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रोमांसीय चुनावी काल संवाद: लोकतंत्र के मंच पर जनता बनी लैला, शीरी और हीर

रोमांसीय चुनावीय काल चल रहा है। लोकतंत्र के मंच पर जनता लैला है, शीरी है, हीर बनी हुई है। मजनूं, फरहाद, रांझा रूपी चुनावीय नायक की आंखों में आंसू हैं। वो अत्यंत प्रेम से जनता को निहार रहा है। ‘मैं तुम्हें बहुत चाहने लगा हूं, जब से चुनावीय बयार बहनी शुरू हुई है, मेरा मन मचलने लगा है।’

रोमांसीय चुनावी काल संवाद: लोकतंत्र के मंच पर जनता बनी लैला, शीरी और हीर

रोमांसीय चुनावीय काल चल रहा है। लोकतंत्र के मंच पर जनता लैला है, शीरी है, हीर बनी हुई है। मजनूं, फरहाद, रांझा रूपी चुनावीय नायक की आंखों में आंसू हैं। वो अत्यंत प्रेम से जनता को निहार रहा है। ‘मैं तुम्हें बहुत चाहने लगा हूं, जब से चुनावीय बयार बहनी शुरू हुई है, मेरा मन मचलने लगा है।’

वो नाराज थी, दूसरी ओर देखने लगी, ‘चलो जाओ, झूठे कहीं के। पांच साल से कह रहे हो, हम प्यार के पंछियों के अच्छे दिन आएंगे। हमारा जीवन विकास की किलकारियों से खिल उठेगा। अब कहां है विकास, अभी तक तो उसका जन्म ही नहीं हुआ। तुम तो कह रहे थे कि पांच साल में विकास दौड़ने लग जाएगा।’

‘देखो, हर बात में समय लगता है, अभी मुझे समय ही कितना सा मिला है। अभी तो हमारे-तुम्हारे प्यार का कमल ही कहां खिल पाया है। तुम मुझे एक बार फिर मौका तो दो, सच में तुम्हारी दुनिया ही बदल दूंगा। ‘चल झूठे, आजकल तुम्हारे किस्से कहानियां ज्यादा ही सुन रही हूं। लोग तुम्हारे बारे में तरह-तरह की बातें कर रहे हैं। अब तो परदेसी भी बोलने लगे हैं।’

उस राजनीतिक प्रेमी को गुस्सा आ गया, तुम जरूर हाथ वाले के चक्कर में आ रही हो। तुम्हें कोई जरूरत नहीं है। उसकी तरफ देखने की। तुम सिर्फ मेरी बनकर रहो। हमारे विकास के भविष्य का सवाल है’ जनता भी बौरा गई। ‘देखो, तुम मुझ पर मत चिल्लाओ। कोई तुम अकेले नहीं हो। मुझे चाहने वालों की लाइन लगी हुई है।

एक तो बस दिन-रात खून से भरे खत लिखता रहता है। वो मेरे प्यार में इतना अंधा हो गया है कि मुझसे गठबंधन करने के लिए महागठबंधन के हाथ-पांव जोड़ रहा है। बस किसी भी तरह अपना बना लेना चाहता है। अब तो राजनीतिक प्रेमी का गुस्सा थोड़ा ठंडा पड़ गया। ‘देखो, ये तुम्हारे हमारे अटूट प्यार से जलते हैं।

बस यही बात समझने की जरूरत है। तुम्हें हमारे अजन्मे विकास की कसम, जिस दिन तुम मेरे रकीब के साथ चली गई, ये आपस में लड़कर ही मर जाएंगे। सारे मजनूं, इस लैला को घेरे हुए हैं। वो हमेशा की तरह उधेड़बुन में है। क्या करे, क्या न करे।

बड़ असमंजय की स्िथति है कि किसका प्रणय निवेदन स्वीकार करे और किसे ठुकराए। रोमांसीय चुनावीय काल चल रहा है। वो जानती है लोकतंत्रीय जन्नत की हकीकत, लेकिन करे भी तो क्या करे। थोड़ा मन की बातों से बहक ही जाती है। मुए इतना प्यार करते हैं, अब वो भी क्या करे।

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