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चुनाव पर निबंध: आचार संहिता की धज्जियां, चुनाव टिकट पक्का

चुनावों का बिगुल बज चुका है। खबरनवीस चैनलों तथा पार्टी प्रवक्ताओं का त्यौहारी मौसम आरम्भ होने को है। हिंदुस्तान में चुनाव एक महोत्सव है जो पांच वर्षों में एक बार मनाए जाने का प्रावधान है। किन्तु राजनीतिक परिस्थितियां अनुकूल नहीं रहने से इसे असमय भी मनाया जा सकता है।

चुनाव पर निबंध: आचार संहिता की धज्जियां, चुनाव टिकट पक्का
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चुनावों का बिगुल बज चुका है। खबरनवीस चैनलों तथा पार्टी प्रवक्ताओं का त्यौहारी मौसम आरम्भ होने को है। हिंदुस्तान में चुनाव एक महोत्सव है जो पांच वर्षों में एक बार मनाए जाने का प्रावधान है। किन्तु राजनीतिक परिस्थितियां अनुकूल नहीं रहने से इसे असमय भी मनाया जा सकता है। चुनाव पर निबंध के माध्यम से हम यह जानने का प्रयास करेंगे की ऐसे कौन-कौन से कारक हैं जिनकी उपस्थिति के बिना देश में चुनावों की कल्पना करना बेमानी है।

प्रत्याशी-हर राजनीतिक दल जिसे चुनाव लड़ने का टिकट देता है वो अपने दल का अधिकृत प्रत्याशी कहलाता है। जिन उम्मीदवारों को अनेक जतन करने के बावजूद टिकट नहीं मिलता वे कभी-कभी निर्दलीय या बागी उम्मीदवार के भेष में नज़र आते हैं। आर्थिक रूप से सक्षम प्रत्याशी अपने धन के सदुपयोग से आचार संहिता की धज्जियां उड़ाते हुए गली-मोहल्लों से गुजरते हैं और जनता को अपने मोहपाश में उलझाने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ते हैं।

कायकर्ता-चुनावी महोत्सव में प्रत्याशी के बाद यदि सर्वाधिक महत्वपूर्ण कोई व्यक्ति है तो वो निसंदेह कार्यकर्ता है। कार्यकर्ताओं का यह दायित्व होता है की प्रत्याशी का चुनाव टिकट पक्का होने के साथ ही वे जनसम्पर्क, मतदाता पर्ची वितरण, पार्टी कार्यालय स्थान चयन तथा प्रत्याशी के स्वागत इत्यादि का इंतजाम पूरी निष्ठा के साथ करें।

समर्पण भाव से कार्य करने वाले कार्यकर्त्ता अनेक अवसर पर प्रतिसाद के रूप में अपेक्षाकृत छोटे स्तर के चुनाव में टिकट पाने के हकदार बन जाते हैं। प्रशासन -चुनावी महोत्सव का एक महत्वपूर्ण घटक है प्रशासन। चुनावों को निर्बाध कराने कि सम्पूर्ण जवाबदेही प्रशासन कि होती है तथा छुटपुट घटनाक्रमों को छोड़ कर इस दायित्व का निर्वहन प्रशासन सदा करता आया है।

अधिकारियों के चुनावी प्रशिक्षणों से लगाकर मतों कि गणना तक का महत्वपूर्ण कार्य इसके जिम्मे होता है। प्रशासन से जुड़ा प्रत्येक अधिकारी-कर्मचारी इस बात से भली भांति वाकिफ़ होता है की इस धरा पर जल के बिना जीवन हो सकता है किन्तु निलम्बन के बिना चुनाव होना असम्भव है। मतदाता-चुनाव यदि शरीर है तो मतदाता इसकी आत्मा है।

चुनावी महोत्सव में जो प्रपंच रचा जाता है वो सिर्फ और सिर्फ इसलिए होता है कि मतदाता आकर्षित हो सकें। मतदाता इस त्यौहार का सम्पूर्ण लाभ लेता है तथा अपने मत की आहुति देकर खुश रहता है।

मतदाता और प्रत्याशी का मिलन आम तौर पर चुनावों के दौरान ही होता है तथा इसके बाद सम्भवतः ये एक-दुसरे से ज्यादा ताल्लुकात नहीं रखते हैं। उपसंहार-उपरोक्त समीक्षा से यह स्पष्ट है कि चुनाव के इस यज्ञ में प्रत्येक द्वारा दी जा रही आहुति का अपना महत्व है।

प्रश्न सिर्फ यह है कि आम व्यक्ति को इस प्रजातान्त्रिक प्रक्रिया से यदि उसकी आम समस्याएं सुलझाने में यदि सहयोग मिल सके तो प्रत्येक चुनाव का सदा स्वागत है बाकी तो राम ही राखेगा हमेशा कि तरह।

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