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चिंतन: फेरबदल के बड़े मायने

केंद्रीय मंत्रिमंडल में पांच नए मंत्रियों की छुट्टी की गई और 19 नए शामिल किए गए।

चिंतन: फेरबदल के बड़े मायने
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नई दिल्ली. अभी पांच जुलाई को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने मंत्रिमंडल को ताश के पत्तों की तरह फेट डाला। पांच मंत्रियों की छुट्टी की गई और 19 नए शामिल किए गए। एक की पदोन्नति हुई तथा कुछ के विभाग बदले गए। चौकाने वाली बात तो यह थी कि काबीना मंत्री स्मृति ईरानी का विभाग बदल दिया गया और उन्हें मानव संसाधन से कपड़ा मंत्रालय में भेज दिया गया। तथा मानव संसाधन मंत्रालय प्रकाश जावेडकर के हवाले किया गया। हालांकि स्मृति का कामकाज ठीक ही था पर उनका प्रबंधन ठीक नहीं था। विपक्ष उनके हर काम में मीन-मेख निकाल रहा था और वे अपनी बयानबाजी में और फंस जातीं। ऐसे में और ज्यादा दिनों तक उन्हें वहां बनाए रखने का मतलब था कि वे और मुंहफट हो जातीं। इसलिए उनका मंत्रालय बदल कर सरकार ने एक बुद्धिमानी का कदम ही उठाया।
दूसरे कैबिनेट मंत्री का विभाग बदला गया वे सदानंद गौड़ा थे। उनके पास से कानून मंत्रालय लेकर उसे रविशंकर प्रसाद को दे दिया गया तथा गौड़ा को ग्रामीण विकास में भेज दिया गया। सदानंद गौड़ा का विभाग इसके पहले भी बदला जा चुका है जब उनसे रेल मंत्रालय लेकर उन्हें कानून मंत्रालय दिया गया था। जाहिर है कि सदानंद गौड़ा के कामकाज से प्रधानमंत्री या तो खुश नहीं थे अथवा उम्मीद के मुताबिक वे प्रदर्शन नहीं कर पा रहे थे। बाकी विभागों में राज्य मंत्री ही बदले गए। इसके अलावा अगले वर्ष जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव हैं वहां की जातिगत गणित का ख्याल भी रखा गया। खासकर उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड व पंजाब राज्यों का। एक और खास बात यह रही कि इस बार अरुण जेटली को वह भाव नहीं दिया गया जो अभी तक उन्हें मिला करता था।
रवि शंकर प्रसाद को कानून मंत्रालय में लाने का मकसद कानून मंत्रालय को मजबूत करना है। पर अहम बात यह है कि सरकार ने उत्तर प्रदेश से तीन और मंत्री शामिल किए। वे हैं अनुप्रिया पटेल, कृष्णा राज और भोलानाथ पांडेय। इनमें से एक ओबीसी, एक दलित और एक ब्राह्मण है। अनुप्रिया पटेल को मंत्री बनाने का मकसद ओबीसी वोट खासकर कुर्मियों को भाजपा के पाले में लाना है। यूपी में उनका प्रतिशत आठ बताया जाता है और चूंकि अनुप्रिया अपना दल के संस्थापक सोनेलाल पटेल की बेटी हैं इसलिए कुर्मियों में उनकी खासी प्रतिष्ठा है। कृष्णा राज शाहजहां पुर से हैं और दलित बिरादरी से हैं। उन्हें मंत्री बनाने का मतलब कि उस इलाके में कांग्रसी नेता जतिन प्रसाद का औरा खत्म करना है। सबसे अहम बात कि एक मुस्लिम चेहरा और मंत्रिमंडल में आ गया। एमजे अकबर को मंत्रिमंडल में लिया गया है। वे मुस्लिम तो हैं ही प्रसिद्घ पत्रकार भी हैं। उन्हें विदेश राज्यमंत्री बनाया गया है।
जो लोग उत्तर प्रदेश से योगी आदित्यनाथ या वरुण गांधी को मंत्री बनाए जाने का सपना संजोए थे प्रधानमंत्री ने वे सपने ध्वस्त कर दिए। उन्होंने साफ कर दिया कि अनुशासन न मानने वाले और भड़काऊ बयान देने वाले नेता मंत्री नहीं बनाए जाएंगे। शायद इसीलिए यूपी कोटे से रामशंकर कठेरिया की मंत्रिमंडल से छुट्टी कर दी गई। उत्तराखंड से अजय टमटा को मंत्री बनाया गया है। आशाओं के विपरीत वहां से किसी ब्राrाण या ठाकुर नेता की बजाय प्रधानमंत्री ने एक दलित चेहरा चुना। इस तरह वे संदेश देना चाहते हैं कि दलितों को उपेक्षा नहीं सही जाएगी।
उत्तराखंड में 19 प्रतिशत दलित वोट हैं, उनको भी इस बहाने एक मेसेज मिल गया। पंजाब से यूं तो कोई चेहरा नहीं लिया गया पर दार्जिलिंग के सांसद एसएस अहलूवालिया को मंत्रिमंडल में लेकर यह बताया गया है कि सिखों को प्रतिनिधित्व मिला। भाजपा कोटे से मंत्री बनने वाले अहलूवालिया अकेले सिख नेता हैं। इसी तरह दिल्ली से विजय गोयल को लाने का मतलब भी दिल्ली में आप पार्टी को करारा जवाब देना है। मालूम हो कि दिल्ली में अकेले विजय गोयल ही आप पार्टी को चौतरफा घेर रहे थे। इस तरह वित्त मंत्री अरुण जेटली को भी उनकी हैसियत बता दी गई। वे विजय गोयल और अहलूवालिया की राह में रोड़े बने हुए थे।
महाराष्ट्र से रामदास अठावले को लेकर भी दलितों के प्रति अपने अतिरिक्त प्रेम का प्रदर्शन प्रधानमंत्री ने किया है। इसी तरह अर्जुन मेघवाल को भी। बंगाल और राजस्थान तथा एमपी व गुजरात से भी मंत्री बनाए गए हैं। राजस्थान से यदि सांवर मल जाट को हटाया गया तो मेघवाल व सीआर चौधरी को लिया भी गया। हरयाणा के चौधरी वीरेंद्र सिंह को अब इस्पात मंत्री बनाया गया है। कुल मिलाकर यह विस्तार एक नए संकेत देता है कि मंत्री अब वही रह पाएगा जो अपने कौशल का प्रदर्शन कर पाएगा। साथ ही विपक्ष को भी चुप करा दिया गया है कि यह सरकार चरमपंथी साधु और साध्वियों के दबाव में है। सरकार का यह चेहरा एक नए कौशल प्रबंध का परिचय देता है।

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