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पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव के नतीजे तय करेंगे 2019 की राह, ऐसा है पूरा समीकरण

पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों की तारीखों के ऐलान के साथ ही लोकसभा के साथ बारह राज्यों के विधानसभा चुनाव कराने की अटकलों पर विराम लग गया है। कुछ महीनों से ‘एक देश एक चुनाव’ पर बहस चल रही थी। कयास लगाए जा रहे थे कि आम चुनाव से छह माह आगे-पीछे होने वाले विधानसभा चुनावों को एकसाथ कराए जा सकते हैं।

पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव के नतीजे तय करेंगे 2019 की राह, ऐसा है पूरा समीकरण
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पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों की तारीखों के ऐलान के साथ ही लोकसभा के साथ बारह राज्यों के विधानसभा चुनाव कराने की अटकलों पर विराम लग गया है। कुछ महीनों से ‘एक देश एक चुनाव’ पर बहस चल रही थी। कयास लगाए जा रहे थे कि आम चुनाव से छह माह आगे-पीछे होने वाले विधानसभा चुनावों को एकसाथ कराए जा सकते हैं।

दरअसल देश इस वक्त अत्यधिक चुनावों के दौर से गुजर रहा है। इसके चलते देश में राजनीतिक कटुता बढ़ रही है। इसलिए एक देश एक चुनाव का आइडिया सामने आया। इसमें लोकसभा के साथ 12- 13 राज्य आ जाते। 2018 के आखिर में मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, मिजोरम के विस चुनाव के बाद लोकसभा के साथ तीन राज्यों- तेलंगाना, ओडिशा व आंध्र प्रदेश व 2019 के आखिर में हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड, अरुणाचल प्रदेश व सिक्किम में चुनाव होने हैं।

जम्मू-कश्मीर में भी राज्यपाल शासन है, जहां छह माह से साल भर में चुनाव कराए जाने हैं। ये सभी चुनाव एकसाथ हो सकते थे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, मिजोरम व तेलंगाना में विस चुनाव की तारीखों का ऐलान कर दिया गया। अप्रैल-मई में लोकसभा चुनाव प्रस्तावित है। इसलिए करीब छह माह पहले आने वाले इन पांच राज्यों के नतीजे देश के मूड को बताएंगे।

इन राज्यों में 83 लोकसभा सीट हैं, जिनमें 60 भाजपा के खाते में हैं। इनमें से राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार है। तेलंगाना में टीआरएस और मिजोरम में कांग्रेस की सरकार है। इन चुनावों में जहां भाजपा की प्रतिष्ठा दांव पर है और वह अपने अजेय रहने रहने के सिलसिले को जारी रखना चाहेगी, वहीं कांग्रेस के लिए अस्तित्व दांव पर है।

अब तक अधिकांश चुनावों में कामयाब नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी के लिए भी यह चुनाव किसी लिटमस टेस्ट से कम नहीं है। तीन राज्यों में एंटी-इन्कंबेंसी के हालात में विजय दिलाना आसान नहीं है। अब तक जो चुनावी सर्वे आए हैं, उसमें भाजपा की स्थिति कमजोर बताई जा रही है। कांग्रेस के अध्यक्ष बनने के बाद राहुल गांधी के लिए यह बड़ा मौका है।

कर्नाटक में सत्ता गंवाने के बाद गठबंधन बचाने में सफल रहने वाली कांग्रेस के लिए राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में वापसी के सुनहरे मौके हैं, लेकिन राहुल गांधी के नेतृत्व पर कांग्रेस के अंदर और सहयोगी दलों के बीच जिस तरह के सवाल उठ रहे हैं, उसके जवाब इन चुनावों के नतीजे देंगे। अभी ले-देकर कर्नाटक, पंजाब, मिजोरम व पुडुचेरी में कांग्रेस की सरकार है।

लोकसभा में 44 सीटों पर सिमटी हुई है। अगर इन चुनावों में कांग्रेस की जीत होगी तो उसे लोकसभा के लिए संजीवनी मिलेगी। 2019 में पीएम बनने का सपना देखने वाले राहुल गांधी के लिए सत्ता का रास्ता इन्हीं विस चुनावों से निकलेगा। अगर भाजपा की जीत होगी तो वह 2019 में सफलता के लिए आश्वस्त रहेगी। मोदी-शाह की जोड़ी का तोड़ ढूंढ़ना विपक्ष के लिए कठिन होगा।

हालांकि हाल के चुनावों में देखने को मिला है कि विधानसभा व लोकसभा के एजेंडे अलग रहे हैं। सरकार चाहती तो वह एक देश एक चुनावों की ओर कदम बढ़ा सकती थी, चुनाव आयोग को हिम्मत करना चाहिए था।

ये विस चुनाव 2019 से पहले आवाम के मूड के संकेत जरूर देंगे। भाजपा-कांग्रेस को अपनी रणनीति तय करने के अवसर भी देंगे। हाल के समय से ईवीएम पर सवाल उठे हैं। इसलिए ये विधानसभा चुनाव वीवीपैट ईवीएम की प्रमाणिकता को भी साबित करेंगे।

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