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छत्तीसगढ़: नक्सली हमलों से खड़े हुए ये सवाल

छत्तीसगढ़ के पहले चरण के मतदान में अब ज्यादा वक्त नहीं बचा है। लोकतंत्र के महोत्सव के बीच कुछ ही दिन के फासले पर जिस तरह दंतेवाड़ा के अरनपुर क्षेत्र में एक और नक्सली हमला हो गया है, उससे साफ हो गया है कि इस प्रदेश में अब भी हिंसक माओवादी सक्रिय हैं। यही नहीं, कानून और व्यवस्था के साथ-साथ वह आम जनमानस के लिए भी गंभीर चुनौती और समस्याएं खड़ी करने से बाज नहीं आ रहे हैं।

छत्तीसगढ़: नक्सली हमलों से खड़े हुए ये सवाल

छत्तीसगढ़ के पहले चरण के मतदान में अब ज्यादा वक्त नहीं बचा है। लोकतंत्र के महोत्सव के बीच कुछ ही दिन के फासले पर जिस तरह दंतेवाड़ा के अरनपुर क्षेत्र में एक और नक्सली हमला हो गया है, उससे साफ हो गया है कि इस प्रदेश में अब भी हिंसक माओवादी सक्रिय हैं। यही नहीं, कानून और व्यवस्था के साथ-साथ वह आम जनमानस के लिए भी गंभीर चुनौती और समस्याएं खड़ी करने से बाज नहीं आ रहे हैं।

जब-जब दावे किए जाते है कि नक्सलवाद अपने अंतिम चरण में पहुंच रहा है, तब वह कोई न कोई ऐसी वारदात कर देते हैं, जिससे इन सरकारी दावों पर प्रश्न चिह्न लग जाता है। दंतेवाड़ा क्षेत्र के इस नक्सली हमले में दो जवानों के साथ-साथ दूरदर्शन के एक कैमरामैन पत्रकार की भी मौत हुई है। कुछ दिन पहले बीजापुर में भी नक्सलियों के हमले में चार जवान शहीद हो गए थे।

राज्य में 90 विधानसभा सीटों पर दो चरणों में मतदान होना है। पहले चरण में 18 सीटों पर 12 नवंबर को मतदान होना है जबकि दूसरे चरण में 78 सीटों पर 20 नवंबर को मतदान होगा। जो जानकारी मिल रही है, उसके अनुसार घात लगाकर यह हमला दूरदर्शन की टीम पर किया गया है, जिसमें उड़ीसा के मूल निवासी कैमरामैन अच्युतानंद साही की मौत हो गई है।

दूरदर्शन की टीम चुनावी कवरेज के लिए दंतेवाड़ा क्षेत्र में जा रही थी, इसी दौरान यह हमला किया गया। पुलिसकर्मी गंभीर रूप से घायल भी बताए जा रहे हैं। इस हमले के दौरान सुरक्षा बलों और नक्सलियों में मुठभेड़ भी हुई। मीडिया की टीम पर आमतौर पर नक्सलियों की ओर से हमले नहीं होते हैं। यह इस कारण और भी आश्चर्यजनक है,

क्योंकि कुछ ही समय पहले नक्सलियों की तरफ से एक विज्ञप्ति के जरिए कहा गया था कि मीडियाकर्मी इन क्षेत्रों में बेखौफ होकर कवरेज के लिए आ सकते हैं। यानी उन पर हमला नहीं किया जाएगा। ऐसे में दूरदर्शन की टीम पर घात लगाकर किया गया हमला कई सवाल खड़े करता है। हालांकि टीम के साथ सुरक्षाकर्मी थे परंतु जिस तरह हमला हुआ है,

उससे यह प्रश्न खड़ा होना लाजिमी है कि लंबे समय से नक्सली हिंसा से प्रभावित इस क्षेत्र में निष्पक्ष, स्वतंत्र और भयरहित मतदान कराने के लिए आखिर चुनाव आयोग और पुलिस प्रशासन की तैयारी कैसी है। क्या इसे पुख्ता तैयारी कहा जा सकता है। इस हमले के बाद जिस तरह अलग-अलग राजनीतिक दलों ने डा. रमन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार के साथ-साथ केन्द्र सरकार पर हमले शुरू किए हैं, वह चौंकाते नहीं हैं।

चुनावी मौसम में एक वर्ग की सहानुभूति अर्जित करने की मंशा से इस तरह की बयानबाजी कतई अस्वाभाविक नहीं लगती परंतु यह जरूर दर्शाती है कि आतंकवाद और नक्सलवाद जैसी समस्याओं को लेकर हमारे राजनीतिक दल किस कदर भ्रमित हैं और इन्हें राष्ट्रीय समस्या मानने के बजाय राजनीतिक अवसर के तौर पर देखने से बाज नहीं आते हैं।

डा. मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्रित्व काल में नक्सली हिंसा को देश की सबसे बड़ी समस्या बताया गया था। अब वही कांग्रेस इसे दूसरे तरीके से पेश करते हुए केन्द्र की मोदी सरकार पर हमलावर दिखाई दे रही है। मौजूदा सरकार ने भी नक्सली समस्या का अंत करने के लिए कई स्तरों पर एक साथ तेजी से काम करने की तरफ कदम बढ़ाए थे।

अभी ज्यादा समय नहीं हुआ है जब गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने यह जानकारी साझा की थी कि लगातार प्रयासों के चलते नक्सली समस्या कुछ ही जिलों तक सिमट कर रह गई है। यदि ऐसा है तो स्वागत योग्य है परंतु लोकतंत्र के महोत्सव के दौरान छत्तीसगढ़ की यह वारदातें चेता रही हैं कि उन्हें हल्के में लेने की भूल कतई न करें।

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