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आलोक पुराणिक का लेख : छोटे उद्योगों की बड़ी लड़ाई

लघु उद्यमों से समग्र अर्थव्यवस्था जुड़ी हुई है। अगर लघु उद्योग संकट में आएंगे तो फिर बैंकिंग और वित्तीय जगत भी संकट में आ सकता है। ट्रांसयूनियन सिबिल संगठन के आकलन के अनुसार करीब 2.3 लाख करोड़ रुपये का जो कर्ज लघु उद्यमों को दिया गया था, वह खतरे में है। यानी यह कर्ज डूबत हो सकता है।

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इंडस्ट्री

आलोक पुराणिक

कोरोना के खिलाफ युद्ध कितना लंबा चलेगा, कोई नहीं जानता। हाल में सरकार ने सूक्ष्म, लघु और मंझोले उद्योगों की परिभाषा में बदलाव की घोषणा की है। इसके मुताबिक सूक्ष्म उद्योगों के लिए सीमा एक करोड़ रुपये का निवेश और पांच करोड़ रुपये का कारोबार होगी। 10 करोड़ का निवेश और 50 करोड़ रुपये का कारोबार वाले छोटे उद्योगों के अंतर्गत आएंगे। वहीं 50 करोड़ रुपये निवेश और 250 करोड़ रुपये टर्नओवर वाले उद्योग मध्यम उद्योगों की श्रेणी में आएंगे। सूक्ष्म-लघु-मंझोले उद्योगों से जुड़ी ये नई परिभाषाएं उदार हैं। यानी अब पहले के मुकाबले ज्यादा बड़ी इकाइयां भी लघु उद्यमों की श्रेणी में गिनी जाएंगी।

गौरतलब है कि लघु इकाइयों में एक डर भी यह भी रहता है कि अगर आकार बड़ा हो गया तो फिर लघु उद्यमों को मिलने वाली राहत छूटों के दायरे से बाहर हो जाएंगे। यानी साइज बड़ा करने में भी लघु उद्यमों को भय रहता था, वह एक हद तक दूर हो गया है। 250 करोड़ रुपये तक के कारोबार को भी मध्यम स्तर का कारोबार ही माना जाएगा। कुल मिलाकर सूक्ष्म-लघु-मंझोले उद्यमों के लिए यह समय गहन संकट का समय है। तमाम कारणों से कोरोना जनित मंदी का असर उनके कारोबार पर दिख रहा है।

आल इंडिया मैन्युफेक्चरर्स आर्गनाइजेशन द्वारा करवाए गए सर्वेक्षण में साफ हुआ है कि सूक्ष्म–लघु-मंझोले उद्योगों में से 35 प्रतिशत ने ऐसी आशंका जताई कि अब उन्हे सुधार की सूरत की दिखाई नहीं पड़ रही है और वो अपना काम धंधा बंद करने की तैयारी में हैं। तमाम छोटे उद्योगों की दशा और दिशा समग्र अर्थव्यवस्था के हालात पर निर्भर करती है। मारुति कारें ज्यादा बिकेंगी तो इससे जुड़ी छोटी इकाइयों का कारोबार चमकेगा। उन छोटी इकाइयों पर निर्भर बहुत ही छोटी इकाइयों का कारोबार भी जिंदा रहेगा। बड़ा कारोबार ही अगर संकट में आएगा तो छोटे कारोबारों पर संकट मतो आना ही है। इस समय लघु उद्योगों के सामने वह संकट है। इस संकट के बहुआयामी परिणाम हैं।

सूक्ष्म-लघु-मंझोले उद्यम भारत के कुल निर्यात में करीब 45 प्रतिशत योगदान देते हैं। निर्यात में छोटे उद्यमों की भूमिका बड़ी है। सबसे बड़ी बात यह है कि देश में करीब 12 करोड़ लोगों को रोजगार सूक्ष्म-लघु-मंझोले उद्यमों से मिलता है। छोटी से छोटी दुकान भी एक दो लोगों को रोजगार दे देती है। रोजगार की गुणवत्ता की बात न की जाए तो 12 करोड़ लोगों को न्यूनतम आजीविका का जुगाड़ सूक्ष्म-लघु-मंझोले उद्यमों से होता है। कोरोना जनित मंदी के दौर में रोजगार बहुत बड़ी समस्या है। इसलिए लघु उद्यमों की इस भूमिका को विशेष तौर पर रेखांकित किया जाना चाहिए और उन्हे बचाए रखने और समृद्ध करने की हर मुहिम को मजबूत होना चाहिए।

अपने आसपास ही देखें तो बहुत से छोटे कारोबार संकट का सामना कर रहे हैं, तमाम वजहों से। बैंड बाजा कारोबार गहन संकट में है। शादियों में उपस्थिति सीमा 50 तक सीमित कर दिए जाने के कारण शादियां बहुत सादा तरीके से हो रही हैं। बैंड बाजे की जरुरत नहीं है। कैटरिंग से लेकर वो तमाम कारोबार संकट में हैं, जिनका रिश्ता शादियों से होता है। कारोबारों की एक पूरी श्रृंखला संकट में हो तो उस श्रृंखला से जुड़े बड़े छोटे मंझले, सूक्ष्म सारे कारोबार संकट में आ जाते हैं। अर्थव्यवस्था में प्रगति का सुचक्र होता है, वैसे ही गिरावट का दुष्चक्र होता है। पहिया ऊपर की ओर जाता है, तो सब ऊपर को जाते हैं, पहिया नीचे की ओर आता है तो सब नीचे की ओर आते हैं। बड़े कारोबारी झटका झेलने की सामर्थ्य रखते हैं। जिनके पास पांच करोड़ रुपये की बचत हो वो एक दो साल का मंदी झेल सकते हैं। पर जिनके पास दो महीने के खाने पीने का इंतजाम भी न हो, वो मंदी का मुकाबला करने में बहुत संकट महसूस करते हैं। हालात ने बहुत कुछ बदल दिया है। कई छोटे कारोबारों के लिए तो दुनिया बिलकुल ही बदली हुई दिख रही है।

लॉकडाउन को चरणबद्ध तरीके से खोलने के बाद अपनी कई जरूरतों को तत्काल तौर पर पूरा करने के लिए 77 फीसद सूक्ष्म-लघु-मंझोले उद्यमों को इमरजेंसी फंड की जरूरत है। जबकि 62 फीसदी सूक्ष्म-लघु-मंझोले उद्यम नौकरी में कटौती कर सकती हैं। यह आकलन फेडरेशन ऑफ इंडियन माइक्रो, स्मॉल एंड मीडियम इंटरप्राइजेज, स्कॉच कंसल्टेंसी, भारतीय वित्त सलाहकार समिति और टैक्सलॉ एडुकेयर सोसायटी द्वारा सकरवाए गए सर्वे की रिपोर्ट में किया गया। इसके मुताबिक 77 फीसदी सूक्ष्म-लघु-मंझोले उद्यमों को स्टाफ को सैलरी देने, वेंडर के बकाए भुगतान व अन्य फिक्स्ड शुल्क के भुगतान के लिए इमरजेंसी फंड की जरूरत है।

सूक्ष्म-लघु-मंझोले उद्यमों की बहुत धनराशि बकाया में उलझी हुई है। यानी केंद्र सरकार के संगठनों, राज्य सरकार के संगठनों और तमाम बड़ी कंपनियों ने सूक्ष्म-लघु-मंझोले उद्यमों माल वगैरह लेकर भुगतान नहीं किया। करीब पांच लाख करोड़ रुपये का भुगतान बकाया है। भुगतान रुकता है तो पूंजी का प्रवाह अवरुद्ध होता है। इसके चलते छोटी इकाइयों को काम चलाने में दिक्कतें आती हैं। सरकार से लेकर राज्य सरकारों के स्तर पर छोटी इकाइयों के लिए त्वरित भुगतान का इंतजाम होना चाहिए। बल्कि ऐसे संकट के समय में एडवांस भुगतान की भी व्यवस्था हो तो बेहतर रहेगा।

दरअसल लघु उद्यमों से समग्र अर्थव्यवस्था जुड़ी हुई है। अगर लघु उद्योग संकट में आएंगे तो फिर बैंकिंग और वित्तीय जगत भी संकट में आ सकता है। ट्रांसयूनियन सिबिल संगठन के आकलन के अनुसार करीब 2.3 लाख करोड़ रुपये का जो कर्ज लघु उद्यमों को दिया गया था, वह खतरे में है। यानी यह कर्ज डूबत हो सकता है। यह कर्ज डूबा तो बैंकिंग और वित्तीय जगत गहरे संकट में आएगा। यानी कुल मिलाकर जो स्थितियां हैं, उनमें एक का संकट देर सवेर सबका संकट ही होगा। केंद्र सरकार ने बहुत से उपायों की घोषणा की है। बस उन्हें जमीन पर तेज गति से आना चाहिए। कोरोना काल सिर्फ इंसानों को ही नहीं मार रहा है, इससे छोटे उद्यमों की सांस रुक रही है। कुल मिलाकर छोटे उद्योगों को एक लंबी लड़ाई के लिए तैयार रहना होगा। और इस तैयारी में केंद्र और राज्य सरकारों की मदद अनिवार्य होगी।

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