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Chamki Fever : बिहार 2010 से झेल रहा चमकी बुखार की मार, मौत के आंकड़े बहुत डरावने- ऐसे करें बचाव

बिहार में अब तक चमकी बुखार से सवा सौ से भी ज्यादा बच्चों की मौत हो चुकी है। मौतों का यह आंकड़ा कहां जाकर थमेगा, कोई नहीं जानता। बिहार में इस बीमारी का सर्वाधिक कहर सीतामढ़ी, शिवहर, मोतीहारी, बेतिया और वैशाली जिलों में देखा गया है और चूंकि इन जिलों में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति बदतर है, इसीलिए बच्चों के इलाज के लिए परिजन मुजफ्फरपुर के श्रीकृष्ण मेडिकल कॉलेज एंड अस्पताल की ओर भाग रहे हैं।

Chmaki Bukhar
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Chmaki Fever

बिहार में अब तक चमकी बुखार से सवा सौ से भी ज्यादा बच्चों की मौत हो चुकी है। मौतों का यह आंकड़ा कहां जाकर थमेगा, कोई नहीं जानता। बिहार में इस बीमारी का सर्वाधिक कहर सीतामढ़ी, शिवहर, मोतीहारी, बेतिया और वैशाली जिलों में देखा गया है और चूंकि इन जिलों में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति बदतर है, इसीलिए बच्चों के इलाज के लिए परिजन मुजफ्फरपुर के श्रीकृष्ण मेडिकल कॉलेज एंड अस्पताल की ओर भाग रहे हैं।

1995 से यह बीमारी विशेषकर बिहार में बच्चों को अपना शिकार बनाती आ रही है, लेकिन रहस्यमयी मानी जाती रही इस बीमारी का असल कारण जानने में स्वास्थ्य तंत्र अब तक नाकाम रहा है और हर साल बच्चे इस बीमारी के कारण इसी प्रकार मौत की गोद में समाते रहे हैं। चमकी को लेकर स्वास्थ्य विशेषज्ञ अब तक सही-सही कारणों का पता नहीं लगा पाए हैं।

चमकी बुखार के चलते बिहार में वर्ष 2010 में 24 मौतें हुई थी जबकि 2011 में 45, 2012 में 120, 2013 में 39, 2014 में 86, 2015 में 11, 2016 में 4, 2017 में 4 तथा 2018 में 11 बच्चों की मौत हुई थी, लेकिन इस साल बच्चों की मौत के आंकड़े बहुत चिंताजनक और डरावने हैं। आखिर क्या वजह है कि यह बीमारी हर साल खासकर गर्मी के मौसम में बिहार में दस्तक देती है और देखते ही देखते कई मासूम बच्चे इसके शिकार होकर मौत के मुंह में समा जाते हैं।

चमकी बुखार, जिसे दिमागी बुखार, जापानी इंसेफलाइटिस, नवकी बीमारी इत्यादि नामों से भी जाना जाता है, मेडिकल भाषा में इसे एक्यूट इंसेफलाइटिस सिंड्रोम नाम दिया गया है, जो एक गंभीर बीमारी है। यह बीमारी शरीर के मुख्य नर्वससिस्टम अर्थात्ा तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करती है। हर साल चमकी बुखार से होती बच्चों की मौतों के बीच अहम सवाल यह है कि आखिर यह बुखार होता कैसे है और क्यों देखते ही देखते यह इस प्रकार सैंकड़ों बच्चों का काल बन जाता है?

गर्मी के मौसम में ही इसके इतने मामले क्यों सामने आते हैं? बच्चे ही इस बीमारी के शिकार क्यों होते हैं? क्या हैं इसके प्रमुख लक्षण? कैसे इसकी चपेट में आने से बचा जा सकता है? यह बुखार अत्यधिक गर्मी और नमी के मौसम में फैलता है तथा प्रायः 15 साल तक की उम्र के बच्चे इस बीमारी से सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं।

हालांकि माना यह भी जा रहा है कि सुबह नाश्ते में लीची खाने वाले बच्चे ही चमकी की चपेट में आ रहे हैं। इंडियाज नेशनल सेंटर फॉरडिजीजकंट्रोल की एक रिपोर्ट में भी इस बीमारी की कई वजहों में से एक लीची को बताया गया है। खाली पेट लीची खाने को इस बीमारी की अहम वजह माना गया है। दरअसल लीची में कुछ ऐसे टॉक्सिंस मौजूद होते हैं, जो खाली पेट लीची खाने से बच्चे के लीवर में जमा होते रहते हैं और तापमान बढ़ने पर ये विषैले तत्व शरीर में फैलने लगते हैं।

लीची एक अधपका फल है, जिसके बीज में बहुत ज्यादा टॉक्सिंस होते हैं। इन विषैले तत्वों में ग्लूकोजसिंथेसिस नामक पाया जाने वाला तत्व बेहद खराब होता है। बच्चों के शरीर में शुगर की कमी होने पर शरीर इसका नियंत्रण बनाए जाने पर ज्यादा ग्लूकोजरिलीज करता है और उसी दौरान लीवर में पहले से ही जमा ग्लाइकोजेन नामक विषैला तत्व पूरे शरीर में फैल जाता है, जो दिमागी बुखार चमकी का एक अहम कारण बनता है।

अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार जिन बच्चों ने भोजन के बजाय लीची ज्यादा खाई हो और रात में भोजन न किया हो, उनके हाइपोग्लाइसीमिया के शिकार होने का खतरा बढ़ जाता है। इसी प्रकार सुबह नाश्ते में काफी लीची खाने के बाद अगर बच्चे ने दिनभर पानी बहुत कम पीया हो तो उनमें सोडियम की कमी हो जाती है।

दरअसल खाली पेट तथा कच्ची लीची खाने से इंसेफलाइटिस का खतरा काफी बढ़ जाता है। अगर खाली पेट लीची खाकर सो जाएं तो भी यह खतरनाक साबित हो सकता है क्योंकि लीची से निकलने वाला विषैला तत्व शरीर में शुगर की औसत मात्रा को कम कर देता है। बिहार में जितने भी बच्चों की चमकी से जान गई है, उनके यूरिनसैंपल में पाया गया कि उन्होंने लीची का सेवन किया था। सभी बच्चों के ब्लड सैंपल में शुगरलेवल भी औसत से कम पाया गया।

अब बात करें चमकी बुखार के लक्षणों की तो इस बुखार से पीडि़त बच्चे को निरन्तर तेज बुखार बना रहता है, पूरे शरीर में या शरीर के किसी खास अंग में ऐंठन होती है, शरीर सुन्न भी हो जाता है, बच्चा दांत पर दांत चढ़ाए रहता हैं, कमजोरी की वजह से बार-बार बेहोश होता है, चिंकोटी काटने पर भी बच्चे के शरीर में कोई हरकत नहीं होती। इन लक्षणों को नजरअंदाज करना प्रायः जानलेवा साबित होता है।

इसलिए जरूरी है कि ऐसे लक्षण नजर आते ही बच्चे को योग्य चिकित्सक के पास ले जाया जाए। थोड़ी सावधानियां अपनाकर बच्चों को इस जानलेवा बीमारी के प्रकोप से बचाया जा सकता है। साफ-सफाई का पर्याप्त ध्यान रखें। खाने से पहले और खाने के बाद बच्चों के हाथ अवश्य धुलवाएं तथा नाखून न बढ़ने दें क्योंकि बड़े नाखूनों में जमा होती गंदगी भी बीमारियों का कारण बनती है। पीने का स्वच्छ पानी ही इस्तेमाल करें।

चूंकि यह बीमारी गर्मी में ही कहर बरपाती है और इस मौसम में फल तथा खाना जल्दी खराब होता है, इसलिए इस बात का विशेष ध्यान रखें कि बच्चे खराब खाना या सड़े हुए फल न खाने पाएं। रात के भोजन के बाद बच्चों को थोड़ा-बहुत मीठा खिलाएं तथा शुगर लेवल नियंत्रित रहे। अधिक गर्मी होने पर बच्चों को थोड़ी-थोड़ी देर में तरल पदार्थ देते रहें ताकि शरीर में पानी की कमी न होने पाए।

गर्मी के मौसम में बच्चों को धूप में हरगिज न खेलने दें। बच्चे को खाली पेट लीची न खिलाएं। अगर बच्चे ने दिन में ज्यादा लीची खाई हैं तो उसे रात में भरपेट भोजन अवश्य कराएं। अगर कोई बच्चा चमकी बुखार से पीडि़त हो तो कुछ विशेष बातों का ध्यान रखा जाना अत्यावश्यक है ताकि उसे इस जानलेवा बीमारी से बचाया जा सके। इसके लिए सबसे जरूरी है कि बच्चे को तरल पदार्थ देते रहना चाहिए ताकि उसके शरीर में पानी की कमी न होने पाए।

चूंकि इस बुखार से पीडि़त बच्चे के शरीर में शुगर की कमी की सबसे बड़ी समस्या देखी जाती है, इसलिए पौष्टिक भोजन के साथ ही ऐसे बच्चे को थोड़ी-थोड़ीदे र में कुछ मीठा भी खिलाते रहना चाहिए। बच्चे को लगातार ओआरएस अथवा नींबू, नमक व चीनी का घोल पिलाते रहें। बच्चे को कंबल या गर्म कपड़ों में न लपेटें और उसकी नाक बंद न होने दें।

बच्चे की गर्दन को झुकाकर न रखें। बेहोशी व मिर्गी की अवस्था में बच्चे को हवादार स्थान पर लिटाएं। तेज बुखार होने पर शरीर का तापमान कम करने की कोशिश करें और पूरे शरीर को ठंडे पानी से पोछें। तेज बुखार होने पर भी पैरासिटामोल या अन्य कोई दवा योग्य चिकित्सक की सलाह के बाद ही दें।

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