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भारत बंद: 16 प्रतिशत दलित वोट बैंक के लिए देश में राजनीतिक भूचाल

देश भर में दलितों को केन्द्र की भाजपा नीत राजग सरकार के खिलाफ भड़काने की कोशिशें क्यों की जा रही हैं, इसे समझने की जरूरत है। ऐसा नहीं है कि नरेन्द्र मोदी की सरकार ने दलितों के खिलाफ कोई फैसला किया है, जिसे आधार बनाकर उन्हें उकसाने की चेष्टा हो रही है।

भारत बंद: 16 प्रतिशत दलित वोट बैंक के लिए देश में राजनीतिक भूचाल

देश भर में दलितों को केन्द्र की भाजपा नीत राजग सरकार के खिलाफ भड़काने की कोशिशें क्यों की जा रही हैं, इसे समझने की जरूरत है। ऐसा नहीं है कि नरेन्द्र मोदी की सरकार ने दलितों के खिलाफ कोई फैसला किया है, जिसे आधार बनाकर उन्हें उकसाने की चेष्टा हो रही है। इसके उलट प्रधानमंत्री ने ऐसे कई कार्य किए हैं, जिनसे दलितों का मान-सम्मान बढ़ा है और उनकी आर्थिक सामाजिक स्थिति भी सुधरी है।

उज्जवला योजना हो या फिर आठ करोड़ गरीब परिवारों तक रसोई गैस कनैक्शन पहुंचाने की योजना, उनका सर्वाधिक लाभ इसी वर्ग को मिल रहा है। प्रधानमंत्री ने लंदन स्थित उस घर को खरीदकर स्मारक में रूप में तब्दील करने का ऐलान किया, जिसमें रहकर डा. भीमराव आंबेड़कर ने कानून की पढ़ाई की थी। जहां मध्य प्रदेश में उनका जन्म हुआ, उस मऊ में भी स्मारक बनाने का ऐलान किया।

दिल्ली के जिस अलीपुर इलाके में वह रहते थे, उस स्थान को स्मारक में तब्दील कर दिया गया है। जब राष्ट्रपति पद की बात आई तो मोदी सरकार ने एक दलित रामनाथ कोविंद को इस पद पर सुशोभित करने का फैसला लिया। आजादी के बाद के आर नारायणन के बाद वह दूसरे दलित राष्ट्रपति हैं, जिन्हें भाजपा सरकार ने बनाया है।

ऐसे और भी बहुत से फैसले इस सरकार ने लिए हैं और संभवतः यही वजह है कि दलितों की राजनीति करने वाले नेताओं को लगने लगा है कि उनकी राजनीति के दिन लदने का वक्त आ गया है। 1996 तक भी भाजपा को दलित मतदाताओं के वोट अधिक संख्या में नहीं मिलते थे। तब उसे तेरह प्रतिशत वोट ही इस वर्ग के हासिल हुए थे परंतु 2014 आते-आते दलित मतदाताओं का रुख बड़ी संख्या में उसकी तरफ हुआ और उसे चौबीस प्रतिशत के करीब मत हासिल हुए।

यह मायावती से लेकर कांग्रेस तक के लिए किसी झटके से कम नहीं था कि लोकसभा के चौरासी में से चालीस सुरक्षित सीटें अकेले भाजपा ने जीत ली थी। केवल लोकसभा ही नहीं, उसके बाद जितने भी विधानसभा चुनाव हुए हैं, उन सबमें भाजपा को दलित मतदाताओं ने बड़ी संख्या में वोट डाले हैं। यही वजह है कि जब भी किसी राज्य में कोई घटना होती है, उसे पूरे देश में तूल दिया जाता है ताकि प्रधानमंत्री और भाजपा को दलित विरोधी साबित किया जा सके।

सर्वविदित है कि हाल में सर्वोच्च न्यायालय ने महाराष्ट्र के एक मामले की सुनवाई करते हुए यह व्यवस्था स्वयं दी थी कि जब तक दलित उत्पीड़न एक्ट में दर्ज मामले की जांच नहीं हो जाती, तब तक किसी की गिरफ्तारी नहीं होगी और ऐसे व्यक्ति को अपनी अग्रिम जमानत का हक होगा। यह फैसला केन्द्र सरकार का नहीं, सुप्रीम कोर्ट का है परंतु मायावती से लेकर कांग्रेस और दूसरे दलों ने पूरे देश में इसे इस तरह से प्रचारित किया, जैसे यह निर्णय मोदी सरकार का है।

भारत बंद का आह्वान किया गया। जगह-जगह आगजनी कराई गई। ट्रैफिक और रेलवे यातायात जाम किया गया। प्रधानमंत्री के पुतले फूंके गए। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस बीच कई बार दलितों को उकसाने के लिए इन हालातों के लिए नरेन्द्र मोदी को ही जिम्मेदार बताया ताकि दलितों में उनकी लोकप्रियता को कम किया जा सके।

आश्चर्य का विषय तो यह है कि लगातार दलितों पर अपनी पकड़ खो रही कांग्रेस के नव नियुक्त अध्यक्ष ने राजघाट पर बढ़ते कथित दलित उत्पीड़न के खिलाफ एक दिन का सांकेतिक उपवास तक रख डाला। इस दलित राजनीति के पीछे की उनकी राजनीतिक मजबूरी सबको समझ में आ रही है। 1967 में जिस कांग्रेस को 45 प्रतिशत दलित वोट हासिल हुए थे, 2014 में वह घटकर 19 प्रतिशत रह गया है।

अस्सी के दशक में कांशीराम और मायावती के उभार ने कांग्रेस से यह वर्ग छीन लिया था और अब मोदी की आंधी ने रही-सही कसर पूरी कर दी है, जिसमें कांग्रेस ही नहीं, मायावती के राजनीतिक तंबू भी उखड गए हैं। यही कारण है कि सुनियोजित तरीके से दलित उत्पीड़न की अफवाहें उड़ाकर निशाने पर प्रधानमंत्री को लिया जा रहा है। इन सबकी निगाह देश के सोलह प्रतिशत दलित वोटों पर है, जो किसी का भी खेल बना और बिगाड़ सकते हैं।

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