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गौरीशंकर राजहंस का लेख: बुद्ध के देश लाओस और कंबोडिया

इसमें कोई संदेह नहीं कि नरसिंहाराव प्रकांड विद्वान और अनेक भाषाओं के ज्ञाता थे। उन्हें इतिहास का अच्छा ज्ञान था। बड़ी देर तक अपने पास बैठाकर उन्होंने मुझे समझाया कि लाओस, कंबोडिया और वियतनाम जिन्हें इंडो चाइना या हिन्द चीन कहते हैं, भारत के निकट पड़ोसी हैं।

गौरीशंकर राजहंस का लेख: बुद्ध के देश लाओस और कंबोडिया
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अभी हाल में बुद्व पूर्णिमा के अवसर पर सारे संसार में खासकर भारत के विभिन्न भागों में बुद्व जयंती मनाई गई। सबसे बड़ा उत्सव बौद्व गया में मनाया गया और वहां सारे संसार के बौद्व अनुयायी एकत्रत हुए। मुझे एकाएक याद आ गया कि तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहाराव ने मुझे 1992 से 1996 तक लाओस और कंबोडिया में भारत का राजदूत बनाया था। मुझे सपने में भी यह उम्मीद नहीं थी कि प्रधानमंत्री मुझे इतना बड़ा सम्मान देंगे। बाद में उन्होंने मुझे बताया कि मैं जब 1984 से 1989 तक लोकसभा का सदस्य था तो प्रायः प्रतिदिन लोकसभा की डिबेट में भाग लेता था। इसी कारण उन्होंने मुझे इन देशों में भारत का राजदूत बनाया था। वैसे नरसिंहाराव से मेरा कोई परिचय नहीं था। परन्तु यह उनकी महानता थी कि मेरे जैसे मामूली व्यक्ति को उन्होंने इन देशों में भारत का राजदूत बनाया।

इसमें कोई संदेह नहीं कि नरसिंहाराव प्रकांड विद्वान और अनेक भाषाओं के ज्ञाता थे। उन्हें इतिहास का अच्छा ज्ञान था। बड़ी देर तक अपने पास बैठाकर उन्होंने मुझे समझाया कि लाओस, कंबोडिया और वियतनाम जिन्हें इंडो चाइना या हिन्द चीन कहते हैं, भारत के निकट पड़ोसी हैं। परन्तु दुर्भाग्यवश भारत ने उन पर कभी पूरा ध्यान नहीं दिया। उनका आग्रह था कि इन देशेां में जाकर मैं इन देशों के साथ भारत के संबंधों को मजबूत करूं।

सबसे पहले मैं लाओस पहुंचा। वहां के लोगों ने मेरा भरपूर स्वागत किया। उनकी शिकायत थी कि भारत ने वर्षो तक लाओस की अनदेखी की। नरसिंहाराव ने मुझे बताया था कि हिन्द चीन के ये तीनों देश लाओस, कंबोडिया और वियतनाम फ्रांस के उपनिवेश थे। इसलिए इन तीनों देशों पर फ्रांसीसी सभ्यता की अमिट छाप है। लाओस में लोगों की शक्ल एकदम भारतीय से मिलती जुलती है। नरसिंहराव ने मुझे कहा था कि इन तीनों देशो में भारत और चीन से जाकर लोग बसे थे। परन्तु धर्म और सभ्यता भारत से ही गई थी। इन तीनों देशों के लोग बौद्व धर्म को मानते हैं।

नरसिंहाराव ने मुझे पढ़ने के लिए कई पुस्तकें भी दी जिससे पता चला कि सम्राट अशोक के समय में हजारों बौद्व भिक्षु पैदल बुद्वम शरणम गच्छामि का उच्चारण करते हुए बर्मा, जिसे इन दिनों म्यांमार कहा जाता है होते हुए वहां से थाईलैंड गए। उन दिनों थाईलैंड का नाम सियांग था। हजारों बौद्व भिक्षु तो थाईलैंड में बस गए और सैंकड़ों बौद्व भिक्षु मेकांग नदी पार कर बड़ी बड़ी नावों में बैठकर लाओस, कंबोडिया और वियतनाम चले गए। ये अनगिनत बौद्व भिक्षु मेकांग नदी को देखकर बोल उठे मां गंगा। बाद में जब मेकांग और हिन्द-चीन के क्षेत्र फ्रांसीसियों के कब्जे में आए तब उन्होंने इसका नाम मेकांग रख दिया।

लाओस और कंबोडिया को देखकर मुझे हार्दिक प्रसन्नता हुई थी। वहां के लोग मंगोलियन प्रजाति के नहीं थे, बल्कि देखने में आर्य प्रजाति के लगते थे। इन तीनों देशों लाओस, कबोडिया और वियतनाम के साथ भारत के अटूट संास्कृतिक संबध रहे हैं। लाओस और कंबोडिया में भारत ने समय समय पर बौद्व धर्म का प्रचार किया। ऐसा ही उसने वियतनाम में भी किया था।

भारत में लोगों को अमेरिका और वियतनाम की लड़ाई की याद नहीं होगी। द्वितीय विश्वयुद्व के अंत में जब फ्रांस वियतनाम से निकलने लगा तो उसने अमेरिका से आग्रह कर कहा कि वह वियतनाम पर कब्जा कर ले। वर्षों तक अमेरिका और वियतनाम के बीच युद्व चलता रहा। यह युद्व भी बहुत रोचक था। अमेरिकी सेनाओं पर बम बरसा कर वियतनाम के सैनिक जो कद में छोटे होते थे, सुरंगों में छिप जाते थे और अमेरिकी फौज उन्हें ढूंढ नहीं पाती थी। पहाड़ियों पर चढ़कर वियतनाम की फौज ने अनगिनत अमेरिकी हवाई जहाजों को ध्वस्त कर दिया और फिर उनके कलपुर्जों को इकटठा कर नए लड़ाकू विमान बना लिए थे और इनके बल पर वे अमेरिकी सैनिकों को परेशान करते रहे। वियतनाम की लड़ाई वर्षों चली। इस दौरान भारत ने वियतनाम का पूरा साथ दिया जिसे अमेरिका और इंग्लैड ने पसन्द नहीं किया। अंत में इस लड़ाई से थककर अमेरिका ने वियतनाम से अपनी पराजय मान ली और चुपचाप अमेरिका वियतनाम से बेआबरू होकर निकल गया। अमेरिका के लिए यह बहुत शर्मनाक हार थी। परन्तु अमेरिकी जनरल यह समझ गए थे कि तत्काल की परिस्थितियों में वियतनाम को हराना असंभव है। वियतनाम का साथ लाओस और कंबोडिया ने भी दिया था। कुल मिलाकर इन छोटे देशों ने अमेरिका जैसे ताकतवर देश को नानी याद दिलवा दी। आज भी वियतनाम में जगह-जगह अमेरिकी सैनिकों के शवों के अवशेष पाए जा रहे हैं।

भारत की आजादी के बाद लाओस, कंबोडिया और वियतनाम से भारत के संबंध प्रगाढ़ होते गए। यहां यह याद रखना आवश्यक है कि इन देशों के साथ सबसे मधुर संबंध थाईलैंड के साथ हो गए। थाईलैंड में 90 प्रतिशत लोग बौद्व हैं और वे भारत को अत्यन्त ही सम्मान से देखते हैं। अकेले थाईलैंड की राजधानी बैंकाक में प्रायः एक लाख भारतीय किसी न किसी व्यवसाय में लगे हैं और वहां उन्हें कोई भी कठिनाई कभी नहीं होती है। कहने का अर्थ है कि ऐसी स्थिति में जब पाकिस्तान और चीन भारत को आंख दिखाते हैं तो भारत के पड़ोसी देश लाओस, कंबोडिया और वियतनाम भारत के पक्के मित्र भी हैं। चीन ने कई बार वितयनाम के तट पर भारतीय तेल कंपनियों को तंग करने का प्रयास किया। परन्तु भारत ने चीन को आंख दिखाकर चुप कर दिया और कहा कि भारत वियतनाम के साथ है।

भारत सरकार को इन देशों के साथ भारत के संास्कृतिक और ऐतिहासिक संबंधों को ध्यान में रखकर यह सुनिश्चत करना चाहिए कि भारत की इन देशों के साथ मित्रता प्रगाढ़ और अक्षुण बनी रहे।

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