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बीआरडी मेडिकल कॉलेज ट्रेजेडी: बच्चों की मौत के बाद उठे ये सवाल

देश को आजाद हुए 70 साल हो गए, लेकिन हमारे सामने स्वास्थ्य की समस्या ज्यों की त्यों बनी हुई है।

बीआरडी मेडिकल कॉलेज ट्रेजेडी: बच्चों की मौत के बाद उठे ये सवाल

गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में बच्चों की त्रासद मौत जहां अस्पताल के संचालन की जिम्मेदारी संभाल रहे शीर्ष सरकारी डॉक्टरों की गरीबों के प्रति संवेदनहीनता भी उजागर करती है, वहीं राज्यों की सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़ा करती है। यह मौत स्वास्थ्य समस्या के प्रति सरकारों की उदासीनता की भी पोल खोलती है।

यह एक विचारणीय प्रश्न है कि देश को आजाद हुए 70 साल हो गए, लेकिन हमारे सामने स्वास्थ्य की समस्या ज्यों की त्यों बनी हुई है। किसी भी सरकार ने स्वास्थ्य क्षेत्र की बेहतरी के लिए शिद्दत से काम नहीं किया, सभी खानापूर्ति ही करती दिखीं। स्वास्थ्य और शिक्षा क्षेत्र के प्रति सरकारों की उदासीनता आवाम पर भारी पड़ रही है।

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गरीबों की बहुत बड़ी आबादी खराब स्वास्थ्य व शिक्षा व्यवस्था को झेलने के लिए मजबूर है। इन दोनों ही अहम मुद्दों पर हम चर्चा भी तभी करते हैं, जब कोई बड़ी त्रासदी सामने आती है। सरकारी अस्पतालों में सुविधाओं की हालत देखकर लगता है कि गरीब जनता की सरकार और प्रशासन को परवाह नहीं है।

वरना गोरखपुर के बाबा राघवदास मेडिकल कॉलेज में तीन दिनों में 60 बच्चों की मौत नहीं होती। आखिर इन मौतों के लिए कोई तो जिम्मेदार है? इस अस्पताल में एक दिन में तीस बच्चों की मौत ऑक्सीजन की आपूर्ति ठप होने से हो गई। कॉलेज प्रबंधन की इससे बड़ी लापरवाही क्या हो सकती है।

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मीडिया में आई खबरों के मुताबिक अस्पताल में ऑक्सीजन की स्थिति का कॉलेज के प्रिंसिपल को पता था, लेकिन उन्होंने समय पर ऑक्सीजन की आपूर्ति बहाल रखने का इंतजाम नहीं किया। यूपी सरकार ने प्रिंसिपल को फौरी तौर पर निलंबित जरूर किया है, लेकिन 60 बच्चों की मौत छोटी बात नहीं है,

इस लिहाज से कॉलेज के प्रिंसिपल समेत प्रबंधन में शामिल सभी शीर्ष लोगों की भूमिका की जांच होनी चाहिए और दोषियों को ऐसी सख्त सजा दी जानी चाहिए, जिससे दूसरों को सबक मिले। अगर हमें सिस्टम को सुधारना है तो निलंबन जैसे उपायों से कुछ नहीं होने वाला है।

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यूपी के स्वास्थ्य सचिव की भमिका और अस्पताल में ऑक्सीजन की आपूर्ति करने वाली कंपनी की भी गंभीर जांच होनी चाहिए। बकाया की वसूली के लिए बिना प्रॉपर सूचना के ऑक्सीजन रोकना मानवीय जुर्म है। गोरखपुर मेडिकल कॉलेज कांड में जापानी बुखार के नाम से प्रचलित इंसेफ्लाइटिस की बात सामने आ रही है।

पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में इंसेफ्लाइटिस के मामले पिछले कई वर्षों से चुनौती बने हुए हैं। इस बुखार के चलते शून्य से 11 वर्ष के करीब दस हजार से अधिक गरीब बच्चों की मौत कुछ सालों में हो चुकी है। आखिर राज्य सरकारों ने इस ओर ध्यान क्यों नहीं दिया। इंसेफ्लाइटिस का पता पहली बार जापान में लगा था।

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वहां से यह दिमागी बुखार चीन तक फैला। फिर तमिलनाडु के रास्ते पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार तक आया। जापान और चीन ने इंसेफ्लाइटिस पर काबू पा लिया, तो आखिर हमारी सरकारों ने इस पर काबू पाने के लिए जापान-चीन की मदद क्यों नहीं ली? हमारे देश भर के सरकारी अस्पताल मूलभूत सुविधाओं की कमी से जूझ रहे हैं।

कहीं ऑक्सीजन की कमी है, कहीं दवा की, कहीं खून की, कहीं एंबुलेंस की, कहीं बेड की, कहीं ऑपरेशन इक्विपमेंट की, कहीं जांच मशीन की, कहीं डाक्टर की। देश के कई क्षेत्रों में तो अस्पताल ही नहीं हैं। एंबुलेंस नहीं होने की वजह से ही ओडिशा और बिहार में गरीब परिवारों को अपने मृत परिजनों का शव कंधों पर टांग कर ले जाना पड़ा था।

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इन कमियों के पीछे जहां स्वास्थ्य विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार का बड़ा हाथ है, वहीं सरकार की ओर से स्वास्थ्य बजट में कमी भी कारण है। केंद्र सरकार के राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन जैसे कार्यक्रम में भी भ्रष्टाचार सामने आते रहते हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा है कि गोरखपुर कांड के दोषी बख्शे नहीं जाएंगे, सख्त सजा मिलनी ही चाहिए,

लेकिन इसी बहाने उन्हें समस्त यूपी के अस्पतालों की व्यवस्था में आमूलचूल सुधार भी लाना चाहिए। बच्चों की मौत पर राजनीति करना भी दुर्भाग्यपूर्ण है। इससे विपक्ष की संवेदनहीनता ही जाहिर होती है। देशभर की सरकारों को समझना होगा कि गरीबों का सहारा सरकारी अस्पताल ही है।

इसलिए सरकारें भावुक होने के बजाय इसे सुधारने के लिए काम करें तो अच्छा है। इस समय सरकारी स्वास्थ्य क्षेत्र में व्यापक सुधार अौर बदलाव की तत्काल जरूरत है।

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