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बजट 2018ः बजटिया ही जाने बजट की भाषा

हर हिंदुस्तानी को साल में कम से कम एक बार इस आड़ी-टेढ़ी भाषा से सामना करना ही पड़ता है। बजट के प्रावधान चाहे आपको सालभर तंग करते रहें, उसकी शुरुआत बजट की भाषा से हो जाती है।

बजट 2018ः बजटिया ही जाने बजट की भाषा
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हर हिंदुस्तानी को साल में कम से कम एक बार इस आड़ी-टेढ़ी भाषा से सामना करना ही पड़ता है। बजट के प्रावधान चाहे आपको सालभर तंग करते रहें, उसकी शुरुआत बजट की भाषा से हो जाती है। बजट पेश होता है, पास हो जाता है, लागू भी हो जाता है लेकिन आिखर तक यह समझ में नहीं आता कि मुद्रास्फीति किसे कहते हैं, राजकोषीय घाटा क्या होता है, बजटीय घाटा क्या होता है, रेवेन्यू डेफीशिट किस बला का नाम है, नॉमिनल जीडीपी ग्रोथ किस चिडि़या को कहते हैं, ग्रॉस मार्केट बारोयिंग किस चीज से बनती है और नेट मार्केट बारोयिंग से अलग कैसे है। और तो और, जब इतनी चीजें घाटे ही घाटे में पेश की जाती हैं, तो आिखर देश चलता कैसे है। इतना घाटा दिखाने पर तो कोई भी सेठ नौकरी से निकाल देगा पर कभी भी वित्त मंत्री को घाटे का

बजट पेश करते रहने के बावजूद हटाए जाने का किस्सा नहीं सुना। यही सोच कर संतोष कर लिया जाए कि बहुत सी बातें अपने को समझ में नहीं आती। उनमें से एक यह भी है। इसलिए बेहतर है कि बजट आने के बाद क्या सस्ता हुआ और क्या महंगा हुआ, इस पर ध्यान दिया जाए। जो सस्ता हुआ, वह लपककर खरीद लिया जाए, जो महंगा हुआ उसके लिए मन मसोसकर रहा जाए। खुदा ना खास्ता कभी जेब में इतने पैसे आ जाएं, तो खरीदकर वित्त मंत्री को श्रद्धा से याद किया जाए।
हर कोई नहीं करेगा मन की बात अब बजट है तो कुछ चीजें सस्ती होंगीं तो कुछ सस्ती। सस्ती होंगीं तो अलग बात है, लेकिन कुछ चीजें महंगी होती हैं तो उनका असर कहां से कहां तक होता है, इसकी सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है। पेट्रोल महंगा होगा तो आपके वाहन सड़कों पर कम और घर के बाहर या गैरेज में खड़े रहेंगे। अब इस बात पर आप खुश हो सकते हैं कि सड़कों पर प्रदूषण कम हो रहा है। पर उनका सोचिये जो पब्लिक ट्रांसपोर्ट में चलना अपनी तौहीन समझते हैं या जिन्हें लोकल बसों में मजा नहीं आता। ऐसे ही होटल-रेस्टारेंट का खाना महंगा कर आप लोगों की बचत तो कर सकते हैं पर जिनकी गर्ल फ्रेंड्स महंगे होटलों में खाना खाए बिना अपने प्रेमियों को लिफ्ट नहीं देतीं, बजट तो उनके प्रेम पर बुलडोजर चला देता है।

मन की बात पर मोदी का अधिकार

दिल्ली में बैठे निर्मम वित्त मंत्री क्या जानें कि उनकी एक कलम से न जाने कितने प्रेम कथाओं की समय के पहले ही एंडिंग हो जाती है। अब सरकार ने एक ओर तो मोबाइल फोन पर ड्यूटी 15 से 20 प्रतिशत कर दी और बातचीत पर जाने क्या-क्या टैक्स लगाकर उसे और महंगा कर दिया है। अभी तक यह दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के ध्यान में नहीं आया है कि यह इसलिए किया जा रहा है कि मन की बात पर प्रधानमंत्री का एकाधिकार बना रहे, इसलिए वित्त मंत्री महोदय ने मोबाइल को ऐसा महंगा कर दिया है। कोई और न कर सके मन की बात।

जब यशवंत सिन्हा पेश किया बजट

सच कहता हूं, यह मेरे मन की बात है! यशवंत सिन्हा जी, यह भी मज़ाक है बहुत साल पहले वित्त मंत्री के रूप में यशवंत सिन्हा बजट पेश करते रहे हैं, जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी। होली के मौके पर रंग और गुलाल से सराबोर सिन्हा जी से एक बार किसी पत्रकार ने पूछा था कि होली और बजट में क्या फर्क है? होली के मूड में सने तत्कालीन वित्त मंत्री ने कहा था- कोई अंतर नहीं है। दोनों ही मजाक हैं। जब से यशवंत सिन्हा जी नाराजगी-मोड़ पर खुद को डाले हुए हैं, कसकर वित्त मंत्री की नीतियों और कामों को कोस रहे हैं। कोई उन्हें बताइए, इस बजट को भी मजाक ही समझें और जाने दें।

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