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प्रमोद भार्गव का लेख : दगाबाजी चीन का हथियार

दरअसल चीन का लोकतंत्रिक स्वांग उस सिंह की तरह है जो गाय का मुखौटा ओढ़कर धूर्तता से दूसरे प्राणियों का शिकार करने का काम करता है। इसका नतीजा है कि चीन 1962 में भारत पर आक्रमण करता है और पूर्वोत्तर सीमा में 40 हजार वर्ग किलोमीटर जमीन हड़प लेता है। कैलाश मानसरोवर भगवान शिव के आराध्य स्थल के नाम से हमारे प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में दर्ज होने के साथ अखंड भारत का हिस्सा हैं, लेकिन भोले भंडारी अब चीन के कब्जे में हैं।

9वें दौर की वार्ता में भारत का चीन को फिर दो टूक जवाब- LAC पर मई से पहले की स्थिति बहाल हो
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9वें दौर की वार्ता में भारत का चीन को फिर दो टूक जवाब

प्रमोद भार्गव

लद्दाख में 14000 फीट की ऊंचाई पर स्थित दुर्गम गालवन नदी घाटी में चीनी सैनिकों की दगाबाजी के चलते 20 भारतीय वीर सपूतों को शहीद होना पड़ा है। 45 वर्ष बाद एक बार फिर भारत-चीन सीमा विवाद ने सैन्य संघर्ष का रूप धारण कर लिया है। सेना द्वारा जारी बयान में कहा है कि गालवन घाटी में तनाव कम करने की बातचीत के दौरान हिंसक टकराव में कर्नल बी. संतोष बाबू समेत बीस सैनिक शहीद हुए हैं। फिलहाल दोनों सेनाओं के सैनिक पीछे हट गए हैं। दरअसल संतोष बाबू दो जवानों के साथ चीनी अधिकारियों के साथ गतिरोध से जुड़ी वार्ता कर रहे थे। वार्ता के दौरान ही चीनी सैनिक उग्र हो गए और उन्होंने निहत्थे जवानों पर कंटीले डंडों, लोहे की छड़ों और पत्थरों से हमला बोल दिया। धोखे से किए गए इस हमले को देखने के बाद भारतीय सैनिकों ने पलटवार किया, जिसमें 43 चीनी सैनिक मारे गए। पीएलए के निकट चीनी हेलिकॉप्टर शवों व घायलों को ढोते देखे गए हैं।

गौरतलब है कि आखिर चीन और भारत के बीच झड़प में गोलीबारी क्यों नहीं होती? दरअसल 1993 में प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहराव ने चीन यात्रा के दौरान वास्तविक नियंत्रण रेखा पर शांति और स्थिरता बनाए रखने की दृष्टि से एक समझौता किया था। समझौते की शर्तों के मुताबिक एक तो दूसरे पक्ष के खिलाफ बल या सेना के प्रयोग की धमकी नहीं दी जाएगी। दूसरे, दोनों देशों की सेनाओं की गतिविधियां नियंत्रण रेखा पार नहीं करेंगी। यदि भूलवश एक पक्ष के जवान नियंत्रण रेखा पार कर लेते हैं तो दूसरी तरफ से संकेत मिलते ही नियंत्रण रेखा के उस पार चले जाएंगे। तीसरे, दोनों पक्ष विश्वास बहाली के उपायों के जरिए नियंत्रण रेखा के इलाकों में काम करेंगे। परंतु जब ड्रैगन की विस्तारवादी मानसिकता का पाठ पढ़े शातिर सैनिक समझौतों की शर्तों का उल्लंघन कर रेखा पार कर भारतीय सीमा में चले आए, तब निहत्थे कर्नल संतोष बाबू मात्र दो साथियों के साथ उन्हें रोकने पहंच गए और शत्रु की धूर्तता का शिकार हो गए। ये सभी बलिदानी बिहार-16 रेजीमेंट के सैनिक थे।

गालवन नदी घाटी क्षेत्र 1962 में हुई भारत-चीन की लड़ाई में भी प्रमुख युद्ध स्थल रहा था। कुछ साल पहले भी चीनी सैनिकों ने भारतीय लद्दाख सीमा में घुसकर तंबू गाढ़कर डेरा डाल लिया था। चीन विवादित नियंत्रण रेखा पार कर अरुणाचल प्रदेश के चागलागम क्षेत्र में घुसने की कोशिश में लगा रहता है। दरअसल चीन बहरूपिया का चोला ओढ़े हुए है। एक तरफ वह पड़ोसी होने के नाते दोस्त की भूमिका में पेश आता है, वहीं दूसरी तरफ ढाई हजार साल पुराने भारत-चीन के सांस्कृतिक संबंधों के बहाने हिंदी-चीनी, भाई-भाई का राग अलाप कर अपने कारोबारी हित साधता रहता हंै। चीन का एक अन्य मूखौटा दुश्मनी का है, जिसके चलते वह पूरे अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम पर अपना दावा ठोकता है। यही दावा अब वह लद्दाख पर जता रहा है। छोटे से देश भूटान को हड़पने की भी उसकी मंशाएं प्रकट रूप में सामने आती रहती हैं। चीन की यह मंशा भी रही है कि भारत की चीन की तुलना में अर्थवयवस्था मजबूत नहीं होने पाए।

दरअसल चीन का लोकतंत्रिक स्वांग उस सिंह की तरह है जो गाय का मुखौटा ओढ़कर धूर्तता से दूसरे प्राणीयों का शिकार करने का काम करता है। इसका नतीजा है कि चीन 1962 में भारत पर आक्रमण करता है और पूर्वोत्तर सीमा में 40 हजार वर्ग किलोमीटर जमीन हड़प लेता है। कैलाश मानसरोवर भगवान शिव के आराध्य स्थल के नाम से हमारे प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में दर्ज होने के साथ अखंड भारत का हिस्सा हैं, लेकिन भोले भंडारी अब चीन के कब्जे में हैं। यही नहीं गूगल अर्थ से होड़ बररते हुए चीन ने एक आॅनलाइन मानचित्र सेवा शुरू की है, जिसमें भारतीय भू-भाग अरुणाचल और अक्शाई चिन को चीन ने अपने हिस्से में दर्शाया है। चीन की अब माउंट एवरेस्ट पर भी गलत नजर है। विश्व मानचित्र खंड में इसे चीनी भाषा में दर्शाते हुए अरुणाचल प्रदेश को दक्षिणी तिब्बत का हिस्सा बताया गया है, जिस पर चीन का दावा पहले से है। गौरतलब है, साम्यवादी देशों की हड़प नीति के चलते ही छोटा सा देश चेकोस्लोवाकिया बर्बाद हुआ। ताइवान और हांगकांग को भी चीन हड़पने की रणनीति अपनाने में लगा है। चीनी दखल के चलते बर्बादी की इसी राह पर नेपाल है। तिब्बत को तो वह लील ही चुका है।

चीन की दोगलाई कूटनीति तमाम राजनीतिक मुद्दों पर साफ दिखाई देती है। यह भारत के लिए ही नहीं दुनिया के लिए चिंता का कारण बनी हुई है। दुनिया जनती है कि भारत-चीन की सीमा विवादित है। सीमा विवाद सुलझाने में चीन की कोई रुचि नहीं है। वह अपनी सीमाओं के विस्तार की मंशा पाले हुए है। चीन भारत से इसलिए नाराज है, क्योंकि उसने जब तिब्बत पर कब्जा किया था, तब भारत ने तिब्बत के धर्मगुरू दलाई लामा को शरण दी थी। जबकि चीन की इच्छा है कि भारत दलाई लामा और तिब्बतियों द्वारा तिब्बत की आजादी के लिए लड़ी जा रही लड़ाई की खिलाफत करे। दरअसल भारत ने तिब्बत को लेकर शिथिल व असंमजस की नीति अपनाई है। जब हमने तिब्बतियों को शरणर्थियों दी, तब तिब्बत को स्वंतत्र देश मानते हुए अंतराष्ट्रीय मंच पर सर्मथन की घोषणा करने की जरुरत भी थी? डॉ राममनोहर लोहिया ने संसद में इस आशय का बयान भी दिया था। लेकिन नेहरू ऐसा नहीं कर पाए? इसके दुष्परिणाम भारत आज तक झेल रहा है?

दरअसल भारत के राजनीतिक नेतृत्व ने हमेशा संयम का परिचय दिया है। जिसे चीन ने भारत की कमजोरी माना। इसी के चलते वह सीमा पर दबाव बनाकर चीनी सामान के निर्यात का लाभ उठाता रहा। किंतु अब आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग का वातावरण बनाना शुरू कर दिया है। इस खूनी झड़प के बाद देश की जनता और व्यापारी इस संकल्प की ओर बढ़ रहे हैं कि चीन द्वारा एक लाख करोड़ की जिन वस्तुओं और उपकरणों का निर्यात किया जाता है, उसका बहिष्कार तो करेंगे ही, देशज संसाधनों से इनका निर्माण भी करेंगे। भारत की यह मंशा चीन के हितों पर कुठाराघात है। इसलिए चीन नाजायज दबाव बनाकर यथास्थिति बनाए रखना चाहता है। भारत को अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चीन को घेरने की कूटनीतिक पहल भी करने की जरूरत है। इस समय चीन हांगकांग, ताइवान और तिब्बत की स्वतंत्रता के परिप्रेक्ष्य में आदमखोर बना हुआ है। गोया, भारत का अमेरिका, आस्ट्रेलिया और जापान के साथ जो गठजोड़ बना है, उसे धार देने की जरूरत है। कोरोना महामारी में चीन ने जो निरंकुश्ता विश्व समुदाय के साथ बरती है, उसे भी भुनाने की जरूरत है। क्योंकि इस संकटकाल में केवल भारत ही ऐसा देश रहा है, जिसने सौ से ज्यादा देशों को हाइड्रोक्सी-क्लोरोक्वीन गोली मुफ्त में दी। इस अवसर को कूटनीतीक रणनीति में बदलने की जरूरत है।

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