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व्यंग्य: श्री लिफाफा महात्म्य

जरा लिफाफे के बहुआयामी और बहुरूपी व्यक्तित्व पर कृपादृष्टि तो डालिए भाई लोगों।

व्यंग्य: श्री लिफाफा महात्म्य

जरा लिफाफे के बहुआयामी और बहुरूपी व्यक्तित्व पर कृपादृष्टि तो डालिए भाई लोगों। यूं तो अंतत: मजमून ही सामने आता है, लेकिन मजमून से पहले लिफाफे से ही सामना होता है हर किसी का। यानी कि लिफाफे के स्वागत को स्वीकार करने के बाद ही मजमून के दर्शन का अवसर प्राप्त होता है। मेरे बंधुओं, वह क्या है कि अब अगर आपसे यह प्रश्न किया जाए कि लिफाफा बड़ा या फिर उसमें करीने से सहेज कर रखा गया मजमून, तो यकीनन ही आपको यह कहने में ज्यादा देरी नहीं लगेगी कि अरे भई भला इसमें ऐसा क्या खास सोचना।

इसमें कोई दो राय नहीं कि खासुल-खास तो मजमून ही होता है। बिल्कुल ठीक वैसे ही, जैसे कि शरीर रूपी लिफाफे में सहेज कर रखी गई आत्मा का मजमून, जो ऊपर वाला, सबका मालिक हम सबको अलॉट करता है। अब आत्मा का स्थान भला शरीर ले सकता है कभी! सो मजमून को ही बहुमत प्राप्त होगा। पर ठहरिए जनाब, नाचीज का इस मामले में सोचना थोड़ा जुदा-जुदा सा है। जरा अपने ज्ञान चक्षुओं की खिड़की के पल्लों को थोड़ा सा खोल कर लिफाफे नामक चीज पर विचार करिए, तो आपको इस मामले में काफी कुछ नया और खास-खास मिलेगा, ऐसा इस बंदे का सीना ठोंक कर दावा है।

जरा लिफाफे के बहुआयामी और बहुरूपी व्यक्तित्व पर कृपादृष्टि तो डालिए भाई लोगों। यूं तो अंतत: मजमून ही सामने आता है, लेकिन मजमून से पहले लिफाफे से ही सामना होता है हर किसी का। यानी कि लिफाफे के स्वागत को स्वीकार करने (यानी उसे फाड़ने या खोलने पर ही) के बाद ही मजमून के दर्शन का अवसर प्राप्त होता है। अर्थात लिफाफा एक कुशल और सजग प्रहरी की भूमिका और कर्त्तव्य निभाता है। अब जरा लिफाफे के बहुरूप और व्यक्तित्व के विभिन्न रंगो पर निगाहें डालें तो सहज ही पा जाएंगे कि लिफाफा अपने में कितना-कितना सस्पेंस और आकर्षण समेटे रहता है, लोगों की निगाहों और सोच में।

बहुत-बहुत तरह के लिफाफे रवां होते हैं हमारे-आपके और सबके रोजाना के जीवन में। चाहे किसी भी मामले का-किसी भी तरह के प्रकरण और मौके से संबंधित लिफाफा हो, मजमून के ऊपर हावी रहकर, वह लोगों के आकर्षण का केंद्र बन जाता है। अब चाहे उसमें नकद-नारायण यानी कि बेशकीमती मुद्रा हो या फिर रोजगार पाने का बहुमूल्य पत्र हो एक बेरोजगार युवा के लिए। चाहे सरकारी-गैरसरकारी और कार्यालय के कार्य का महत्वपूर्ण मैटर हो। कानून-सरकार और सम्मानित न्यायालय के बुलावे का कानूनी नोटिस हो या फिर किसी सामाजिक-सांस्कृतिक-धार्मिक कार्य में मिली भेंट-सम्मान का मजमून वगैरा हो,

लिफाफे की भूमिका सहज ही प्रथम पूज्य देव गणेश जी की तरह ही पहले-पहल की हो जाती है। यानी कि लिफाफे तेरे रूप अनंता, फैल गया है तू जनता-जनता। लिफाफे के महत्व का तो यह हाल है जनाब कि इस पर आप ज्ञानी जन जितना सोचते-विचारते जाएंगे, उतनी ही नई बातें सहज ही सामने आती जाएंगी, बिल्कुल परत-दर-परत खुलते प्याज के मानिंद। अब जरा साहित्य-संस्कृति, कला -संगीत की विभिन्न प्रकार की गतिविधियों में व्याप्त लिफाफा-संस्कृति पर तो गौर फरमाएं, कितना व्यापक महत्व हो जाता है लिफाफे महान का।

कवि-सम्मेलनों की विशाल दुनिया में लिफाफे का क्या महत्व रहा है..और अब तो और भी बढ़ कर है, यह आप सब प्रबुद्ध जनों से कहीं छिपा हुआ नहीं है। काव्य-रचना पाठ से कहीं भी-किसी भी प्रकार से इसका महत्व कम नहीं होता है और अब तो आज के दौर-ए-वक्त में यह काव्य-रचना पाठ पर भी भारी पड़ने की प्रवृत्ति-उपलब्धि को हासिल कर चुका है और इसका प्रबल प्रमाण कार्यक्रम के दौरान इस पर बेहद हसरत भरी टिकी निगाहों और इसको पा लेने की अवर्णनीय चाह से सहज ही मिल जाता है। यानी कि यह लिफाफा-महान अर्जुन के लक्ष्य-भेदन के बिंदु सा महत्व पा जाता है।

अब लिफाफा चाहे किसी भी रंग-रंगत को पाया हुआ हो, इसके महत्व पर इसके गोरे-काले और रंग-रंगीले होने का इंच भर असर नहीं पड़ता है। वह तो बस लिफाफा होता है... निरा लिफाफा, जिसकी नियति में ही मजमून पर हावी होना ऊपर वाले ने लिख दिया है, और इसकी कीमत और खुद फट-नुच कर शहीद हो चुकाता है। अब चाहे वह लाख शहीद हो जाए पर अपने महत्व का परचम उठाए ही रहता है क्योंकि यही शहीद का धर्म नियति-निर्धारित होता है।

सो, अब आप चाहे मजमून को जितनी भी तवज्जो दें, पर लिफाफे की अहमियत को रत्ती भर भी काम आंकने की भूल न कीजिएगा, क्योंकि यह लिफाफा ही है, जो मजमून और अंदर की सौगात को आप तक सुरक्षित और करीने ढंग से पहुंचाता है। लिफाफे जी आज के पूर्णतया बदल चुके युग में बदले हुए तौर-तरीकों के दौर में भी अपने धर्म को बखूबी निभाते हुए अपनी महत्ता को चौकस और बरकरार रखे हुए है। क्या यह खासियत उनको एक खास पहचान नहीं देती है, जरा विचारें तो बंधुओं।

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