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अवधेश कुमार का लेख: देशहित ही सबसे ऊपर

यह सच है कि मोदी ने स्वयं आगे बढ़कर मोर्चा संभाला है। वह साधारण साहस एवं जोखिम का कार्य नहीं है। स्वास्थ्य राज्यों का विषय है, किंतु कोरोना से संघर्ष की पूरी जिम्मेदारी केन्द्र ने कंधों पर उठा रखी है। किस राज्य को कब क्या आवश्यकता है, कितनी जल्दी पूर्ति की जा सकती है, एक पूरा तंत्र प्रधानमंत्री की मॉनिटरिंग में काम कर रहा है। स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन स्वयं 24 घंटे एक-एक राज्य, सभी प्रमुख अस्पतालों, स्वास्थ्य मंत्रालय सहित इसके अतिरिक्त विज्ञान के क्षेत्र में सक्रिय शोध संस्थानों, रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन, स्वास्थ्य संघों, अन्य वो संस्थाएं, जो कोरोना को ध्यान में रखकर कुछ सामग्रियों का निर्माण कर रहीं हैं या किट आदि विकसित कर रहीं हैं सबके साथ समन्वय बनाकर काम कर रहे हैं।

अवधेश कुमार का लेख:  देशहित ही सबसे ऊपर

अवधेश कुमार

किसी नेता या सरकार की वास्तविक परीक्षा संकट के समय ही होती है तो कोरोना संकट के बीच प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार की भूमिका के मूल्यांकन के लिए कसौटियां क्या हो सकती हैं? संकट के समय स्वयं धैर्य एवं संयम बनाए रखकर देश को सही दिशा देते हुए एकजुट करना, विपक्ष तो छोड़िए, घोर विरोधियों एवं मूर्खतापूर्ण व्यवहार करने वालों के प्रति भी कटुता न पालना तथा भारत के संस्कार के अनुरुप चिंता को राष्ट्र की भौगोलिक सीमाओं से बाहर निकालकर विश्व मानवता विस्तारित करना। आप इन कसौटियों पर मोदी एवं उनकी सरकार को परखिए और निष्कर्ष निकालिए। जबसे कोरोना वायरस का हमला हुआ है मोदी ने देश के नाम चार संबोधन दिए हैं और एक मन की बात की है। किसी भाषण मंे एक शब्द राजनीति का आपको नहीं मिलेगा। चार भाषणों में तो सरकार की किसी उपलब्धि का वर्णन तक नहीं। देशवासियों को वास्तविक खतरे से अवगत कराते हुए भी भय एवं निराशा पैदा न हो इसके प्रति वे हमेशा सतर्क रहे। एक-एक नागरिक का क्या दायित्व है इसका पूरा अहसास कराया।

पूरे कोरोना संकट में प्रधानमंत्री और भारत सरकार की भूमिका का यही संक्षिप्त चित्रण है। जब मोदी 14 अप्रैल को सुबह 10 बजे देश को संबोधित करने आए उस समय तबलीगी जमात का मामला चरम पर था। तबलिगियों को तलाशकर टेस्ट करने और कोरंटाइन करने में समस्याएं पैदा हो रही थीं। उनके खिलाफ राज्य सरकारें मजबूरी में मुकदमे दर्ज कर रही थीं। इसमें ऐसी संभावना प्रकट की जा रही थी कि मोदी अपने भाषण में तबलीगियों की निंदा करेंगे तथा उनका समर्थन करने वालों को कुछ सीख भी दे सकते हैं। प्रधानमंत्री ने इस पर एक शब्द नहीं बोला। यह सामान्य वैचारिक संतुलन और धैर्य का पर्याय नहीं है। तबलीगी जमात अकेले कोरोना संक्रमण का सबसे बड़ा कारण बन चुका था। स्वास्थ्यकर्मियों पर हमले का उनका व्यवहार किसी दृष्टि से स्वीकार्य नहीं था। इसमें उनकी चर्चा और आलोचना गलत नहीं होती। या उनसे वे ऐसा न करने की अपील भी कर सकते थे। किंतु इससे मूल लक्ष्य के बाधित होकर फिर तू-तू-मैं-मैं का माहौल बन जाता एवं कोरोना के विरुद्ध जिस तरह का वैचारिक एवं व्यावहारिक एकता देश में कायम हुआ वह कमजोर हो सकता था। इस समय देश के नेता का एक ही लक्ष्य हो सकता है, किसी तरह कोरोना के प्रकोप से बाहर निकालना। इस भूमिका पर ईमानदारी से केन्द्रित रहने की परिपक्वता की परख इसी में थी कि तबलीगी के कारनामों से हुए नुकसान की भरपाई की तो पूरी व्यवस्था अंदर से करें, पर उसकी चर्चा किए बगैर लोगों के अंदर कायम अनुशासन, धैर्य और एकजुटता को सुदृढ़ करें। यह विश्वास दिलाएं कि केन्द्र एवं राज्यों की सारी सरकारेें एकजुट होकर आपकी रक्षा में प्राणपण से लगी हैं, आप सतर्क रहें, लेकिन भटकाव नहीं आए। आप लॉकडाउन दो के संबोधन को गहराई से देखेंगे तो मोदी एक राजनेता की तरह सामने आते हैं। एक दिन के लिए नौ मिनट का दीप प्रज्वलन का कार्यक्रम पैदा हुई नकारात्मकता एवं निराशा को दूर करने में निश्चित रुप से सहायक हुआ है। विपक्ष के कई मुख्यमंत्रियों को हमने निर्धारित समय पर दीप प्रज्वलित करते देखा। अपने सभी भाषणों में मोदी ने गरीबों, दैनिक मजदूरों, बेसहारों, वृद्धों के प्रति संवदेनशीलता जगाकर हर एक सक्षम परिवार से इनका ध्यान रखने, भोजन करवाने, आम आवश्यकता की सामग्रियां मुहैया कराने की अपील की उसका असर साफ देखा जा सकता है। भारत जैसे देश में इस श्रेणी के लोगों की संख्या काफी है। लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए सरकारों के अलावा संगठन, संस्थाएं, राजनीतिक पार्टियां, धर्म संस्थाएं, नागरिक समूहों के साथ निजी स्तर पर कुछ लोगों का समूह बनाकर जितना संभव है लोग लॉकडाउन से प्रभावित उन तबकोें तक अपने संसाधन के अनुसार पहुंच रहे हैं।

मनुष्य कोई भी हो, कितना भी उंचा उठ जाए, उसमें कुछ कमियां होंगी, उसकी व्यवस्थाएं भी पूर्णतया दोषरहित नहीं हो सकतीं। मोदी हों या अमित शाह या उनके अन्य साथी मंत्री या पार्टी के पदाधिकारी इसके अपवाद नहीं हो सकते, लेकिन संकट के समय आप कैसे अपने दोषों को नियंत्रित कर, अपनी उभरती भावनाओं को काबू में रखकर इसका सामना करने तथा विजय भाव से स्वयं काम करते हैं, मानव सहित जितने संसाधन आपके पास हैं उनका अधिकतम श्रेष्ठ उपयोग कर पाते हैं तथा ये सब करते हुए किस तरह देशवासियों का साथ बनाए रखते हैं यह मुख्य बात है। यह सच है कि मोदी ने स्वयं आगे बढ़कर मोर्चा संभाला है। इसे ही अंग्रेजी मंें लिडिंग फ्रॉम द फ्रंट कहते हैं। वह साधारण साहस एवं जोखिम का कार्य नहीं है। स्वास्थ्य राज्यों का विषय है। राज्य काम कर रहे हैं। किंतु कोरोना से संघर्ष की पूरी जिम्मेवारी केन्द्र ने कंधों पर उठा रखी है। किस राज्य को कब क्या आवश्यकता है, कितनी जल्दी पूर्ति की जा सकती है, एक पूरा तंत्र आपात स्थिति में प्रधानमंत्री की मौनिटरिंग में काम कर रहा है। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन स्वयं 24 घंटे टीम के साथ एक-एक राज्य, सभी प्रमुख अस्पतालों, स्वास्थ्य मंत्रालय सहित इसके अतिरिक्त विज्ञान के क्षेत्र में सक्रिय शोध संस्थानों, रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन, स्वास्थ्य संघों, अन्य वो संस्थाएं, जो कोरोना को ध्यान में रखकर कुछ सामग्रियों का निर्माण कर रहीं हैं या किट आदि विकसित कर रहीं हैं सबके साथ समन्वय बनाकर काम कर रहे हैं।

इन कामों का असर है। जब कोरोना संकट आया तो हमारे पास टेस्ट के लिए एक लैब थी। आज 177 से ज्यादा सरकारी तथा 67 से ज्यादा निजी लैब टेस्ट कर रहे हैं या तैयार हैं। पीपीई और वेंटिलेटर तक का निर्माण हमारे यहां तेजी से बढ़ रहा है। रेलवे तक इसका निर्माण कर रहा है। केवल कोविड 19 के लिए 602 विशिष्ट अस्पताल विकसित किए जा चुके हैं। इन सबके साथ मोदी ने जिस तरह सार्क और जी 20 के सम्मेलन आयोजित करने तथा उनको ठोस परिणाम तक पहुंचाने में भूमिका निभाई उससे भारत की छवि निखरी है। जी 20 की बैठक हो चुकी है और यह भारत ही है जिसकी पहल पर अब धीरे-धीरे सहयोग विकसित हो रहा है। मोदी ने अपने देश में युवा वैज्ञानिकों से सीमित संसाधनों में भी वैक्सिन विकसित करने की अपील की तो उसका लक्ष्य भी विश्व मानवता की सेवा बताया। हमारे देश में राजनीतिक विरोधी चाहे जो कहें लेकिन आज भारत सरकार के साहसपूर्ण निर्णयों, रोकथाम, बचाव, उपचार एवं गरीबों के राहत की व्यवस्था की विश्व समुदाय प्रशंसा कर रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने प्रशंसा की, संयुक्त राष्ट्र ने प्रशंसा की, प्रमुख देश प्रशंसा कर रहे हैं। जिन देशों तक हमारी मदद और सहयोग पहुंच रहे हैं वे तो खैर अनुगृहित है हीं। निश्चित रुप से इन सबका परिणाम भारत के भविष्य के लिए बेहतर होगा।

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