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रमेश ठाकुर का लेख : इमरजेंसी के काले अध्याय

आपातकाल के भुक्तभोगी बताते हैं कि उस दौरान परिंदों के चेहकने की भी आवाजें सुनाई नहीं देती थी। सड़कों पर दिखते ही लोगों को हवालातों में डाल दिया जाता था। ये तक नहीं पूछा जाता था कि वह घर से बाहर क्यों निकले?

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इंदिरा गांधी

रमेश ठाकुर

इमरजेंसी के इक्कीस महीनों की विभीषिका आज भी कई तरह की सवाल उठाती है, लेकिन उसके जवाब किसी के पास नहीं होते। इसलिए सवाल, जवाब मिलने से पहले ही ठहर जाते हैं। दरअसल, इमरजेंसी के बदनुमा और काले पन्नों को कोई पलटना नहीं चाहता। आपातकाल के दिन देखे तो नहीं, लेकिन उसका कुछ-कुछ एहसास कोरोना संकट में लगे लाॅकडाउन ने जरूर कराया है। हालांकि आपातबंदी की तुलना लाॅकबंदी से कतई नहीं की जा सकती। दोनों के किस्से भिन्न हैं, लेकिन उपजे संकट के बाद की गाथा दोनों गाते हैं। आपातकाल का दंश झेलने वाले लोग आज भी बताते हैं उन काली रातों की दर्दभरी दासतां।

आपातकाल के भुक्तभोगी बताते हैं कि उस दौरान परिंदों के चेहकने की भी आवाजें सुनाई नहीं देती थी। सड़कों पर दिखते ही लोगों को हवालातों में डाल दिया जाता था। ये तक नहीं पूछा जाता था कि वह घर से बाहर क्यों निकले? तानाशाही कैसी होती है उसे मौजूदा वक्त में हम उत्तर कोरियाई के किम जोंग के किस्सों से भांपते हैं और अंदाजा लगाते हैं। सद्दाम हुसैन के तानाशाही किस्से भी उनके जीवित रहते हम लोगों ने सुने। उनके इशारों के बिना पेड़ों के पत्ते भी नहीं हिलते। इंदिरा गांधी का राजनीति करियर जब डावाडोर हुआ तो वह कितनी बौखला गईं, आम जनता पर ही अपनी खींस निकालने लगी। आपातकाल लगाकर उन्हें बेकसूर लोगों का जीवन घरों में कैद कर दिया। सख्ती ऐसी थी कि कोई उनसे सवाल भी नहीं कर सकता था। दूरसंचार माध्यमों को बंद कर दिया गया था। मीडिया-अखबारों पर सेंसरशिप लगा दी गई।

निश्चित रूप से आपातकाल देश के लिए ऐसा काला अध्याय है जो भूले से भी नहीं भूलाया जाता। आज से 45 वर्ष पूर्व यानी 25 जून 1975 से लेकर 21 मार्च 1977 तक 21 महीने की अवधि के लिए समूचे हिंदुस्तान में आपातकाल लगाया गया था। तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कहने पर भारतीय संविधान की धारा 352 के अधीन आपातकाल की घोषणा की थी। वह ऐसा दौर था जब समाजवाद की गूंज पूरे भारत में सुनाई दे रह थी। कांग्रसियों के लिए हर पल मुसिबत होता जा रहा था। पूरा विपक्ष इंदिरा गांधी और उनकी पार्टी के लिए आंदोलित होकर सड़कों पर उतरा हुआ था। आंदोलन की आवाज इतनी बुंलद थी जिसे देख इंदिरा गांधी को मजबूरन आपातकाल लगाना पड़ा था।

बहरहाल, आपातकाल के पीछे एक खास वजह भी थी। वजह थे राजनारायण। हर ओर इंदिरा बनाम राजनारायण की आवाजें ही सुनाई देती थीं। राजनारायण इंदिरा गांधी के राजनीतिक करियर पर ग्रहण बनकर मंडरा रहे थे। उनके द्वारा किए मुकदमे ने इंदिरा गांधी पर छह साल के लिए चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाया गया था। आपातकाल लगने के दो सप्ताह पहले ही इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जगमोहन लाल सिन्हा ने अपने निर्णय में इंदिरा गांधी को उत्तर प्रदेश के जिले रायबरेली की अपनी परंपरागत संसदीय क्षेत्र से सांसद के रूप में चुनाव को अवैध करार देकर सियासत में खलबली मची दी थी। सांसदी से उनकी बेदखल होने के आदेश पारित हो चुके थे। उन पर आरोप लगे थे कि उन्होंने चुनावों में धांधली की है।

इंदिरा पर लगे आरोप की जांच हुई तो उसमें वह दोषी भी पाई गईं। अदालत ने उन पर छह साल तक किसी भी तरह के चुनाव लड़ना प्रतिबंधित कर दिया। उसके उनके लिए राज्यसभा होकर संसद में पहुंचने के रास्तों में भी ताले पड़ गए। अब करें तो क्या करें? उनके पास प्रधानमंत्री पद छोड़ने के सिवा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा। तभी खुन्नस में आकर इंदिरा ने 25 जून, 1975 की आधी रात को आपातकाल लागू करने की घोषणा करके अपने तानाशाही होने का परिचय दे दिया। विपक्ष के नेता और देश की जनता समझ ही नहीं पाए कि आखिर उन्होंने ऐसा क्यों किया। आपातकाल के बाद इंदिरा ने फौज को आदेश देकर अपने सभी विरोधी नेताओं को जेलों में डाल दिया गया।

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई, लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी जैसे कदावर नेताओं से लेकर समाजवाद का नारा बुलंद करने वाले व जनता पार्टी के नेताओं को जेलों में ठूंस दिया गया। नेताओं के अलावा उनके उस तानाशाह फैसले ने हिंदुस्तान का जो हाल किया, वह भी किसी से छिपा नहीं? अर्थव्यवस्था औंधे मुंह गिर गई। रोजमर्राओं की वस्तुओं का अकाल पड़ गया। चिकित्या व्यवस्थाएं चरमरा गईं। स्कूल-कालेजों में ताले पड़े। सार्वजनिक स्थानों पर घूमना पूर्ण प्रतिबंधित कर दिया गया। आपातकाल के भुक्तभोगी नेताओं की संख्या आज भी अनगिनत है। वह उन दिनों के अक्स को याद करके आज भी सहम जाते हैं। फिलहाल उन दिनों का थोड़ा सा एहसास दो महीने देशभर में लगाए गए लाॅकडाउन ने करवाया है, लेकिन युवा पीढ़ी तो आपातकाल की विभीषिका से एकदम अपरिचित ही है। इमरजेंसी का मतलब उन्हें नहीं पता। उस काले दौर से जिन लोगों का परिचय हुआ था। वह कहते हैं वैसे दिन किसी को न देखने को मिले। आपातकाल की विभीषिका को आने वाला वक्त कैसे भुगतेगा, पीढ़ियां किन पीड़ाओं से गुजरेंगी, उसकी जरा भी परवाह नहीं की गई।

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