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अटल बिहारी वाजपेयी का पुनर्जन्म

भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी अब हमारे बीच नहीं हैं, यह सुनना और स्वीकार करना इतना सहज और सरल नहीं है। कम से कम तीन पीढ़ियां उन्हें सुनते हुए, देखते हुए और उनके दिखाए रास्ते का अनुसरण करते हुए बड़ी हुई हैं। वह ऐसे युग पुरुष थे, जिनके साथ राजनीति के एक गौरवशाली युग का भी लगता है पटाक्षेप हो गया है।

अटल बिहारी वाजपेयी का पुनर्जन्म

भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी अब हमारे बीच नहीं हैं, यह सुनना और स्वीकार करना इतना सहज और सरल नहीं है। कम से कम तीन पीढ़ियां उन्हें सुनते हुए, देखते हुए और उनके दिखाए रास्ते का अनुसरण करते हुए बड़ी हुई हैं। वह ऐसे युग पुरुष थे, जिनके साथ राजनीति के एक गौरवशाली युग का भी लगता है पटाक्षेप हो गया है।

संघ और भाजपा के तो वह अपने थे ही, उनके विरोधी भी उनका उतना ही आदर और सम्मान करते थे। वह सीमाओं के पार पड़ोसी देशों में भी उतने ही लोकप्रिय और स्वीकार्य थे, जितने भारत में। संयुक्त राष्ट्र संघ में जब पहली बार उन्होंने हिंदी भाषा में उद्बोधन किया, तब वहां मौजूद राष्ट्र प्रमुख ही नहीं, पूरी दुनिया चौंकी थी।

वह अटल ही थे, जो पाकिस्तान से रिश्ते सुधारने के लिए बस से लाहौर गए। इसके कुछ ही समय बाद कारगिल में घुसपैठ कराकर वहां के सेना प्रमुख जनरल परवेज मुशर्रफ ने अपने प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को तो शर्मिंदा किया ही, भारत की पीठ में भी खंजर घोंपने का काम किया परंतु अटल बिहारी वाजपेयी ऐसी शख्सियत थे,

जिन्होंने अमन के प्रति प्रतिबद्धता दिखाते हुए जनरल मुशर्रफ को आगरा शिखर वार्ता के लिए बुलाकर एक और मौका उपलब्ध कराया। संभवतः वाजपेयी की इसी दरियादिली के वह कायल हो गए थे और बाद में जब वह राष्ट्रपति नहीं रहे तो नई दिल्ली यात्रा के दौरान उन्होंने अस्वस्थ अटल जी के दर्शन करने की इच्छा जाहिर की, परंतु ऐसा हो नहीं सका।

कश्मीर पर उनकी जम्हूरियत, इंसानियत और कश्मीरियत नीति की आज भी सराहना होती है। जिस समय वह प्रधानमंत्री थे, चार बड़ी घटनाएं घटीं। कोई और प्रधानमंत्री होता तो शायद विचलित हो गया होता परंतु अटल बिहारी वाजपेयी ने उनका खामोशी से सामना किया और बड़ी संजीदगी के साथ उबरने में सफल रहे। कारगिल की घुसपैठ के बाद पाक से युद्ध।

नेपाल से दिल्ली आ रहे यात्री विमान का अपहरण, जिसे कंधार ले जाया गया और कुछ कुख्यात आतंकियों की रिहाई के बाद ही छोड़ा गया। संसद पर आतंकवादी हमला और चौथी घटना थी पोखरण में परमाणु बम का परीक्षण, जिसके बाद अमेरिका ने कई तरह की पाबंदियां भारत पर थोप दी परंतु अटल जी किंचित मात्र विचलित नहीं हुए।

भारत न केवल उस झटके से उबरा बल्कि पूरी दुनिया में उसकी एक परमाणु शक्ति संपन्न देश की ऐसी प्रतिष्ठा बनी कि जो पड़ोसी पहले आंखें तरेरते रहते थे, वह भीगी बिल्ली बन गए। परमाणु विस्फोट ने भारतीय सेना को बहुत बड़ा संबल प्रदान किया। वह कई कार्यों के लिए स्मरण किए जाएंगे। देश में नेशनल हाइवे का जाल उनके समय बिछना शुरू हुआ।

उन्होंने ही स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना की परिकल्पना को जमीन पर उतारा था। भारत को परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र का गौरव उन्होंने दिलाया। कारगिल युद्ध जीता। पाक से वार्ता की पहल उन्होंने की। सौ साल पुराने कावेरी जल विवाद को सुलझाने में अहम भूमिका अदा की। उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा समिति, आर्थिक सलाह समिति, व्यापार एवं उद्योग समिति गठित कीं।

ग्रामीण क्षेत्रों को सड़कों से जोड़ने का अहम कार्य शुरू किया। विद्युतीकरण तेज किया। राजनीति में शुचिता का संकल्प व्यक्त किया, क्योंकि जब 1998-99 में उनकी सरकार को एक मत से गिराया गया, तब उनके पास भी जोड़-तोड़ का विकल्प मौजूद था परंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया। वह देश के उन चुनींदा बेहद सम्मानित राजनेताओं में से रहे, जिनकी लोकप्रियता का अंदाजा लगाना कठिन है।

जिस तरह डा. एपीजे अब्दुल कलाम के असामयिक निधन पर पूरा राष्ट्र शोकाकुल हो गया था, वैसा ही मंजर इस समय भी है। हर किसी को लग रहा है कि उनका अपना करीबी कोई हाथ छुड़ाकर चला गया है।

वह जितने कुशल कवि, पत्रकार, लेखक और संवेदनशील इंसान थे, उतने ही बेहतरीन प्रधानमंत्री भी सिद्ध हुए। अटल जी का जाना राष्ट्रीय राजनीति की बहुत बड़ी क्षति है, जिसकी पूर्ति संभव ही नहीं है। यही कहा जा सकता है कि हो सके तो अटल जी एक बार फिर भारत में जन्म लेना।

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