प्रोडक्ट चुनकर, तुरंत आर्डर कर दो। न मोलभाव का झंझट न भीड़.भाड़ में हटो बचो। यह भी अपने किस्म की आजादी ही तो है! मैं समझता हूं,

गणतंत्र और स्वतंत्रता को जितनी अच्छी तरह ऑन लाइन बाजार वालों ने समझा है, किसी ने नहीं समझा। अवसर या बहाना कोई भी हो वे अपना माल बेच ही लेते हैं। एकाध दफा तो मेरी बेटी ही मुझसे पूछ बैठी। पापा, 15 अगस्त वही डे है नए जिस दिन ऑन लाइन पोर्टल पर हमें खूब सारा डिस्काउंट मिलता है। भगत सिंह आज जहां कहीं भी होंगे, सोचते तो अवश्य होंगे कि क्या ये दिन देखने के लिए ही हमने देश को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त करवाया था।

डिस्काउंट का खुमार हमारे दिलोदिमाग पर कुछ यों छाया रहता है अगर किसी की दसवीं-तेहरवीं में भी कम खर्च की छूट मिलने लगे तो हम उसे भी न छोड़ें। मुझे तो वो दिन ज्यादा दूर दिखाई नहीं देते जब छात्रों को 15 अगस्त के इतिहास के साथ-साथ ऑन लाइन बाजार में डिस्काउंट और ऑफर्स भी पढ़ाया-बताया जाएगा। तब देश को क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश साम्राज्य से मुक्ति दिलवाई थी, अब ऑन लाइन बाजार भीड़-भाड़ में धक्के खाने से राहत दिला रहा है।

इतने ऑफर्स और डिस्काउंट को देखकर मेरा मन भी ललचा रहा कि कुछ मैं भी खरीद ही लूं। जमाने के साथ चलने के लिए उसके जैसा होना, बनना भी बहुत जरूरी है। वरना दुनिया यह कहेगी कि लेखक होकर भी मैं यथास्थिति से ग्रस्त हूं।

जिस तरह से गण और तंत्र 72 साल बाद अब भी संघर्षरत हैं, उसी तरह बाजार भी लगा हुआ है, अवसरों के बहाने खुद के असर को स्थापित करने में। काफी कुछ जम भी चुका है। तो आइए, स्वतंत्रता दिवस के साथ-साथ ऑफर्स और डिस्काउंट को भी एन्जॉय करें। क्योंकि बाजार ही अंतिम सत्य है।

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