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व्यंग्य: लोकतंत्र की सबसे मनोरंजनकारी घटना है चुनाव

चुनाव लोकतंत्र की सबसे मनोरंजनकारी घटना है जिसमें तरह तरह के रहस्य रोमांच से भरे दृश्य दिखायी देते हैं। हर घटना के साथ कुछ स्मृतियां जुड़ी होती हैं। वैसे भी हमारा देश स्मृतियों का देश है। आज भी कुछ लोग मनु स्मृति के अनुसार जीवन जीने के हामी हैं। औसत भारतीय नोस्टेल्जिया का शिकार है।

व्यंग्य: लोकतंत्र की सबसे मनोरंजनकारी घटना है चुनाव
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चुनाव लोकतंत्र की सबसे मनोरंजनकारी घटना है जिसमें तरह तरह के रहस्य रोमांच से भरे दृश्य दिखायी देते हैं। हर घटना के साथ कुछ स्मृतियां जुड़ी होती हैं। वैसे भी हमारा देश स्मृतियों का देश है। आज भी कुछ लोग मनु स्मृति के अनुसार जीवन जीने के हामी हैं। औसत भारतीय नोस्टेल्जिया का शिकार है।

भारतीय जनता की इस मनोवृति को चुनावी ताल में घात लगाए बैठे सफेदपोश बगुले बखूबी जानते हैं और अनुकूल वातावरण देखकर कोई अतीत राग छेड़ देते हैं। जिसमें स्मृति के झरोखों से हर कोई अपने मतलब की हरियाली और रास्ता खोज सकता है। इस दिग्दर्शन का उपक्रम कराना ही चतुर नेता की कलात्मक उच्चता है।

जनता के मनोविज्ञान की समझ ही उसका भविष्य निर्धारित करती है। इस स्मृति लेखे में कई प्रतीक चिह्न रखे हैं जो हर पांच साल बाद झाड़ पोंछ कर निकाल लिए जाते हैं। मसलन किसान, युवा, महिलाएं, बुजुर्ग, मंदिर-मस्जिद आदि। इस सबकी याद इस अपूर्व बेला में ही आती है जैसे विरहिणी को अपने प्रियतम की याद सावन में या साहूकार को ब्याज की विकलता क्लांत करती है।

भारतीय साहित्य के बाद यही बेचारे किसानों के सच्चे हितैषी नजर आते हैं। किसान हर चुनाव का वो सेंटर फारवर्ड खिलाड़ी है जिसे ट्राफी जीतने के बाद कभी प्लेयर आफ टूर्नामेंट का पुरस्कार नहीं मिला। वो बस कोहनी और घुटने छिलवाता रहता है या गले के फंदा लगाकर झूलता रहता है। या कभी-कभी घोषणापत्रों और सेल्फियों के काम आता है।

सत्तारोहण के बाद वो नेटवर्क से उसका अचानक गायब हो जाना रहस्य का विषय है या साजिश का यह तय किया जाना बाकी है। युवाओं की याद का ताजा झोंका भी ऐसी ही क्षणजीवी उपज है। बेरोजगारी के बीहड़ वन में उनके लिए सुनहरे स्वप्न छुपा के रख दिए हैं। जा बेटा ढूंढ सके तो ढूंढ ले। हर चुनाव में युवा शक्ति ललकारी जाती है,

पुचकारी जाती है और हांकी जाती है, लेकिन उसके बाद उसे अज्ञातवास और उपेक्षा के वन में धकेल दिया जाता है। वैसे इन दिनों अध्यात्म प्रेम भी चरम पर है। और सब अपने को धर्मनिष्ठ साबित करने की होड़ में जुटे हैं। हर चुनाव से पहले ऐसी भूली बिसरी यादें आती हैं और मतदाता अपने को गौरवान्वित महसूस करता है।

फिर तो वही मंजर और वही अफसाने हैं ही। ऐसा लगता है सुनहरे घोषणापत्रों में सभी की इच्छाओं का एक रैक है। हाथ डालो और अपना पसंदीदा सपना निकाल लो, महिलाओं तुम निराश न हो। तुम्हारी अस्मिता की चिंता हमारा केन्द्रीय भाव है अब यह बात दीगर है कि कथा में हमेशा अंत में खलनायक हावी हो जाता है।

बुजुर्गों के लिए भी हमने उपेक्षा के आले बना दिए हैं। जहां चंदन है, नारियल है और अनमोल वचनों, सुभाषितों का कोश है बांचे और आशीर्वादी मुद्रा में मस्त रहें। चुनाव एक ऐसी विवशता है जहां ऐसी स्मृतियां रह रहकर कचोटती हैं। और हर बार इन स्मृतियों का पिंडदान एक रस्मी मजबूरी भी है।

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