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वैज्ञानिक कायरें को लेकर प्रो. राव की चिंता वाजिब

भारत रत्न और प्रधानमंत्री की वैज्ञानिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष प्रोफेसर सीएनआर राव ने देश में वैज्ञानिक कायरें को लेकर जो सवाल उठाए हैं वे एकदम सही हैं।

वैज्ञानिक कायरें को लेकर प्रो. राव की चिंता वाजिब
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भारत रत्न और प्रधानमंत्री की वैज्ञानिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष प्रोफेसर सीएनआर राव ने देश में वैज्ञानिक कायरें को लेकर जो सवाल उठाए हैं वे एकदम सही हैं। सर्वोच्च नागरिक सम्मान मिलने के बाद रविवार को इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस, बेंगलुरु के अपने आवास पर मीडिया से मुखाबित हुए तो अपना दर्द रोक नहीं पाए। उन्होंने कहा है कि यदि भारत वैज्ञानिक कायरें (नवोन्मेष और शोध कायरें के प्रकाशन) में दुनिया के टॉप टेन देशों में नहीं है तो इसका कारण है भारत सरकार की ओर से इस कार्य के लिए ऊंट के मुंह में जीरा जीतना फंड मिलना। और ये संसाधन भी समय से नहीं मिलते हैं। मशहूर रसायनशास्त्री यहीं नहीं रुके उन्होंने बताया कि हमें किसी प्रोजेक्ट पर कार्य के लिए जितने संसाधन की वास्तव में जरूरत होती है उसका मात्र बीस फीसदी ही मिल पाता है। देश में ऐसी स्थिति पैदा करने के लिए प्रो. राव ने नेताओं को जिम्मेवार ठहराया है। विश्व के 166 देशों की सूची में नवप्रवर्तन के मामले में भारत की स्थिति काफी निराशाजनक है। भारत इस सूची में 66वें स्थान पर है। आर्थिक महाशक्ति बनने का दंभ भरने वाले, परमाणु शक्ति संपन्न और अंतरिक्ष फतह करने वाले देश के लिए यह शर्म की बात है। विभिन्न मंचों से प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह भी शोध कायरें पर विकसित देशों की तुलना में जीडीपी का बहुत कम हिस्सा 4.6 फीसदी खर्च किए जाने को लेकर चिंता जता चुके हैं, परंतु अभी तक उन्होंने भी इस समस्या को दूर करने के लिए कोई इच्छाशक्ति नहीं दिखाई है। प्रो. राव का कहना बिल्कुल ठीक है कि किसी भी समाज का विकास ज्ञान-विज्ञान से ही संभव है। भारत का भी भविष्य यदि सुरक्षित करना है तो सरकार को बेसिक साइंस और विज्ञान की शिक्षा पर जोर देना होगा। मौजूदा दौर में वैज्ञानिक दृष्टि से विकसित देश ही विकास की पथ पर अग्रसर हो मानव कल्याण सुनिश्चित कर सकते हैं। आज किसी भी देश की वैज्ञानिक और तकनीकी क्षमता उसकी आर्थिक प्रगति का पैमाना बन चुकी है लेकिन दुर्भाग्य हैकि हमारे नीति निर्माता इस बात को नहीं समझ रहे हैं या समझकर अनदेखा कर रहे हैं और उन्होंने विज्ञान के विकास को अपने मुख्य एजेंडे से बाहर कर दिया है। जबकि चीन ने इस बात को समझा है। अब तक अमेरिका नंबर एक पर है जो दुनिया भर में हो रहे शोध कायरें में 16.5 फीसदी पेश करता है। चीन करीब 12 फीसदी पेश कर रहा है जो अगले वर्ष तक 16.5 से 17 फीसदी होने को है। भारत महज 2.5 से 3 फीसदी पेश कर रहा है। भारत शोध पत्रों की संख्या में ही नहीं बल्कि उनकी गुणवत्ता में भी पीछे है। स्थिति बदलनी है तो देश में विज्ञान के लिए वातावरण तैयार करना होगा। दुनिया के ज्यादातर विकसित देश वैज्ञानिक शोध को बढ़ावा देने के लिए अपने शोध फंड का 30 प्रतिशत तक विश्वविद्यालयों को देते हैं, मगर अपने देश में यह प्रतिशत सिर्फ छह है। ज्यादातर विश्वविद्यालयों के पास कोई रूपरेखा तक नहीं है। इसको सुधारने के लिए सरकार को तुरंत ध्यान देना होगा। आज विज्ञान विषयों से छात्रों का मोहभंग हो रहा है। विज्ञान को रुचिकर बना इसे रोजगार से जोड़ना होगा। देश में प्रो. राव जैसे कई वैज्ञानिक पैदा करने के लिए विज्ञान शिक्षा और शोध के लिए नया माहौल बनाने और समुचित फंड देने की जरूरत है।

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