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पेट्रोल-डीजल महंगा होने के फायदे

पेट्रोल-डीजल महंगा होने के फायदे अनेक हैं। इधर देखता क्या हूं कि लोगों ने हर बात पर सरकार की आलोचना करने का फैशन सा बना लिया है। जिसे देखो वो सरकार को कोसने में लगा रहता है। अब पेट्रोल और डीजल के दामों को ही ले लीजिए, लगातार बढ़ते दामों के लिए सरकार को घसीट रहे हैं।

पेट्रोल-डीजल महंगा होने के फायदे
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इधर देखता क्या हूं कि लोगों ने हर बात पर सरकार की आलोचना करने का फैशन सा बना लिया है। जिसे देखो वो सरकार को कोसने में लगा रहता है। अब पेट्रोल और डीजल के दामों को ही ले लीजिए, लगातार बढ़ते दामों के लिए सरकार को घसीट रहे हैं। अरे भाई कंपनी तो कंपनी की तरह मुनाफे के अर्थशास्त्र पर ही काम करेगी। कंपनियों का इतिहास ही ईस्ट इंडिया से लेकर मार्डन इंडिया तक ऐसा ही शोषक रहा है।

सरकार तो न्यूनतम हस्तक्षेप करना चाहती हैं, आपकी जिन्दगी में। मैं तो मानता हूं कि पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ने से कई अप्रत्यक्ष फायदे हैं। एक तो इससे लोग पूल बनाकर यात्रा करेंगे। जिस कारण कर्मचारियों में आपसी सद्भाव बढ़ेगा और उनकी बीच टांग-खिंचाई कार्यालयों में कम होगी। वैमनस्यता और ईर्ष्या की दीवारें ढहेंगी। यूं आजकल पूल संस्कृति बहुत तेजी से पनप रही है।

पूल बनाकर लोग ठेके ले लेते हैं और पूल के बहाने अपना हिसाब-किताब भी चुकता कर लेते हैं। जितने पूल उतनी पोल। साथ ही यदि कॉलोनी के लोग एक साथ यात्रा करेंगे तो इससे भी आपसी सौहार्द्र बढ़ेगा और पड़ोसियों में संवाद और प्रेम के रिश्ते स्थापित होंगे। कहा भी गया है कि मिलजोल से ही प्यार बढ़ता है।

अभी बहुत सी पत्नियों को शिकायत रहती है कि उनके वो घर ही नहीं ठहरते हैं। रात-दिन इधर-उधर घूमते रहते हैं। लेकिन जब तेल महंगा होगा तो मजबूरन पति देव को घर में रूकना पड़ेगा और पत्नी के काम में हाथ बंटाना पड़ेगा। इससे परिवार टूटने से बचेंगे और पत्नियों की चिर शिकायत पर स्वतः ही रोक लग जाएगी। हां इसका एक और फायदा भी होगा, उनका फोन कॉल खर्च बचेगा।

आवारा लड़के और शोहदे रात-दिन उन कॉलोनियों के चक्कर लगाते रहते हैं। जहां खूबसूरत लड़कियां रहती हैं, इससे नाहक तनाव उत्पन्न होता है। कभी-कभी नौबत दंगे फसाद की भी आ जाती है। पेट्रोल और डीजल महंगा होने से इन मजनुंओं पर रोक लगेगी और पुलिस का काम हल्का होगा। पुलिस को भी भागदौड़ नहीं करनी पड़ेगी। अमन चैन भी कायम रहेगा।

वस्तुतः हमें अपने सोच का नजरिया बदलना होगा। चीजों को नए और सकारात्मक तरीके से लेने की आदत डालनी होगी। जब हम किसी भी विषय को सकारात्मक ढंग से लेने तो परेशानी अपने आप खत्म हो जाएगी, अगर खत्म नहीं भी होगी तो कम जरूर हो जाएगी। आप विकासशील से विकसित देश की श्रेणी में जाना चाहते हैं और तेल के लिए सौ रुपये का नोट निकालते ही आपकी जान सूखती है।

अभी पिज्जा, बर्गर और जंक फूड के लिए पांच सौ रुपये निकालते हैं कि नहीं। मल्टी प्लेक्स में बैठकर फिल्म के लिए दो सौ रुपये देते हैं कि नहीं, तो विकास की कीमत चुकाने में परेशानी क्या है। विकास कोई ऐसे ही घिसटते हुए आता है क्या। वो गाजे-बाजे के साथ चमक दमक के साथ आता है। विकास आता है तो कई चेहरे बेनूर होते हैं, कई बस्तियां उजड़ती हैं तो क्या कुछ पेट भी तो भरते हैं।

कुछ चर्बी चढ़ती भी तो है। अब तुम्हारा कहां तक सोचें तुम्हें तो रोने की शाश्वत आदत सी पड़ गयी है। सौ के अंक को हमारे यहां शुभ माना जाता है भले ही वो सौ साल जीना हो या शतक लगाना या फिर एक सौ एक रुपये का शगुन। इस शतकीय अहसास को अब जरा आम जन भी तो फील कर के देखें। एक नए अनुभव को ट्राइ करके देखने मे क्या बुराई है।

टीवी पर विज्ञापन की बाला ही कहती है जीवन में सब कुछ ट्राइ कर के देखना चाहिए। भोगवाद के इस फलसफे में बुराई क्या है दोस्तों । हम ग्लोबल क्यों नहीं होना चाहते आखिर कब तक लोकल बने रहेंगे। अपनी चिंताओं से लेकर आचरण तक में, जब आज इतना बेहिसाब मूल्य और नैतिक पतन होता है तो एक उम्मीद की किरण तो है कि नहीं साहब।

तेल ने घुटने नहीं टेके और अपनी आन बान और शान को इतने कठिन समय में भी बनाए रखा। खहे किसी ने कितना कुछ भी कहा, लेकिन वो तस से मस नहीं हुआ। इस खुद्दारी को क्या आप सलाम नहीं करेंगे। इन दूरदर्शी नीतियों की पीठ नहीं ठोकेंगे। तो फिर आज से ही कुछ दिन तो गुजारिए पूल के साथ-साथ में।

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