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जन्मदिन विशेष: महाकवि ''हरिवंश राय बच्चन'' की अनोखी कहानी

हरिवंश राय ''बच्चन '' की मधुशाला'' हिंदी साहित्य की बेस्ट सेलर है।

जन्मदिन विशेष: महाकवि
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मुंबई. हिंदी के लोकप्रिय कवि व रचनाकार हरिवंश राय 'बच्चन' का आज जन्मदिन है। वो कविता के आकाश के वो सितारे रहे जिसने लाखों दिलों पर राज किया। इनको बचपन से ही 'बच्चन' कहा जाता था जिसका शाब्दिक अर्थ 'बच्चा या संतान' होता है।इसके बाद हरिवंश राय जी बच्चन नाम से मशहूर हो गए। उनके शब्द आज भी लोगों की जुबान पर उनकी याद को जिंदा कर देते हैं।
इलाहाबाद में 27 नवंबर 1907 को जन्मे बच्चन ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री ली और भारत की आजादी की लड़ाई में शामिल हो गए। उन्होंने कुछ समय पत्रकारिता की और एक स्कूल में पढ़ाया भी। पढ़ाते हुए ही उन्होंने एमए किया। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में ही वह 1941 में अंग्रेजी के लेक्चरर हो गए। एक लेक्चरर और लेखक हरिवंश राय बच्चन की अग्निपथ की ये पंक्तियां भी कविता के आकाश में हमेशा के लिए अमर हो गईं।
यह महान दृश्य है,
चल रहा मनुष्य है,
अश्रु, स्वेद, रक्त से
लथ-पथ, लथ-पथ, लथ-पथ,
अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!
हरिवंश राय 'बच्‍चन' की यह पंक्तियां आज भी काव्यप्रेमियों की जुबान पर है। उनकी रचना 'मधुशाला' हिंदी साहित्य की बेस्ट सेलर है। अग्निपथ की लाइनें भी उनकी लेखनी को हमसब के बीच लाकर खड़ा कर देती हैं।
वृक्ष हों भले खड़े,
हों घने, हों बड़े
एक पत्र छाँह भी
मांग मत! मांग मत! मांग मत!
अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!
19 साल की उम्र में 1926 में बच्चन साहब की शादी श्यामा बच्चन से हई थी। वह उस समय 14 साल की थीं, लेकिन 1936 में श्यामा की टीबी के कारण मृत्यु हो गई। पांच साल बाद 1941 में बच्चन ने एक पंजाबन तेजी सूरी से विवाह किया जो रंगमंच तथा गायन से जुड़ी हुई थीं। इसी समय उन्होंने नीड़ का पुनर्निर्माण जैसे कविताओं की रचना की। तेजी बच्चन से अमिताभ तथा अजिताभ दो पुत्र हुए। आज के समय में अमिताभ बच्चन एक प्रसिद्ध एक्टर हैं।
जो बीत गई सो बीत गई
जीवन में एक सितारा था
माना वह बेहद प्यारा था
यह डूब गया तो डूब गया
अंबर के आंगन को देखो
पद्म भूषण से सम्मानित-
उनकी रचना 'दो चट्टाने' को 1968 में हिन्दी कविता के साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मनित किया जा गया था। इसी साल उन्हें सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार तथा एफ्रो एशियाई सम्मेलन के कमल पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था। बिड़ला फाउण्डेशन ने उनकी आत्मकथा के लिए उन्हें सरस्वती सम्मान से सम्मानित किया था। हरिवंश जी को भारत सरकार की ओर से 1976 में साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में पद्म भूषण से भी सम्मानित किया जा चुका है।
नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है
आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती
हरिवंश जी की 'कोशिश करने वालों की हार नहीं होती' कविता की एक अलग पहचान है। इस कविता को लोगों ने खासतौर पर पसंद किया है। आत्मविशवास से भर देने वाली यह कविता बच्चन जी की एक अभूतपूर्ण रचना है।
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