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प्रमोद भार्गव का लेख : कालाधन चिंता का सबब बरकरार

स्विट्जरलैंड के केंद्रीय बैंक द्वारा जारी सालाना रिपोर्ट के आंकड़ों के मुताबिक भारतीयों का निजी एवं कंपनियों का धन स्विस बैंकों में साल 2020 में बढ़कर करीब 20,700 करोड़ रुपये हो गया है। यह धन स्विस बैंकों की भारतीय शाखाओं और अन्य वित्तीय संस्थानों के जरिये पहुंचाया गया। स्विस नेशनल बैंक के अनुसार यह धन 2019 की तुलना में 3.12 गुना ज्यादा है। जब देश कोरोना की महामारी से जूझ रहा था, तब भारतीय अवैध धन के जमाखोर बेशर्मी से स्विस बैंकों में धन जमा करने में लगे थे। भारतीय ग्राहकों का सकल कोष 2019 में 6,625 करोड़ रुपये था, जो एक वर्ष में बढ़कर 14,075 करोड़ रुपये हो गया। 13 वर्ष में यह सार्वाधिक बढ़ोत्तरी है।

प्रमोद भार्गव का लेख : कालाधन चिंता का सबब बरकरार
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प्रमोद भार्गव 

प्रमोद भार्गव

कालेधन की महिमा अपरम्पार है। इसे देश में ही रोकने के लिए नरेंद्र मोदी सरकार ने कई नए कानून बनाए लेकिन नतीजा सिफर रहा। देशी लक्ष्मी का विदेशी ठिकाना बनना आखिरकार रुका नहीं। यह देश की कानून और अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का सबब है। स्विट्जरलैंड के केंद्रीय बैंक द्वारा जारी सालाना रिपोर्ट के आंकड़ों के मुताबिक भारतीयों का निजी एवं कंपनियों का धन स्विस बैंकों में साल 2020 में बढ़कर करीब 20,700 करोड़ रुपये हो गया है। यह धन स्विस बैंकों की भारतीय शाखाओं और अन्य वित्तीय संस्थानों के जरिये पहुंचाया गया। स्विस नेशनल बैंक के अनुसार यह धन 2019 की तुलना में 3.12 गुना ज्यादा है। जब देश कोरोना की महामारी से जूझ रहा था, तब भारतीय अवैध धन के जमाखोर बेशर्मी से स्विस बैंकों में धन जमा करने में लगे थे। भारतीय ग्राहकों का सकल कोष 2019 में 6,625 करोड़ रुपये था, जो एक वर्ष में बढ़कर 14,075 करोड़ रुपये हो गया। 13 वर्ष में यह सार्वाधिक बढ़ोत्तरी है। आंकड़ों से साफ है, नए कानूनों का कोई असर नहीं पड़ा। इन बैंकों में केवल भारत का ही कालाधन जमा हो ऐसा नहीं है। यूरोपीय देशों का भी धन जमा है। इस मामले में ब्रिटेन अव्वल है। ब्रिटेन के नागरिकों का 377 अरब स्विस फ्रैंक, अमेरिका के 152 अरब फ्रैंक जमा हैं। शीर्ष 10 अन्य देशों में वेस्टइंडीज, फ्रांस, हांगकांग, जर्मनी, सिंगापुर, लक्जबर्ग, आइलैंड व बहामास शामिल हैं। कालाधन मामले में भारत 51 वें स्थान पर है।

राजग सरकार सत्ता में आई है तब से लगातार यह दावा करती रही है कि विदेशों में जमा काला धन देश में वापस लाने और देश के भीतर कालाधन पैदा न हो इस मकसद पूर्ति के लिए ठोस व कारगर कोशिशें की गई हैं। बावजूद न तो कालाधन वापस आया और न ही नया कालाधन बनने से रुक पाया। स्विस नेशनल बैंक की ताजा रिपोर्ट ने यह खुलासा कर दिया है। हालांकि राजग सरकार ने कालाधन पर अंकुश लगे, इस दृष्टि से ऐसे कानूनी उपाय जरूर किए हैं, जो कालेधन के उत्सर्जन पर अंकुश लगाने वाले हैं। लेकिन स्विस बैंक द्वारा जारी आंकड़ों से साफ हुआ है कि ये उपाय महज हाथी के दांत हैं। स्विस बैंकों में जमा करने वाले ज्यादातर भारतीय मूल के वे लोग है, जिन्होंने किसी अन्य देश की नागरिकता ली हुई है या फिर वे अनिवासी भारतीयों की श्रेणी में आते हैं। इसके अलावा मूल भारतीय नागरिक भी कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए स्विस बैंकों में धन जमा कर सकते हैं। इसलिए केंद्र सरकार इसे कालाधन नहीं मानती है। वैसे भी अब स्विट्जरलैंड पहले की तरह टैक्स हैवन देश नहीं रहा है।

वह दुनिया के दबाव में खाताधारकों का डाटा साझा करने लगा है। जनवरी 2019 से भारत को भी भारतीयों के खातों की रियल टाइम जानकारी मिलनी शुरू हो गई है। लिबरललाइज्ड रेमिटेंस स्कीम (एलआरएस) के तहत करीब 40 प्रतिशत राशि बाहर भेजने की सुविधा पहले से ही लागू है। इस योजना को संप्रग सरकार के कार्यकाल में पूर्व वित्तमंत्री पी. चिदंरबरम ने लागू किया था। इसके तहत कोई भी व्यक्ति प्रतिवर्ष 2.50 लाख डॉलर तक की राशि भारत से बाहर भेज सकता है। यहां सवाल उठता है कि भारतीय धन को बाहर भेजने की ऐसी उदार सुविधाओं पर अब तक अंकुश क्यों नहीं लगाया गया? यही नहीं मोदी सरकार के कार्यकाल में नीरव मोदी, मेहुल चैकसी, विजय माल्या और ललित मोदी भी करोड़ों-अरबों का चूना लगाकर आसानी से निकल भागे। इन सब हालातों से परिचित होकर साफ होता है कि विदेशों से कालेधन की वापसी का वादा तो पूरा हुआ नहीं, इसके उलट भगोड़े देश की जनता की पसीने की कमाई लेकर चंपत हो गए। 2016 में हुई नोटबंदी भी कालेधन के निर्माण पर कोई अंकुश नहीं लगा पाई।

हालांकि मोदी सरकार ने कालेधन पर अंकुश के लिए 'कालाधन अघोषित विदेशी आय एवं जायदाद और आस्ति विधेयक-2015' और कालाधन उत्सर्जित ही न हो, इस हेतु 'बेनामी लेनदेन (निषेधद्ध विधेयक अस्तित्व में ला दिए हैं। ये दोनों विधेयक इसलिए एक दूसरे के पूरक माने जा रहे थे, क्योंकि एक तो आय से अधिक काली कमाई देश में पैदा करने के स्रोत उपलब्ध हैं, दूसरे इस कमाई को सुरक्षित रखने की सुविधा विदेशी बैंकों में हासिल है। लिहाजा कालाधन फल फूल रहा है। दोनों कानून एक साथ वजूद में आने से यह उम्मीद जगी थी कि कालेधन पर कालांतर में लगाम लगेगी, लेकिन नतीजा ढांक के तीन पात रहा। सरकार ने कालाधन अघोषित विदेशी आय एवं जायदाद और कर आरोपण-2015 कानून बनाकर कालाधन रखने के प्रति उदारता दिखाई थी। इसमें विदेशों में जमा अघोषित संपत्ति को सार्वजानिक करने और उसे देश में वापस लाने के कानूनी प्रावधान हैं। दरअसल कालेधन के जो कुबेर राष्ट्र की संपत्ति राष्ट्र में लाकर बेदाग बचे रहना चाहते हैं, उनके लिए अघोषित संपत्ति देश में लाने के दो उपाय सुझाए गए हैं।

वे संपत्ति की घोषणा करें और फिर 30 फीसदी कर व 30 फीसदी जुर्माना भर कर शेष राशि का वैध धन के रूप में इस्तेमाल करें। इस कानून में प्रावधान है कि विदेशी आय में कर चोरी प्रमाणित हाती है तो 3 से 10 साल की सजा के साथ जुर्माना भी लगाया जा सकता है। इसी प्रकृति का अपराध दोबारा करने पर तीन से 10 साल की कैद के साथ 25 लाख से लेकर एक करोड़ रुपये तक का अर्थ-दण्ड लगाया जा सकता है। जाहिर है, कालाधन घोषित करने की यह कोई सरकारी योजना नहीं थी। अलबत्ता अज्ञात विदेशी धन पर कर व जुर्माना लगाने की ऐसी सुविधा थी, जिसे चुका कर व्यक्ति सफेदपोश बना रह सकता है। ऐसा ही उपाय प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव ने देशी कालेधन पर 30 प्रतिशत जुर्माना लगाकर सफेद करने की सुविधा दी थी। इस कारण सरकार को करोड़ों रुपये बतौर जुर्माना मिल गए थे व अरबों रुपये सफेद धन के रूप में तब्दील होकर देश की अर्थव्यस्था मजबूत करने के काम आए थे।

सरकार का दावा है कि अंतरराष्ट्रीय दबाव और भारत के निवेदन पर स्विट्जरलैंड सरकार से जो समझौते हुए हैं, उनके तहत स्विस बैंकों में भारतीयों के खातों की जानकारी मिलना शुरू हो गई है, लेकिन इस जानकारी के मिलने के बाद भी कालेधन की वापसी शुरू नहीं हुई। हालांकि ये जानकारियां स्विट्जरलैंड के यूबीए बैंक के सेवानिवृत कर्मचारी ऐल्मर ने एक सीडी बनाकर जग जाहिर कर दी हैं। इस सूची में 17 हजार अमेरिकियों और 2000 भारतीयों के नाम दर्ज हैं। बीते सात सालों में राजग सरकार एसआईटी के गठन और दो नए कानून बना देने के बाबजूद इस दिशा में कोई कारगर पहल नहीं कर पाई और न ही सूची में दर्ज नाम सार्वजनिक किए। यही वजह है कि कालाधन वापसी की बजाय, जाने का सिलसिला बना हुआ है। सरकार को इसे रोकना चाहिए।

(लेखक पत्रकार व साहित्यकार हैं, यह उनके अपने विचार हैं।

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