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आतंकवाद के नये खतरे के खिलाफ हाें ब्रिक्स देश

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में आतंकवाद पर अपनी चिंता को रेखांकित कर दो टूक संदेश दिया है कि आतंकवाद का कोई भी रूप वैश्विक शांति, विकास व सुरक्षा के लिए खतरा है। इसके खिलाफ ब्रिक्स देश एकजुट होकर लड़ें। भारत का रुख स्पष्ट है कि आतंकी गुट का सत्ता तक पहुंचना समूचे विश्व के लिए खतरनाक प्रवृत्ति को बढ़ावा देगा। अफगानिस्तान में तालिबान जिस तरह से सत्ता पर काबिज हुआ है, वह मध्ययुगीन दौर की याद दिलाती है।

आतंकवाद के नये खतरे के खिलाफ हाें ब्रिक्स देश
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संपादकीय लेख

Haribhoomi Editorial : भारत ने ब्रिक्स सम्मेलन में आतंकवाद के खिलाफ ब्रिक्स देशों को मिलकर लड़ने का आह्वान ऐसे समय में किया है, जब वैश्विक आतंकी गुट तालिबान ने अफगानिस्तान की लोकतांत्रिक सरकार से बंदूक के दम पर सत्ता छीनी है। बेशक इसके लिए अमेरिका पर दोष मढ़ा जा रहा है, लेकिन तालिबान को मदद देने वाले मुल्क अधिक गुनगहगार हैं। अफगानिस्तान में तालिबान के अंतरिम सरकार में विश्व स्तर पर इनामी आतंकियों के शामिल होने के बाद से मध्य एशिया में शांति को लेकर चिंता बनी हुई है।

अफगानिस्तान में तालिबान सरकार जिस तरह के कट्टर फैसले ले रही है, सत्ता की भागीदारी में अफगानों व महिलाओं की अनदेखी की है, हर तरफ बंदूकधारियों की आवाजाही है और अफगानिस्तान को इस्लामिक अमीरात घोषित किया है, उससे भारत समेत लोकतंत्र व कानून के राज के समर्थक देशों की चिंता बढ़ना लाजिमी है। चूंकि अफगानिस्तान के नव निर्माण में भारत अहम भूमिका निभा रहा था, जो अब तालिबान के आने से लगभग डिरेल हो गया है, इसलिए भारत का कंसर्न बहुत अधिक है। तालिबान सरकार के साथ चीन और पाकिस्तान की नजदीकियां भारत के लिए आतंकवाद की चुनौतियां बढ़ाएंगी। ऐसे में ब्रिक्स सम्मेलन भारत के लिए ऐसा मौका है, जहां से वह चीन व रूस को अफगानिस्तान पर अपनी चिंता से अवगत करा दे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में आतंकवाद पर अपनी चिंता को रेखांकित कर दो टूक संदेश दिया है कि आतंकवाद का कोई भी रूप वैश्विक शांति, विकास व सुरक्षा के लिए खतरा है। इसके खिलाफ ब्रिक्स देश एकजुट होकर लड़ें। भारत का रुख स्पष्ट है कि आतंकी गुट का सत्ता तक पहुंचना समूचे विश्व के लिए खतरनाक प्रवृत्ति को बढ़ावा देगा। अफगानिस्तान में तालिबान जिस तरह से सत्ता पर काबिज हुआ है, वह मध्ययुगीन दौर की याद दिलाती है। 21 वीं सदी के विश्व में तालिबान का सरकार में आने का तरीका लोकतंत्र व मानवाधिकारों के संरक्षकों के लिए गंभीर नैतिक व वैचारिक प्रश्न हैं। ब्रिक्स सम्मेलन में चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग का आतंकवाद पर एक शब्द भी नहीं बोलना चीन के दोहरे रवैये को दर्शाता है। पाकिस्तान के संदर्भ में अक्सर गुड और बैड आतंकवाद कहा जाता था, पर अब यह चीन पर भी लागू होता प्रतीत हो रहा है। चीन ने जिस तरह तालिबान सरकार के साथ पींगे बढ़ाने की दिशा में बिना सोचे समझे जल्दीबाजी दिखाई है, उससे लग रहा है कि उसने भी आतंकवाद को गुड व बैड के नजरिये देखना शुरू किया है।

संयुक्त राष्ट्र के पांच स्थायी सदस्यों में से एक चीन का वैश्विक आतंकी गुट तालिबान की सरकार के साथ काम करने की इच्छा जताना आतंकवाद के खिलाफ यूएन के चार्टर का भी उल्लंघन है। वैश्विक शांति के लिए चीन को अपने फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए। ब्रिक्स सम्मेलन में रूस ने अफगानिस्तान का मुद्दा उठाया है। इस वक्त का यह सबसे जरूरी मुद्दा है। रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन ने अफगानिस्तान संकट के लिए बेशक अमेरिकी सेनाओं के हटने को जिम्मेदार ठहराया है, लेकिन यह दिखाया है कि वह आतंकवाद के खतरे के प्रति सचेत है। चीन की तरह वह शुतुरमुर्ग नहीं बना हुआ है। पुतिन ने कहा, 'अभी भी यह साफ नहीं है कि इससे क्षेत्रीय और वैश्विक सुरक्षा पर क्या असर पड़ेगा। यह अच्छी बात है कि ब्रिक्स देशों ने इस पर फोकस किया है।

चीन से नजदीकी के चलते रूस बेशक तालिबान सरकार के खिलाफ अपना स्टैंड अभी तक साफ नहीं किया है, पर जिस तरह वह भारत के साथ वार्ता कर रहा है और ब्रिक्स में तालिबानी आतंकवाद के खतरे के प्रति चिंता व्यक्त की है, उससे साफ है कि रूस खुलकर कर तालिबान के साथ नहीं जाएगा, वैश्विक हित में उसे जाना भी नहीं चाहिए। इस वक्त ब्रिक्स को भारत की चिंता को एड्रेस करना चाहिए और तालिबान सरकार के आने के बाद मध्य व दक्षिण एशिया में आतंकवाद के नए खतरे के खिलाफ ब्रिक्स देशों को साथ आना चाहिए।

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