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भीमराव अम्बेडकर जयंती: इस वजह से अम्बेडकर ने स्वीकारा था बौद्ध धर्म

हिन्दू धर्म की रूढ़ियों से त्रस्त अंबेडकर ने लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया था। उनकी समझ थी कि एक समतामूलक समाज भूमि पर खड़ा होने का पहला मौका दलित वर्ग को मिला। ऐसा नहीं है कि अंबेडकर ने समाज के लिए धर्म की आवश्यकता प्रतिपादित नहीं की। अपने अनुयायियों को उन्होंने कुछ विशिष्ट मानकों पर धर्म की गतिशीलता को जांचने का आग्रह भी किया।

भीमराव अम्बेडकर जयंती: इस वजह से अम्बेडकर ने स्वीकारा था बौद्ध धर्म

दलित उत्थान को लेकर नयी धर्म-सामाजिक वैचारिकी को राष्ट्रीय स्तर पर शुरू किए जाने का श्रेय मुख्यतः डा. भीमराव अम्बेडकर को दिया जाता है। हिन्दू धर्म की रूढ़ियों से त्रस्त अंबेडकर ने लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया था। उनकी समझ थी कि एक समतामूलक समाज भूमि पर खड़ा होने का पहला मौका दलित वर्ग को मिला। ऐसा नहीं है कि अंबेडकर ने समाज के लिए धर्म की आवश्यकता प्रतिपादित नहीं की। अपने अनुयायियों को उन्होंने कुछ विशिष्ट मानकों पर धर्म की गतिशीलता को जांचने का आग्रह भी किया।

उनके अनुसार सामाजिक नीतिशास्त्र, विवेकशीलता, शांतिमय सहअस्तित्व और अंधविश्वास पर अनास्था एक नए समाज-धर्म के तत्व हो सकते हैं। अंबेडकर को ऐसे तत्व हिन्दू धर्म में दिखाई नहीं पड़े क्योंकि वह जाति प्रथा की गिरफ्त में है। उन्होंने वैचारिक हमले किए। उनके मूल में बुद्ध की शिक्षाएं तथा पश्चिमी ज्ञानशास्त्र से उपजा नवउदारवाद भी था।

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सनातन या हिन्दू धर्म की सामाजिक प्रथाओं ने जाति समस्या को धर्म की आंतरिकता बना दिया। यह जहर दलितों में वर्षों से घुलता रहा। गांधी सोचते थे कि कथित उच्च वर्गों का दायित्व है कि दलितों को सामाजिक रूप से सक्षम बनाने आगे बढ़ें। विवेकानन्द और गांधी के अनोखे और पुरअसर तर्क थे कि जाति प्रथा और वर्णाश्रम व्यवस्था के कुछ सकारात्मक पक्ष भी हैं। उन्हें ठीक से समझा नहीं गया है।

अंबेडकर ने इस तर्क को कतई मंजूर नहीं किया। उन्होंने जाति प्रथा की सड़ी गली सामाजिक रूढ़ि के खिलाफ जेहाद का बिगुल फूंका। अंबेडकर धर्म आधारित हाइपोथीसिस से अलग हटकर आधुनिक नीति-संहिता का विधायन रचने के प्रखर आग्रही बने रहे। उन्होंने नवोन्मेषी विचार के जरिए दलितों में रियायतें मांगने के बदले संपूर्ण अधिकारों के लिए संघर्ष करने की वर्ग चेतना पैदा की।

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बौद्ध धर्म में दलितों का प्रवेश धर्म आधारित आदेशों के तहत रहकर दलित वर्ग की सामाजिक स्थिति को केवल सुधारना नहीं था। बौद्ध धर्म की स्वतंत्रता, समता और सामाजिक बंधुत्व की समझ का माहौल मुहैया कराकर दलितों को एक नया जीवनशास्त्र देने का प्रयत्न था। बहुत सावधानी, चुस्ती और चालाकी के साथ देश के प्रमुख राजनीतिक नेताओं ने वितंडावाद रचा था जिससे राजसत्ता सदैव उच्च वर्गों के हाथ ही रहे।

इसमें शक नहीं भारत में धर्म एक प्रमुख सामाजिक ताकत, जरूरत और उपस्थिति है। धर्म का झुनझुना बजाकर लोगों को गाफिल किया जाता है। शंख बजाकर लोगों में घबराहट पैदा की जाती है। राजनीति में धर्म का इस्तेमाल नहीं करने के वायदे के बावजूद धर्म और राजनीति गलबहियां करते हैं। पुरानी हिन्दू मान्यताओं में अलबत्ता सोच नहीं था कि भारत कभी राष्ट्र-राज्य या संवैधानिक सार्वभौम देश बनेगा।

राजनीति में धर्म

प्राचीन हिन्दू सोच में पश्चिमी राज्य पद्धतियों का विवेचन नहीं हो सकता था। उन धर्मादेशों को हिन्दू या अन्य मतावलंबियों पर लागू नहीं किया जा सकता जो संदर्भहीन, प्राचीन और असंगत हैं। अंबेडकर ने राजनीति में धर्म के प्रयोग, पाकिस्तान निर्माण, सांप्रदायिक दंगों और गांधी की हत्या को भी देखा था। वे वाकिफ थे कि संप्रदायवाद धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक सहिष्णुता को कतई बर्दाश्त नहीं करता।

अम्बेडकर की कलम से संविधान के उद्देश्य

ये दोनों तत्व आधुनिक राष्ट्र-राज्य के सोच के आधार स्तंभ हैं। इन्हें अम्बेडकर की कलम से संविधान के उद्देश्यों में शामिल किया गया था। उन्होंने देखा किस तरह धर्म सामाजिक नीतिशास्त्र का स्वांग बनकर आधुनिक मूल्यों की हेठी करता है। दलित और स्त्रियां मिलकर आधी से ज्यादा आबादी हैं। इन्हें घरेलू और सामाजिक स्तर पर शोषित किया जाता रहा है।

भारत में पीड़ित वर्ग

स्वतंत्र संविधानसम्मत भारत में पीड़ित वर्गों को सामाजिक, राजनीतिक स्तर पर समुन्नत होने के अवसर मिलने की संभावनाएं अंबेडकर ने देखी थी बशर्ते सामाजिक दुराग्रहों का उनके जीवन से लोप कर दिया जाए। यह मिथकीय विचार या यूटोपिया नहीं था। अंबेडकर वंचितों को अनंत यात्रा के पथिक के रूप में ऐसे पड़ाव पर खड़ा करना चाहते थे जो नई राह का प्रस्थानबिन्दु हो।

बौद्ध धर्म की तात्विक घोषणा

यह जातिग्रस्त हिन्दू समाज की व्यवस्थाओं में संभव नहीं था। नई संवैधानिक व्यवस्था के मानक सिद्धान्तों की स्वप्नशीलता को साकार करने में बौद्ध धर्म की तात्विक घोषणाओं की वृहत्तर भूमिका से अंबेडकर ने तत्कालीन राजनीति को इसीलिए सम्पृक्त किया था। एक अनीश्वरवादी आध्यात्मिक दर्शन ही अम्बेडकर के अनुसार संविधान का पाथेय हो सकता है।

अम्बेडकर का बौद्ध धर्म

उनका यह उत्तर-आधुनिक सोच अब तक बहस के केन्द्र में नहीं आया है। यह जानने में रोमांचकारी लगता है कि डाॅ0 अम्बेडकर ने ही उद्देशिका में देश के प्रतिबद्धित संकल्प को ' ईश्वर के नाम पर ' घोषित करने की अपील की थी , लेकिन सदन में गर्मागर्म बहस के बाद उनके प्रस्ताव को 41 के मुकाबले 68 वोटों से खारिज कर दिया गया था । यही अम्बेडकर बाद में नास्तिकता के बौद्ध धर्म में अन्तरित हो गए।

अम्बेडकर के नेतृत्व में कई सदस्य

इतिहास यह रेखांकित करेगा कि डाॅ. अम्बेडकर और श्यामाप्रसाद मुखर्जी में समाज के लिए करुणा नहीं होती तो गांधी उन्हें कांग्रेस के सदस्य नहीं होने पर भी केन्द्रीय मन्त्रिमंडल में शामिल करने के लिए नेहरू को नहीं कहते। अम्बेडकर के नेतृत्व में कई सदस्य धर्म को राज्य से अलग रखे जाने के पक्षधर थे। इनमें वैज्ञानिक के.टी. शाह तो यह खुल्लमखुल्ला लिखे जाने के पक्ष में थे कि राज्य का किसी भी धर्म, सम्प्रदाय अथवा विश्वास की अवधारणा से कोई लेना-देना नहीं होगा।

भारतीय संविधान

भारतीय संविधान की उद्देशिका में कई कारणों से सेक्युलरवाद शब्द को शामिल नहीं किया गया था। वह दुर्घटनावश नहीं सायास उठाया गया कदम था। उसके एक सदस्य के.टी. शाह ने सेक्युलर शब्द को रखने की दो बार कोशिशें कीं। भारसाधक सदस्य डाॅ. अम्बेडकर के विरोध के कारण शाह का प्रस्ताव निरस्त कर दिया गया। सम्भव है यह अम्बेडकर का सोच हो कि सेक्युलर शब्द रख देने से भारत को ईसाई देशों की तरह धर्म विरोधी प्रचारित करने की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।

संविधान के प्रस्तोता और प्रारूप समिति के अध्यक्ष डाॅ. अम्बेडकर अपने बौद्धिक विन्यास में करुणा और क्रोध का इस कदर घालमेल करते हैं कि इतिहास में अक्सर अपने क्रोध की बानगी के कारण तीखे व्यक्ति के रूप में प्रचारित किये जाते हैं।

अम्बेडकर शास्त्रीय इतिहासकार नहीं हैं। उन्होंने प्रखर तर्क के संवैधानिक नश्तर बनाकर कई पुराने घावों का इलाज करने की कोशिश की। सवाल उन आदिम स्थितियों और अम्बेडकर की नीयत की जांच का होना चाहिए। उनसे कतराकर अभिव्यक्तिकार निकल जाते हैं।

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