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एडवोकेट रघुबीर सिंह दहिया का लेख: बेमिसाल साहसी और अद्वितीय क्रांतिकारी मदनलाल ढिंगडा को शहादत दिवस पर नमन

मदनलाल ढींगडा का जन्म आठ फरवरी 1887 को अमृतसर पंजाब में एक अति संपन्न परिवार में हुआ। उनके पिता डॉ. दित्तामल पंजाब में सिविल सर्जन थे और अंग्रेजों के कट्टर भक्त थे। इसके बावजूद मदनलाल ने अपनी शहादत से क्रांतिकारियों में अलग स्थान हासिल किया।

एडवोकेट रघुबीर सिंह दहिया का लेख: बेमिसाल साहसी और अद्वितीय क्रांतिकारी मदनलाल ढिंगडा को शहादत दिवस पर नमन
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शहीद मदनलाल ढींगरा

आम जनता शहादतों की अपनी बेमिसाल विरासत को सदा ही पूरे आदर और सम्मान के साथ याद करती है। इसके विपरित शोषक भय से कांपने लगते हैं। बेचैनी में शोषक वर्ग महान देशभक्त क्रांतिकारी शहीदों के विचारों का इतिहास विस्मृति की मैली चादर से ढांपने की लगातार कुचेष्टा करते हैं। झूठ से सनी हुई कृतघ्नता की नुगरी चालें कीचड में डुबो देती हैं वहीं एक इंसान अपने आदर्श के फर्ज की चाहत में वंदे मातरम बोलता हुआ फांसी के तख्ते पर चढकर शहीद हो जाता है। शोषक ताकत का इस्तेमाल करता है, दमन और उत्पीडन के असहनीय जख्म देने के लिए जबकि शोषित की ताकत दमन को सहन करती है और उसकी समझ से शोषक को उखाड फेंकती है। एक महान क्रांतिकारी मदनलाल ढींगडा ने लंदन में कर्जन वायली को गोलियों से भूनकर दुनिया से चलता कर दिया। 17 अगस्त 1909 को इस अद्वितीय साहसी को लंदन की पेंटोन्विली जेल में फांसी पर लटकाकर उनके शव को चुपचाप वहीं पर दफना भी दिया गया। उनका बलिदान अमर है और उन्होंने इंसानी फर्ज से एक उच्च क्रांतिकारी आदर्श स्थापित किया, जो आने वाली पीढियों के लिए प्रेरणास्रोत बन गया।

मदनलाल ढींगडा का जन्म आठ फरवरी 1887 को अमृतसर पंजाब में एक अति संपन्न परिवार में हुआ। उनके पिता डॉ. दित्तामल पंजाब में सिविल सर्जन थे और उनकी मां मंतो दीव प्रतिभा संपन्न आदर्श महिला थी। मदनलाल ढींगडा के छह भाई और एक बहन थी। सबसे बडा भाई कुंदन लाल ढींगडा प्रसिद्ध बडा कपडा व्यापारी था और दूसरा भाई मोहनलाल ढींगडा ब्रिटेन में पढाई पूरी करने के बाद डॉक्टर बन चुका था। तीसरा भाई बिहारी लाल भी वहीं से पढा और डॉक्टर बना। चौथा भाई चमनलाल बेरिस्टर बना और पांचवां भाई न्यायाधीश बना। छठे नंबर पर आने वाले स्वयं मदनलाल ढींगडा 1906 में इंजीनियरिंग की पढाई के लिए लंदन इंग्लैंड गए और पूरे परिवार का नाम इतिहास की किताबों में दर्ज करवाकर 22 वर्ष की उम्र में आजादी के लिए फांसी के तख्ते पर चढकर शहीद हो गए। सबसे छोटा भाई भजनलाल वकील बना। मदनलाल ढींगडा की बहन काकी रानी का विवाहर बडे भूस्वामी के साथ हुआ था और इस तरह मदनलाल ढींगडा के परिवार सुशिक्षित और संपन्न था।

मदनलाल ढींगडा का दाखिला अमृतसर के जाने माने मिशन स्कूल में करवाया गया। स्कूल की शिक्षा के बाद उन्होंने अमृतसर के एक कॉलेज में दाखिला लिया तो देश की वास्तविकता समझ में आने लगी, जबकि उनके पिता राय साहब डॉ. दित्तामल कट्टर अंग्रेज भक्त थे। अपने पिता से विपरित मदनलाल की प्रकृति परिवार से अलग थी और वे अंग्रेज शासकों को नफरत की दृष्टि से देखते थे। इस प्रकार की परिस्थितियों को समझकर पिता डॉ. दित्तामल ने अपने पुत्र मदनलाल को अमृतसर के कॉलेज से निकालकर लाहौर के गर्वनमेंट कॉलेज में दाखिला करवाया ताकि पढाई लिखाई का वातावरण बदल जाए और मदनलाल की सोच यानी अंग्रेज सरकार के प्रति राजभक्ति के भावों का प्रदर्शन करे।

लाहौर कॉलेज में पढते हुए मदनलाल की मुलाकात एक उदारवादी रिटायर्ड अंग्रेज अधिकारी ओ ब्राउंन से हुई। उन्होंने मदनलाल की प्रतिभा को समझकर उन्हें पढने के लिए प्रेरित किया और विद्वान बनने की सलाह देते हुए कहा, ज्ञान और साहस की प्रतिभा दुनिया को बदल सकती है। पहले पढाई करते हुए अपने विवेक से समझो और फिर ब्रिटिश साम्राज्य की जडों पर पूरी ताकत से प्रहार करो। विशाल साम्राज्य जिसमें सूरज नहीं डूबता, सूख जाएगा। पिता डॉ. दित्तामल ने पुत्र मदनलाल को पढाई छोडकर वापस अमृतसर बुलाया लेकिन पुत्र ने वापस अमृतसर आने से इंकार कर दिया और लाहौर में अपनी पढाई जारी रखी। नाराज पिता ने खर्च भेजना बंद कर दिया तो मजबूरन अमृतसर ही आना पडा और बडे भाई कुंदनलाल के साथ कपडे का व्यापार करने लगे। व्यापार में मन तो लगना ही नहीं था इसलिए पिता ने आर्थिक मदद देनी चाही लेकिन साफ इंकार कर दिया। अपने बडे भाई से लाहौर जाकर पढने की इजाजत मांगी तो भाइयों ने पिता से बात कर मदनलालल को फिर से पढने के लिए लाहौर भेज दिया। इस तरह पंजाब यूनिवर्सिटी से मदनलाल ढींगडा ने स्नातक की।

मां की इच्छा पर मदनलाल ने 1905 में विवाह कर लिया लेकिन इंग्लैंड जाकर पढाई करने की इच्छा बलवती हो रही थी और जुलाई 1906 में समुद्री मार्ग से इंग्लैंड पहुंचकर अपने बडे भाई कुंदनलाल के पास रहने लगे। बडे भाई के प्रयास से मदनलाल को 14 अक्टूबर 1906 को लंदन के एक इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला मिला और पढाई शुरू हो गई। एक दिन लंदन में घूमते हुए मदनलाल ढींगडा को इंडिया हाउस की बिल्डिंग दिखाई दी तो वहां श्याम जी कृष्ण वर्मा से मिले, जो इंडिया हाउस के संस्स्थापक थे। वे क्रांतिकारियों का तहेदिल से आदर सम्मान करते थे। मदनलाल ने उनसे बातचीत की और पहली ही मुलाकात में उनके महान व्यक्तित्व में अंग्रेजों के राज के प्रति साक्षात घृणा देखी। वे लंदन में पढने वाले भारतीय विद्यार्थियों में देशप्रेम की भावना जागृत कर ब्रिटिश सामाज्य की जडे उखाड फेंकने के लिए प्रेरित करते थे। मदनलाल ढींगढा उनसे काफी प्रभावित हुए और फिर तो इंडिया हाउस रोज का आना जाना होने लगा।

इस दौरान गुरु गोविंद सिंह की जन्मशती के अवसर पर पंजाब केसरी लाला लाजपतराय इंग्लैंड आए तो उन्होंने लंदन के इंडिया हाउस में भारतीय छात्रों को संबोधित किया। वहां पर मदनलाल भी उन्हें सुन रहे थे। लाला जी के राष्ट्रीय विचारों से प्रभावित होकर उन्होंने कार्यक्रम के बाद लाला लाजपत राय से लंबी बातचीत की। लाला लाजपतराय ने उन्हें पहले अपनी पढाई पूरी करने की सलाह दी और लालाजी के भाषण से प्रभावित होकर मदनलाल ढींगडा रिवाल्वर चलाने का अभ्यास करने लगे। मदनलाल ने मन ही मन ये विचार किया कि उनके पिता अंग्रेजों के भक्त हैं और पूरी तरह से उनके वफादार हैं। वे अंग्रेजों शाषकों से दोस्ती करना गर्व समझते हैं। ऐसे भारतीय ही अंग्रेजी साम्राज्य की जडें भारत भूमि पर जमाए रखने के लिए जिम्मेदार हैं और सरकार अपने व्यापक हितों के लिए इन चापलूसाें को अपनी जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल भी करती है। मदनलाल की लंदन में जवाहरलाल नेहरू, सिकंदर हयात खां और सैफुद्दीन किचूल से भी मुलाकात हुई। वे भगतसिंह के चाचा सरदार अजीत सिंह के क्रांतिकारी कार्यों से अत्यंत प्रभावित हुए और उसे महान आदर्श के रूप में देखते थे।

उस समय अंग्रेज सरकार ने तीन सदस्यों की एक समिति गठित की थी। ये समिति भारतीय छात्रों में अपने ही देश के लिए नफरत पैदा करने के प्रयास करती थी। सर कर्जन वायली इस समिति के सलाहकार थे। वायली एक चालाक, धूर्त, मक्कार, नुगरा व्यक्ति था। वह लंदन में भारत के सचिव का भी सलाहकार था। जो विद्यार्थी भारत की आजादी के लिए काम करते थे, वह उन्हें कडा दंड दिलवाता था, इसलिए भारतीय विद्यार्थी उसे घृणा की नजरों से देखते थे। मदनलाल ढींगडा ने मन ही मन उन्हें ठिकाने लगाने का निश्चय कर लिया था और अपनी इस योजना पर काम करना शुरू कर दिया था।

1 जुलाई 1909 को लंदन के इंस्टीट्यूट आफ इंपीरियल स्टडीज के जहांगीर हाउस में इंडियन नेशनल एसोसिएशन के समारोह में कर्जन वायली ने भाग लिया। 11 बजे जब समारोह समाप्त हुआ तो लगभग 250 मेहमान मौजूद थे। मौका देखकर मदनलाल ढींगडा सर कर्जन वायली के ठीक सामने गए और दो गोलियों से उनका मुंह फाड दिया। इसके बाद दो गोलियां उनकी छाती पर चलाकर उन्हें हमेशा के लिए मौत की नींद सुला दिया। इसी दौरान एक भारतीय डॉ. लालका कायली को बचाने के लिए मदनलाल पर झपटा तो उस महान क्रांतिकारी ने उसे भी गोली मार दी। कायली के तो वहीं पर प्राण पखेरू उड गए लेकिन डा. लालका की मौत अस्पताल ले जाते हुए रास्ते में हुई। जहांगीर हाल में अफरा तफरी मच गई और महान साहसी क्रांतिकारी मदनलाल ढींगडा को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। डॉक्टरी चेकअप के दौरान उनकी नब्ज तो सामान्य थी लेकिन जांच करने वाला डॉक्टर कांप रहा था। मदनलाल उनकी हालत देखकर मंद मंद मुस्कुरा रहे थे।

इसके बाद अद्वितीय साहसी मदनलाल ढींगडा का नाम पूरी दुनिया को पता चल गया। भारत समेत पूरी दुनिया के क्रांतिकारी संगठनों में आशा की लहर दौड गई लेकिन अंग्रेज भक्त डॉ. दित्तामल ने मदनलाल अपना पुत्र मानने से ही इंकार कर दिया। लंदन के कैक्स्टन हाल में पांच जुलाई 1909 को अंग्रेज सरकार के प्रति उदार भारतीय ढींगडा के इस महान कार्य की निंदा करते हुए एक प्रस्ताव पारित कराना चाहते थे लेकिन सावरकार ने इस प्रस्ताव का तीखा विरोध किया। इस पर एक अंग्रेज ने सावरकर के मुंह पर घूंसा मारा तो वहीं पर मौजूद एक दूसरे साहसी भारतीय युवक ने अंग्रेज युवक एडवर्ड पामर केसिर के सिर पर डंडा मारकर हिसाब बराबर कर दिया। सभा में अव्यवस्था होने पर बिना प्रस्ताव पास ही सभा खत्म हो गई। इतना ही नहीं वीर सावरकर ने छह जुलाई को एक अखबार में पत्र लिखकर स्पष्ट किया कि न्यायालय ने उसे दोषी करार नहीं दिया है। जब तक इस केस का फैसला नहीं आ जाता तब तक प्रस्ताव में मदनलाल को अपराधी की संज्ञा न दी जाए।

सरोजनी नायडू के भाई वीरेंद्रनाथ ने मदनलाल ढींगडा के कार्य को देशभक्ति और महानता का काम बताया, जबकि मदनलाल ढींगडा के पिता डॉ. दित्तामल ने अंग्रेज अधिकारियों को लिखा कि, अंग्रेज सरकार के प्रति उनकी निष्ठा पर शक ना किया जाए। मदनलाल तो बचपन से ही मानसिक रूप से सनकी और असंतुलित था। उस घटना के बाद इंडिया हाउस को बंद कर दिया गया और छात्रों की गतिविधियों के केंद्र श्याम कृष्ण वर्मा ने उस भवन को बेच दिया और मदनलाल के काम की प्रशंसा की।

10 जुलाई 1909 को उसे अदालत में पेश किया गया। परिवार ने भरसक प्रयास किया कि कोर्ट में संदेह का आभास आधार बन जाए कि मदनलाल एक मानसिक रूप से अंसतुलित युवक है। इसके विपरित चिकित्सक ने उसे अत्यंत संतुलित बताया। वायली की सचिव ऐमा जोसेफ बैक ने मदनलाल का बचाव किया। कॉलेज के दो प्रोफेसर ने भी मदनलाल के चरित्र की पूरी सराहना की। पुलिस ने अनेक साक्ष्य अदालत के सामने रखे। मदन मोहन सिन्हा और पत्रकार डगलस थॉरबोर्न को पुलिस ने गवाह के रूप में पेश किया और दोनों ने मदनलाल के खिलाफ गवाही दी। देशभक्त ढींगडा ने अदालत में कहा कि-मैं स्वीकार करता हूं मैंने कर्जन वायली की हत्या सोच समझकर की है। भारतीय युवकों को फांसी देने और काले पानी भेजने के अमानवीय यातनाओं का प्रतिशोध लेने के लिए ये कत्ल किया है। अंग्रेस सरकार की अदालत का मुझ पर कोई अधिकार नहीं है।

इसके बाद न्याय का गला घोंटकर अदालत ने न्याय का ड्रामा बनाया। 23 जुलाई 1919 को फांसी की सजा सुनाई गई और महज दस दिन की कार्रवाई अदालत में चली। 17 अगस्त 1909 को फांसी की तिथि मुकर्रर की गई। सुनवाई के दौरान मदनलाल ने कोर्ट में दो ऐतिहासिक बयान दिए थे। मेरे खिलाफ मुकदमा चलाने का अंग्रेज सरकार को कोई अधिकार नहीं है। अंग्रेजों ने मेरे देश को गुलाम बनाकर निर्मम शोषण किया है और लगभग आठ करोड भारतीयों को डेढ सौ साल में मौत के घाट उतारा है। सौ मिलियन डॉलर का धन भारत से लूटकर ब्रिटेन में लाया गया है और आजादी की मांग करने वालों को फांसी पर चढाया जा रहा है। देश की जनता के सूखे शरी से खून निचोडकर बेरहमी से शोषण करने की ब्रिटिश सरकार अपराधी है। अंग्रेज सरकार कांगो और रूस में मानवता के हनन की बातें करती है जबकि भारत के लाखों लोगों को मानव अधिकारों की रक्षा के बहाने मौत के मुंह में झोंक रहे हैं। ब्रिटेन को अपने कब्जे में लेने की नीयत से आए जर्मन को गोली से मार देने पर आप ब्रिटेन को नागरिक को देशभक्त मानते हो लेकिन जब मैं अंग्रेज को गोली मारता हूं तो मुझे देशभक्त की श्रेणी में क्यों नहीं रखा जाता?

17 अगस्त 1909 को भारत के महान क्रांतिकारी मदनलाल ढींगडा को लंदन की पेन्टोन्विली जेल में फांसी के तख्ते पर चढा दिया गया। वंदे मातरम बोलते हुए वो फांसी के तख्ते पर झूल गए। उन जैसे वीरों की शहादत से 15 अगस्त 1947 को भारत को आजादी मिली। उनकी शहादत के 67 वर्ष बाद 1976 में उनके अवशेष कब्र से निकाले गए और 67 वर्ष बाद भारत के इस महान सबूत के अवशेषों को 13 दिसंबर 1976 को पालम हवाई अड्डे पर देश की धरती पर पहुंचने का अवसर मिला। 25 दिसंबर को उनके अवशेषों को सम्मान अमृतसर में भारत की धरती मां की गोद नसीब हुई। ऐसे महान वीर क्रांतिकारी योद्धा के शहादत दिवस पर उन्हें शत शत नमन है।

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