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डा. रमेश ठाकुर का लेख : भाजपा की अंतिम लड़ाई कठिन

ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक सबसे पुराना और संघर्षशील चेहरा है, जिसका बंगाल की मानष माटी से जो नाता है उसके सामने भाजपा की तुलना करना बेमाने होगा। वैसे भी कांग्रेस की नेता के रूप में अपना सियासी जीवन शुरू करने के बाद ममता बनर्जी ने बहुत संघर्ष किये और कांग्रेस से अलग होने के अपनी अलग पार्टी बनाकर इस मुकाम तक पहुंची कि आज पश्चिम बंगाल में शासक के रूप में काबिज हैं। ममता के सामने इस चुनाव में गढ़ बचाने की चुनौती होगी।

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राजस्थान भाजपा

डा. रमेश ठाकुर

करीबन राज्यों में जीत का स्वाद चखने के बाद भाजपा की अंतिम लड़ाई सिर्फ पश्चिम बंगाल से ही बची है। कमोबेश, वह लड़ाई भी अंतिम दौर में है। बीते आम चुनाव में करिश्माई प्रदर्शन कर 18 सीटें जीतकर भाजपा का आत्मविश्वास सातवें आसमान पर है। होना भी चाहिए, जहां दो सीटें हों, वहां आधे से ज्यादा सीटें हासिल कर लें, तो वहां की जनता का मिजाज बड़ी आसानी से भांपा जा सकता है। पश्चिम बंगाल की अवाम प्रदेश में बदलाव चाहती है जिसका मुख्य कारण है उनके मौलिक अधिकारों और हकों पर बाहरी लोगों का जबरन कब्जा करना या करवाना? प्रामाणिक रूप से यह आरोप सिद्ध भी हो चुका है कि बंगालियों के हक पर सीमा पार के अवैध बांग्लादेशी लगातार कब्जा करते जा रहे हैं। प्रदेश में बढ़ते आपराधिक मामलों में उनकी प्रत्यक्ष रूप से संलिप्ताओं का सामने आना सिस्टम के लिए चुनौती भी है।

इन घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए समाधान खोजा जाना चाहिए था, लेकिन नहीं खोजा गया। मौजूदा हुकूमत वोट बैंक के खिसकने के डर से इस मसले पर कभी कोई एक्शन नहीं ले पाई। मामला बढ़ते-बढ़ते नासुर हो गया। एकाध दशक में पूर्वी बांग्लादेश की आधी आबादी सीमावर्ती बंगाल की सीमाओं में आकर बस गई। अगर बंगाल में भाजपा सत्ता में आती है तो बंगाली अस्मिता को वह विराट स्वरूप दे सकती है। वैसे भी भाजपा नेता आम बंगाली के दिमाग में यह बात बिठा रहे हैं कि भाजपा श्यामा प्रसाद मुखर्जी की बनाई बंगाल की ही पार्टी है। जो बंगाल के हितों के लिए संपूर्ण तरीके से समर्पित है। 2019 के लोकसभा चुनाव में जब भारतीय जनता पार्टी ने उम्मीद से अच्छा प्रदर्शन किया तो वहां की जनता को एक आस जगी कि अब शायद उनकी समस्याओं का निदान होगा। बंगाल में भाजपा की लगातार सक्रियता के बाद वहां के लोगों का रुझान भाजपा की ओर बढ़ा। ये देखकर ममता बनर्जी बौखला गईं। अपने किले को बचाने की चुनौती उनके समक्ष खड़ी हो गई।

भाजपा के लिए बंगाल के अलावा असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी को जीतना भी प्राथमिकताआंे में है। पुदुचेरी में हाल में सत्ता का परिर्वतन हुआ है। कांग्रेस नंबर गेम में पिछड़कर सत्ता गंवा चुकी है। गनीमत ये रही कि विधानसभा का कार्यकाल तकरीबन पूरा हो चुका था, नहीं तो भाजपा आसानी से सरकार बना लेती। फिलहाल वहां भाजपा के चांस हैं। असम में उनकी सिटिंग सत्ता है, जिसे यथावत रखना भी जरूरी होगा, लेकिन माहौल पिछले विधानसभा चुनाव जैसा नहीं दिखाई पड़ता। मौजूदा सरकार से स्थानीय लोगों में कुछ नाराजगी है। वहीं, विपक्षी दल भी कड़ी टक्कर दे रहे हैं। देखा जाए चुनाव बेशक पांच राज्यों में हो रहे हैं, लेकिन चर्चा का केंद्र बंगाल ही है। फिलहाल दो मई वह मुकर्रर तारीख है जिस दिन ये तय होगा कि बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पपुडुचेरी की जनमानस किस दल को सत्ता की बागडोर सौंपेगी। गौरतलब है, बंगाल में भाजपा की स्थिति पिछले दिसंबर तक तब बहुत अच्छी थी। तब तक किसान आंदोलन पर नहीं डटे थे। कहावत है सियासत में पासा बदलते देर नहीं लगती है। कहावत चरितार्थ भी हो गई। आंदोलन के बाद स्थिति अचानक बदल गई। आंदोलन कृषि के नए कानूनों के विरोध में खड़ा हुआ है। बात नहीं बनने पर आंदोलन से निकली लपटें उन राज्यों तक जा पहुंची जहां इस वक्त चुनाव हो रहे हैं। आंदोलन के मुख्य चेहरे व किसान नेता केंद्र सरकार के खिलाफ चुनावी सभाएं और रैलियां कर रहे हैं। लोगों से भाजपा को वोट नहीं करने की अपील कर रहे हैं। कुल मिलाकर आंदोलन अपनी मूल मांगों से आगे निकल चुका है। किसान नेता अब खुलकर सत्ता बेदखली की बात कर रहे हैं। उसका अनुकूल असर दिखाई भी पड़ने लगा है। हाल में कुछ जगहों पर हुए निकाय चुनावों के परिणामों में दिखा भी। पंजाब निकाय चुनाव का परिणाम ताजा उदाहरण है। आंदोलन शुरू होने से पहले तक चुनावी पंडित भी यह मानकर चल रहे थे कि बंगाल भाजपा आसानी से जीत सकती है, लेकिन आंदोलन के कारण माहौल दूसरी दिशा में चला गया।

फिलहाल भाजपा उम्मीदहीन फिर भी नहीं है? पूरी ताकत के साथ बंगाल में लगी हुई है। अपनी पूरी मशीनरी वहां लगा दी है। दरअसल, बंगाल जीतना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की प्रतिष्ठा का सवाल है। वह नहीं चाहते बंगाल में भी दिल्ली विधानसभा जैसी पुनरावृत्ति हो। दिल्ली में जब चुनाव हुए थे, तो किरण बेदी मुख्यमंत्री का चेहरा थीं। तब जीत के लिए नरेंद्र मोदी-अमित शाह पूरी तरह से आश्वस्त थे, लेकिन ऐसा चमत्कार हुआ उनके अरमानों पर जैसे पानी ही फिर गया हो। बीते दो-ढाई महीनों में बदली सियासी हवा को दोनों नेता बखूबी भांप गए हैं। वे ये जानते हैं कि उनके पूर्व के गणित कहीं न कहीं गड़बड़ा रहे हैं।

भाजपा को अपने तमाम विश्वास पात्र अंदरूनी सूत्रों, आकलनों, समीक्षकों और आरएसएस से मिले ताजा फीडबैक से न सिर्फ बंगाल, बल्कि असम में सरकार बनाने के लिए बहुमत के जादुई आंकड़े की लड़ाई कठिन सी दिखने लगी है। बंगाल में पार्टी ने दो सौ सीटें जीतने का लक्ष्य बनाया हुआ है, लेकिन मौजूदा स्थिति को देखते हुए ऐसा लगने लगा है कि सरकार बनाने के लिए 148 सीटों के लिए भी काफी जद्दोजहद करनी पड़ सकती है। ऐसी स्थिति क्यों बनीं, कारण सामने है। किसान नेता राकेश टिकैट पूरे देश में किसान पंचायतें कर रहे हैं और पश्चिम बंगाल के सभी जिलों में घूम-घूम कर भाजपा के खिलाफ वोट करने का आह्वान कर रहे हैं। उनकी सभाओं में उमड़ती भारी भीड़ भी भाजपा को परेशान कर रही है। बावजूद इसके भाजपा की पूरी मशीनरी लक्ष्य को भेदने में लगी है।

बहरहाल, बंगाल के दुर्ग को भेदने के लिए भाजपा ने सियासी रूप से कई तीरे एक साथ छोड़े हुए हैं। वहां के स्थानीय कई नामचीन चेहरों को जोड़ा है, जिनमें फिल्मी सितारे, पूर्व क्रिकेटरों से लेकर दूसरे क्षेत्रों के विशिष्ट लोग शामिल हैं। निश्चित रूप इससे भाजपा को दो तरह का फायदा होगा। अव्वल, लोकल वोट में सेंधमारी आसानी से हो जाएगी। दूसरा, यह संदेश भी जाएगा कि भाजपा भी बंगालियों की पार्टी है। वह इसलिए क्योंकि ममता बनर्जी और उनके शेष बचे नेता शुरू से यह माहौल बनाने में लगे हैं कि भाजपा का मुख्यमंत्री भले ही बंगाली बने, लेकिन उसका रिमोट कंट्रोल तो दिल्ली में ही उन लोगों के हाथ में रहेगा, जो बंगाली हैं ही नहीं? फिलहाल दो मई तक हमें किसी नतीजे पर पहुंचने से पहले थोड़ा इंतजार करना होगा?

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