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विकेश कुमार बड़ोला का लेख : अनुवाद की बड़ी भूमिका

वस्तुतः अनुवाद दिवस के आयोजन का आदर्श उद्देश्य उन भाषा-विशेषज्ञों के कार्य को श्रद्धांजलि अर्पित करना है, जो बहुभाषी देशों को भाषिक अनुवाद के माध्यम से एक मंच पर सरल संवाद करने का अवसर उपलब्ध कराते हैं और देशों के राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व सामाजिक कार्यों को सुगमतापूर्वक पूर्ण कराने में अनुवाद-कला का सहारा लेते हैं।

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प्रतीकात्मक फोटो

विकेश कुमार बड़ोला

आज अंतर्राष्ट्रीय अनुवाद दिवस है। संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में 24 मई 2017 को एक संकल्प (71/288) अंगीकार किया गया था। संकल्प में वर्तमान वैश्विक संकटों के निदान के लिए राष्ट्रों को परस्पर जोड़ने और उनके मध्य शांति, प्रबोध व विकास की समुचित धारणा को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से सरल संवाद के माध्यम बने भाषा-विशेषज्ञों (अनुवादकों) की भूमिका का महत्व समझा गया। बहुभाषी देशों के मध्य सरल संवाद के आधार स्तंभ भाषा-अनुवादकों की इस भूमिका का सम्मान करने के लिए 30 सितंबर को अंतर्राष्ट्रीय अनुवाद दिवस के रूप में घोषित किया गया।

वस्तुतः अनुवाद दिवस के आयोजन का आदर्श उद्देश्य उन भाषा-विशेषज्ञों के कार्य को श्रद्धांजलि अर्पित करना है, जो बहुभाषी देशों को भाषिक अनुवाद के माध्यम से एक मंच पर सरल संवाद करने का अवसर उपलब्ध कराते हैं और देशों के राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व सामाजिक कार्यों को सुगमतापूर्वक पूर्ण कराने में अनुवाद-कला का सहारा लेते हैं। यदि अंतर्राष्ट्रीय विकास, प्रगति, शांति, सहयोग और सुरक्षा में अनुवादकों की भूमिका पर गंभीरतापूर्वक विचार हो तो ज्ञात होता है कि दो या दो से अधिक देशों के मध्य उनकी अलग-अलग भाषा होने के बाद भी अनुवादक उनके मध्य सफल संवाद का बड़ा आधार बनता है। यदि अनुवादक दो देशों के मध्य सफल संवाद की कड़ी बनता है तो इसके लिए उसकी भाषा संबंधी बहुमुखी प्रतिभा प्रशंसनीय है। यह स्वाभाविक है कि दुनिया का प्रत्येक व्यक्ति समुचित और सफल संवाद केवल अपनी मातृभाषा में ही कर सकता है। दुनिया में अनेक देश हैं। एक देश में भी अनेक भाषाएं, बोलियां, लिपियां और इन भाषाओं, बोलियों व लिपियों में भी क्षेत्रवार अंतर होता है। ऐसे में भाषा अनुवादकों के सम्मुख न केवल अपनी मातृभाषाओं, राजभाषाओं की विभिन्न उप-भाषाओं व बोलियों को सीखने, समझने की चुनौती होती है बल्कि उन्हें दूसरे देशों की राजभाषा, मातृभाषा और उनकी उप-भाषा व बोली का शिक्षण-प्रशिक्षण लेने की आवश्यकता भी होती है। दो विपरीत भाषी देशों के मध्य परस्पर कार्यक्रमों के लिए जो संवाद होता है, वह तब ही सफल होगा जब अनुवादकों द्वारा दोनों देशों के प्रतिनिधियों को उनकी अपनी-अपनी भाषा में संवाद का सार बताया जाएगा। एक प्रकार से अनुवादकों के कंधों पर वैश्विक गतिविधियों के संतुलित, समुचित व कल्याणकारी संचालन का प्राथमिक दायित्व है। यदि दो राष्ट्रों के मध्य उनके विपरीत भाषी होने के कारण, किसी कार्यक्रम को लेकर स्पष्ट, समझने योग्य और विस्तृत बात नहीं हो पाती है, तो इस कारण कार्यक्रम निरस्त हो जाते हैं। यहां अनुवादकों की भूमिका का अत्यंत महत्व है। वे अपने अनुवाद-कौशल से दोनों देशों के प्रतिनिधियों को उनके विचारों का सरलतम अनुवाद उपलब्ध करा सकते हैं। अनुवादकों द्वारा विपरीत भाषी राष्ट्रों के मध्य सहज संवाद का माध्यम बनने से अनेक अंतर्राष्ट्रीय विकास परियोजनाएं, जन-कल्याणकारी कार्यक्रम और समाजोपयोगी कार्य सरलतापूर्वक संपन्न होते हैं।

विश्व की सबसे बड़ी संस्था संयुक्त राष्ट्र, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार संगठन, एशियाई विकास बैंक जैसे अनेक अंतर्राष्ट्रीय संगठन अलग-अलग देशों के लिए जो कार्य करते हैं, उन कार्यों से संबंधी विभिन्न भाषाओं की रिपोर्टों का आदान-प्रदान अनुवाद कार्य के कारण ही हो पाता है। अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों, आयोजनों और अनेक शिखर सम्मेलनों में अधिसंख्य राष्ट्रों के प्रधानमंत्री अपनी राजभाषा में सार्वजनिक सम्बोधन करते हैं। अंग्रेजी, हिन्दी, फ्रेंच या जर्मन भाषा जानने वाले लोग ऐसे राष्ट्रों के प्रधानमंत्रियों की भाषा तो नहीं समझ सकते पर उनके द्वारा जो कुछ सम्बोधित किया जाता है, उसका भाष्य-रूपांतरण जरूरत के अनुसार दूसरी भाषाओं में तत्काल कर दिया जाता है। ये कार्य अनुवादकों द्वारा किया जाता है। आज योग्य अनुवादकों की अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर अत्यंत कमी महसूस की जा रही है। यदि भारत के संदर्भ में अनुवादकों की भूमिका पर विचार किया जाए तो पता चलता है कि देश में अंग्रेजी और हिन्दी ही नहीं अपितु गुजराती, मराठी, पंजाबी, तमिल, तेलुगू, कन्नड़, उड़िया व पूर्वोत्तर भारतीय राज्यों की भाषा-बोली के पत्राचार में अनुवादकों की बड़ी मांग है। लेकिन चूंकि भारत में दशकों से अंग्रेजी ही राजकाज की भाषा बनी रही, इसलिए यहां हिन्दी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के जानकार अनुवादकों के लिए वह स्रोत भाषा ही बन गई है और उनकी अपनी राजभाषा व मातृभाषा लक्ष्य भाषा। यदि हिन्दी भाषी व्यक्ति दक्षिण भारतीय भाषाएं भी समुचित तरीके से लिखना-पढ़ना जानता है तो निश्चित रूप में दो राज्यों के मध्य प्रेम, शांति और सहयोग के लिए वह एक बड़ी भूमिका निभा सकता है। प्रायः ऐसे हिन्दी भाषी कम हैं, जो दक्षिण या दूसरी प्रादेशिक भाषाओं के भी अच्छे जानकार हैं। परन्तु इसके विपरीत दक्षिण भारतीय और भारत के दूसरे प्रांतों के लोग अपनी क्षेत्रीय भाषाएं तो जानते ही हैं, साथ ही वे हिन्दी और अंग्रेजी भी अच्छे से जानते हैं। इससे उन्हें अनेक लाभ हुए। सिनेमा, राजनीति, चिकित्सा-जगत से लेकर अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में दक्षिण भारतीय लोग यदि अधिक सफल हैं तो इसमें भारत की बहुभाषाओं के उनके ज्ञान व अनुवाद की बड़ी भूमिका है।

अनुवाद के लिए अनुवादकों के सम्मुख प्रायः स्रोत और लक्ष्य भाषा होती है। मानें कि स्रोत भाषा अंग्रेजी और लक्ष्य भाषा हिन्दी है। स्रोत भाषा अंग्रेजी की सामग्री को लक्ष्य भाषा हिन्दी में भाषांतरित करने के लिए अनुवादक अनेक भाषागत, सामाजिक, आर्थिक, वैज्ञानिक, दार्शनिक संदर्भों और भाषा परंपरा में समाहित सूक्तियों-लोकोक्तियों-कहावतों के अनेक अंतर्संदर्भों का अनुपालन करता है। तब ही वह स्रोत भाषा का लक्ष्य भाषा में समुचित अनुवाद कर पाता है। सामान्यतः अनुवाद को स्रोत भाषा के शब्दों को लक्ष्य भाषा के अर्थों में भाषांतरित करने के रूप में समझा जाता है। वास्तव में अनुवाद इतना सीधा व सरल नहीं होता। भाषा अनुवादक को भाषाओं से संबंधित ही नहीं, अपितु अन्य अनेक क्षेत्रों के विविध कार्यों का व्यावहारिक व काल्पिनक अनुभव और गूढ़ ज्ञान भी होना चाहिए। भाषा अनुवादक के पास अध्ययन, चिंतन-मनन, पठन-पाठन और लेखन-सृजन के संबंध में जितना अधिक अनुभव होगा, उसका अनुवाद कार्य भी उतना ही सरल और स्पष्ट होगा।

अनुवादक की स्रोत तथा लक्ष्य दोनों भाषाओं पर अच्छी पकड़ होनी चाहिए। अनुवादक को दोनों भाषाओं के प्रतिनिधि देशों, संस्कृतियों, लोक जीवन, लोक प्रशासन, साहित्य, दर्शन इत्यादि विषयों के बारे में जितना अधिक व्यावहारिक ज्ञान होगा, उतनी सुगमता से वह अनुवाद कार्य कर सकता है। सफल अनुवादक वही बन सकता है जिसे जीवन के विविध क्षेत्रों का कार्यकारी अनुभव हो। जो व्यक्ति जीवन के लिए उपयोगी, अनुपयोगी वस्तुओं के उत्पादन से लेकर उपभोग के समस्त तंत्र, तंत्र के सकारात्मक व नकारत्मक सभी पहलुओं, सरकारों, सार्वजनिक जीवन की कटु और घृणित सच्चाइयों के बारे में जितना सुविज्ञ होगा, उसका अनुवाद-कर्म उतना ही सहज और सफल होगा।

समुचित, प्रभावी और समझने योग्य अनुवाद के लिए स्रोत व लक्ष्य भाषा के शब्दों, वाक्यों और विषय-सामग्री की काल्पनिक जानकारी होना ही पर्याप्त नहीं होता। अनुवादक के पास शब्दों और वाक्यों को विभिन्न सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और प्राकृतिक संदर्भों में विश्लेषित करने की योग्यता अवश्य होनी चाहिए। सर्वोत्तम अनुवाद के लिए स्रोत और लक्ष्य भाषा की अधिकतम जानकारी तो आवश्यक है ही। इसके अतिरिक्त भाषा संबंधी व्याकरण और भाषा के सामान्य सामाजिक व आधिकारिक उपयोग का ज्ञान भी होना चाहिए। सफल अनुवाद के लिए सर्वाधिक आवश्यकता है जीवन संबंधी कार्यों के व्यावहारिक ज्ञान की। एक व्यक्ति को अपने जीवनकाल में जो वस्तुएं, सुविधाएं और सेवाएं चाहिए यदि उनके कार्य-व्यवहार की जानकारी व्यक्ति को हो या वह उसमें रुचि ले, तो उसका यह ज्ञान अनुवाद-कार्य में सबसे अधिक सहायक सिद्ध होता है।

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