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जब सोच ही ऐसी तो किसी बदलाव की उम्मीद बेमानी

उच्च व जिम्मेवार पदों पर बैठे हुए लोगों से उम्मीद की जाती है कि वे देश, समाज, संस्था और कानून से जुड़े किसी मुद्दे पर संवेदनशीलता से पेश आएंगे और जो उचित है उसी के पक्ष में तर्क देंगे।

जब सोच ही ऐसी तो किसी बदलाव की उम्मीद बेमानी

उच्च व जिम्मेवार पदों पर बैठे हुए लोगों से उम्मीद की जाती है कि वे देश, समाज, संस्था और कानून से जुड़े किसी मुद्दे पर संवेदनशीलता से पेश आएंगे और जो उचित है उसी के पक्ष में तर्क देंगे। जिसका उनके मातहत भी अनुसरण करते हैं और देश एक सही दिशा में अग्रसर होते हुए सबके कल्याण को सुनिश्चित करता है। परंतु जब ये लोग ही असंवेदनशील हो जाएंगे और भौंडा बयान देने लगें तो समझा जा सकता है कि देश किस ओर जा रहा है। सीबीआई के निदेशक रंजीत सिन्हा ने सीबीआई के ही गोल्डन जुबली महोत्सव के मौके पर आयोजित कार्यक्रम में क्रिकेट में सट्टेबाजी की तुलना बलात्कार जैसे घृणित अपराध से करते हुए कहा है कि अगर सट्टेबाजी को रोका नहीं जा सकता तो उसका आनंद लेना चाहिए। ठीक उसी तरह जैसे अगर बलात्कार को रोका नहीं जा सकता तो उसका आनंद लेते हैं। महिलाओं से जुड़े यौन उत्पीड़न पर ऐसा असंवेदनशील बयान और कुछ नहीं हो सकता। सुप्रीम कोर्ट तक ने कहा हैकि बलात्कार जैसा अपराध न केवल एक महिला के शरीर बल्कि आत्मा पर हमला है। यह नैतिक और शारीरिक रूप से सबसे ज्यादा निंदनीय अपराध है। बलात्कार पूरे समाज के खिलाफ किया गया अपराध है। इसके कारण महिला को ऐसा जख्म मिलता है, जो जीवन भर नहीं भरता। फिर रंजीत सिन्हा बलात्कार को लेकर ऐसी सोच क्यों रखे हैं। संदर्भ कोई भी क्यों न हो यह नहीं कहा जा सकता कि बलात्कार का अनंद उठाएं। इससे समाज में कुत्सित मानसिकता के लोगों को और बढ़ावा ही मिलेगा। इस तरह उन्हें यौन हिंसा करने के लिए हौसला मिलेगा। हालांकि उन्होंने अपने बयान पर माफी मांगी है, लेकिन इससे एक बात तो पूरी तरह जगजाहिर हो जाती हैकि महिलाओं के प्रति पुलिस-प्रशासन में ऊंचे पदों पर बैठे लोगों की सोच कितनी गलत है। और जब बड़े अधिकारियों की यह धारणा है तो छोटे स्तर पर हालात क्या होंगे, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। ऐसा तब है जब सीबीआई भी बलात्कार से जुड़े कई बड़े मामलों की जांच कर रही है। दरअसल, यहां सारी समस्या मानसिकता की है, रंजीत सिन्हा जिसके उदाहरण बनकर सामने आए हैं। हम समझ सकते हैं कि ऐसी धारणा रखने वाले लोग कैसी व्यवस्था देंगे। इससे पता चलता हैकि आखिर क्यों यौन शोषण पीड़िता थानों में जाने से कतराती हैं और निचले स्तर के अधिकारियों पर उनके साथ बदसलूकी के आरोप क्यों लगते हैं। इस कार्यक्रम के जरिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी एक संदेश गया है कि भारतीय पुलिस महिलाओं के बारे में क्या सोच रखती है। महिलाएं आज सबसे ज्यादा हिंसा की शिकार हो रही हैं और समाज में खुद को असुरक्षित महसूस कर रही हैं तो उसके पीछे कहीं न कहीं यह धारणा भी काम कर रही है। 16 दिसंबर के दिल्ली गैंगरेप कांड के बाद जिस तरह से जनता में पुलिस के खिलाफ आक्रोश फैला था, राजनीतिक दलों को लोगों के सामने आना पड़ा था और जिसके बाद महिलाओं के खिलाफ हिंसा को लेकर कड़े कानून बने थे उससे एक आस बंधी थी कि हालात बदले होंगे, पुलिस- प्रशासन सजग हुए होंगे। परंतु इस बयान के बाद नाउम्मीदी छा गई है। क्योंकि जब सोच ही यही है तो परिवर्तन की उम्मीद नहीं की जा सकती।

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