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संवैधानिक संकट के मुहाने पर खड़ा बांग्लादेश

बांग्लादेश संवैधानिक संकट के मुहाने पर खड़ा प्रतीत होता है। वहां पांच जनवरी को संसदीय चुनाव होने हैं।

संवैधानिक संकट के मुहाने पर खड़ा बांग्लादेश
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नई दिल्ली. बांग्लादेश संवैधानिक संकट के मुहाने पर खड़ा प्रतीत होता है। वहां पांच जनवरी को संसदीय चुनाव होने हैं, लेकिन राजधानी ढाका और अन्य शहरों में जिस तरह से विपक्षी दलों के आह्वान पर अनिश्चितकालीन हिंसक विरोध प्रदर्शन, देशव्यापी हड़ताल और यातायात को ठप किया जा रहा है, उससे पैदा हुई अराजकता ने भारत के पड़ोसी देश में लोकतंत्र के सामने नई तरह की मुश्किलें खड़ी कर दी है।
इस टकराव की एक वजह खुद चुनाव ही है। बांग्लादेशी नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की खालिदा जिया और 18 अन्य विपक्षी दल चुनाव का बहिष्कार कर रहे हैं। वे चाहते हैं कि सत्तारूढ़ अवामी लीग की प्रधानमंत्री शेख हसीना चुनाव से पूर्व इस्तीफा देकर एक निष्पक्ष कार्यवाहक सरकार का गठन करें। संसदीय चुनाव की पूरी प्रक्रिया उसकी देखरेख में संपन्न कराई जाये, लेकिन सरकार ने इस मांग को खारिज कर दिया है।
दरअसल, बांग्लादेश में कार्यवाहक सरकार की निगरानी में चुनाव की व्यवस्था रही है परंतु प्रधानमंत्री ने साल 2011 में सुप्रीम कोर्ट की मदद से इस व्यवस्था को खत्म कर दिया था। चुनाव प्रक्रिया संपन्न होने तक प्रधानमंत्री शेख हसीना ने कार्यवाहक सरकार की बजाय कई दलों को मिलाकर एक राष्ट्रीय गठजोड़ बनाया है। उन्होंने विरोधी खालिदा जिया को उनकी इच्छा के अनुरूप पद देने की पेशकश भी की थी, लेकिन खालिदा ने हसीना की ये पेशकश ठुकरा दिया था।
उनका आरोप है कि आवामी लीग की सरकार चुनावों में धांधली करा सकती है। फिलहाल खालिदा जिया अपने घर में कैद हैं। दूसरे बड़े नेता और पूर्व सैनिक शासक एचएम इरशद, जो जातिया पार्टी के प्रमुख हैं, भी चुनाव बहिष्कार करने के कारण सैनिक अस्पताल में कैद हैं। अब मैदान में आवामी लीग ही एकमात्र बड़ी पार्टी मौजूद है। जमात-ए-इस्लाम को गत वर्ष हसीना सरकार ने देश विरोधी नीतियों के कारण प्रतिबंधित कर दिया था।
ऐसे में सत्ताधारी दल कुल तीन सौ सीटों में से करीब आधी पर बिना चुनाव लड़े ही जीत हासिल कर लेगी। बीएनपी और तमाम विपक्षी दलों के शामिल नहीं होने से चुनाव बेमानी हो सकते हैं। निश्चित रूप से आवामी लीग के लिए भी इस जीत के कोई मायने नहीं रह जाएंगे। निष्पक्ष चुनाव ही निष्पक्ष लोकतांत्रिक सरकार के गठन का मार्ग प्रशस्त कर सकता है, परंतु विपक्षी दलों को भी समझना चाहिए कि इसके लिए अराजकता फैलाना कहां तक जायज है।
वहां के हालात ने भारत की बांग्लादेशी नीति के समक्ष भी गंभीर चुनौती पैदा कर दी है। इसमें कोईदो राय नहीं कि आवामी लीग की सत्ता में होना नई दिल्ली को ज्यादा सूट करता है। भारत की विदेश नीति, खासकर सुरक्षा के मोर्चे पर शेख हसीना की सरकार में, काफी सफल रही है। जिस तरह से उनकी सरकार ने कट्टरपंथी जमातों और उत्तर-पूर्व के उग्रवादियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की है। वह काबिले तारीफ है। हालात को देखते हुए शेख हसीना को भी सूझबूझ का परिचय देना होगा। सभी राजनीतिक दलों और संगठनों को भी ध्यान रखना होगा कि बांग्लादेश में लोकतंत्र का अस्तित्व कायम रहेगा, उसी में उनकी भलाई है।

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