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भारत बंद की समीक्षा: कांग्रेस के साथ आए 21 दलों के हल्लाबोल से क्या मिला ?

भारत बंद की समीक्षा पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों के खिलाफ कांग्रेस समेत करीब 21 दलों के हल्लाबोल प्रदर्शन के दौरान जिस तरह हिंसा, उपद्रव देखने को मिला है, यह लोकतंत्र की गरिमा के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है।

भारत बंद की समीक्षा: कांग्रेस के साथ आए 21 दलों के हल्लाबोल से क्या मिला ?

लोकतंत्र में विपक्ष को सरकार के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन का संविधान प्रदत्त अधिकार है। आम जनता और संगठनों को भी सरकार के प्रति रोष प्रकट करने का संवैधानिक अधिकार है। लेकिन सभी को ये अधिकार शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए हैं, न कि हिंसक और विनाशी प्रदर्शन के लिए हैं। पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों के खिलाफ कांग्रेस समेत करीब 21 दलों के हल्लाबोल प्रदर्शन के दौरान जिस तरह हिंसा, उपद्रव देखने को मिला है, यह लोकतंत्र की गरिमा के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है।

विपक्ष के इस विरोध प्रदर्शन के दौरान मुंबई से लेकर बिहार तक कहीं हिंसा हुई, कहीं वाहनों में तोड़फोड़ की गई, कहीं गाड़ियां फूंकी गईं, कहीं पेट्रोल पंप को जलाने की कोशिश की गई, कहीं ट्रेनें रोकी गईं, कहीं गोली मारी गई, कहीं मौत हो गई।

आखिर विरोध के नाम पर अराजकता फैलाने की कोशिश क्यों? क्या विपक्ष विरोध-प्रदर्शन के बहाने देश में अस्थिरता फैलाना चाहता है। क्या विपक्ष शांतिपूर्ण प्रदर्शन आयोजित नहीं कर सकता था?

जबकि उसने शांतिपूर्ण प्रदर्शन का वादा किया था, उसने जरूरी सामानों की आपूर्ति को भी बाधित नहीं करने का भी भरोसा दिया था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ, देशभर में हिंसा-उपद्रव का तांडव देखा गया।

आखिर विरोध के नाम पर सरकारी व निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाना कहां तक जायज है? जबकि सुप्रीम कोर्ट भी प्रदर्शन के दौरान संपत्तियों को क्षति पहुंचाने की प्रवृत्ति पर नराजगी जता चुका है।

  • शीर्ष अदालत ने तो क्षति की भरपाई धरना-प्रदर्शन के आयोजकों से करने का सुझाव दिया है। इस बंद का बिहार, राजस्थान, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक में कहीं आंशिक, कहीं पूर्ण असर देखा गया, देश के शेष हिस्सों में बेअसर रहा। इससे विपक्ष को अंदाजा हो गया होगा कि आवाम में सरकार के प्रति किसी प्रकार का जनाक्रोश नहीं है।
  • सरकार के विरोध के नाम पर कांग्रेस बार-बार जिस विपक्षी एकता का ढिंढोरा पीटती है, वह इस बार भी ढाक के तीन पात ही नजर आई। कांग्रेस ने कहा कि 21 विपक्षी दल बंद में उसके साथ है, लेकिन राजघाट से रामलीला मैदान तक कांग्रेस नेता सोनिया गांधी के नेतृत्व में निकाले गए विरोध मार्च में केवल 16 दल के नेता ही शरीक हुए। यानी पांच दल साथ नहीं आए।
  • इसके अलावा सात विरोधी दलों ने कांग्रेस के बंद में साथ ही नहीं दिया। इनमें अन्नाद्रमुक, टीएमसी, बीजद, तेदपा, टीआरएस, वाईएसआर कांग्रेस और आप शामिल हैं। इससे पहले भी अविश्वास प्रस्ताव के दौरान विपक्षी एकता का कांग्रेस का भ्रम टूट चुका है। कहने का तात्पर्य कि विपक्ष बिखरा हुआ है और अनेक दलों को कांग्रेस की छतरी स्वीकार नहीं है।

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को अब समझ जाना चाहिए कि विपक्षी दलों का देशव्यापी महागठबंधन का आइडिया ढकोसला है, अपरिपक्व है। पेट्रोल-डीजल के भाव सरकार के नियंत्रण में नहीं है।

कांग्रेस सरकार के समय ही इसे बाजार के हवाले कर दिया गया था। यानी तेल कंपनियां भाव तय करती हैं। दूसरी अहम बात कि भारत कच्चे तेल की अधिकांश जरूरत आयात से पूरी करता है।

इसलिए ग्लोबल स्तर पर कच्चे तेल के दाम बढ़ने और रुपये में गिरावट के चलते पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ी हैं। इसमें सरकार की कोई भूमिका नहीं है। इसलिए पेट्रोलियम की महंगाई को लेकर सरकार के खिलाफ हल्लाबोल का कोई अर्थ नहीं है। लगता है सत्ता की ललक में विपक्ष तथ्य को भ्रमित कर रहा है।

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