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आखिर कब बंद होंगे, सुरक्षाबलों पर हमले

देश की आंतरिक सुरक्षा की देखभाल में लगे जवानों का इस तरह मारा जाना निश्चित रूप से बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।

आखिर कब बंद होंगे, सुरक्षाबलों पर हमले
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छत्तीसगढ़ के सुकमा में सोमवार को हुआ नक्सली हमला एक बार फिर हमारी चेतना को झकझोर गया, जिसमें दो दर्जन से अधिक केंद्रीय रिजर्व सुरक्षा बल (सीआरपीएफ) के जवानों को अपने बहुमूल्य प्राणों से हाथ धोना पड़ा है।

नक्सली हिंसा की दृष्टि से बेहद संवेदनशील समझे जाने वाले इस क्षेत्र में पहले भी हिंसक घटनाएं होती रही हैं। सात साल पहले इसी स्थान पर हुए हमले में 76 जवानों की जान चली गई थी।

जिस तरह अब सरकार सख्त कदम उठाने की बात कर रही है, वैसे ही दावे उस समय भी किए गए थे, परंतु छत्तीसगढ़ में नक्सली हमले रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं।

पिछले महीने 11 मार्च को ही सुकमा के दुर्गम भेज्जी इलाके में गश्त पर निकले 11 सीआरपीएफ जवान नक्सलियों द्वारा किए गए धमाके में शहीद हो गए थे।

इससे पहले 11 मार्च 2014 को नक्सलियों ने टाहकवाड़ा में सीआरपीएफ की टीम पर हमला किया था, जिसमें 16 जवान शहीद हो गए थे। सितंबर 2005 में नक्सलियों ने बीजापुर स्थित गंगालूर रोड पर वाहन के विस्फोट किया था, जिसमें 23 जवान शहीद हुए थे।

जुलाई 2007 में एर्राबोर अंतर्गत उरपलमेटा में भी 23 सुरक्षाकर्मी मारे गए। अगस्त 2007 में तारमेटला में मुठभेड़ में थानेदार सहित 12 जवान शहीद हुए थे। 12 जुलाई 2009 को राजनांदगांव के हमले में 29 जवान हुए थे।

इसी प्रकार 6 अप्रैल 2010 को दंतेवाड़ा ताड़मेटला में सीआरपीएफ के 76 जवान शहीद हुए थे। 1 दिसंबर 2014 को सुकमा में ही नक्सलियों ने सीआरपीएफ की 233 बटालियन पर हमला किया था, जिसमें 13 जवान शहीद हुए थे।

इन घटनाओं से साफ है कि सरकार भले ही जो दावे करे, नक्सली हिंसा पर अंकुश लगाने में वह नाकाम सिद्ध हुई है। यह बेहद अफसोस की बात है कि हर बार वो सुरक्षाबलों के जवान मारे जाते हैं जो वहां विकास कार्यों की देखभाल और शांति बनाए रखने के लिए तैनात किए जाते हैं।

जो सूचना मिल रही है, वह बहुत चौंकाने वाली है। 90 के करीब सीआरपीएफ जवान वहां बन रही सड़क की देखरेख के लिए तैनात थे और सुबह गश्त पर निकले थे। आस-पास ही कहीं नक्सली घात लगाए बैठे थे।

पहले उन्होंने ग्रामीणों को रेकी के लिए भेजा। जैसे ही सुरक्षाकर्मियों की सही स्थिति की जानकारी मिली, उन्होंने हमला बोल दिया। नक्सलियों की तादाद तीन सौ के करीब बताई जा रही है, जिनमें महिलाएं भी शामिल थी।

चौंकाने वाला तथ्य यह है कि जब हेलीकाप्टर और दूसरे माध्यमों से घायल जवानों को वहां से निकालने की कोशिश की गई, तब फिर से नक्सलियों ने हमला किया। इससे दो बातें जाहिर होती हैं। पहली यह कि उन्हें सुरक्षाबलों की तरफ से जवाबी कार्रवाई का कतई खौफ नहीं था। दूसरे, उन्हें इसकी भनक थी कि उस इलाके में उस समय सीआरपीएफ अथवा पुलिसकर्मियों की संख्या सीमित है।

खासकर संवेदनशील इलाकों में कई तरह की चौकसी और एेहतियात बरतने की हिदायतें सुरक्षाबलों को दी जाती हैं। इस सबके बावजूद यदि सबसे अच्छे सुरक्षाबलों में गिनी जाने वाली सीआरपीएफ पर एक के बाद एक लगातार हमले हो रहे हैं, तब यब सोचना होगा कि गड़बड़ी कहां हो रही है। कमी कहां है और उस दिशा में गंभीरता से कदम क्यों नहीं उठाए जा रहे हैं।

सभी अवगत हैं कि नक्सली हिंसा देश के सुरक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा बनी हुई है। छत्तीसगढ़ ही नहीं, झारखंड, बिहार, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के कुछ इलाके, तेलंगाना और महाराष्ट्र के कुछ क्षेत्रों में रह रहकर इस तरह के हमले होते रहे हैं, परंतु पिछले कुछ समय में यह महसूस किया जा रहा था कि इनकी संख्या में कमी आई है।

आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, ओडिशा, झारखंड, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र सरकारों ने कुछ कदम भी उठाए हैं, परंतु अक्सर देखा जाता है कि जब भी नक्सलियों को लेकर सरकारें और सुरक्षा व खुफिया एजेंसियां सुस्त होती हैं, तभी उनकी तरफ से इस तरह की बड़ी वारदात कर दी जाती है।

देश की आंतरिक सुरक्षा की देखभाल में लगे जवानों का इस तरह मारा जाना निश्चित रूप से बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। राज्य ही नहीं, केंद्र को भी कुछ ऐसे कदम उठाने होंगे कि इस तरह की दर्दनाक वारदातों की पुनरावृत्ति नहीं हो सके।

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