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एशियाई शेर-विश्व पटल पर भारत की पहचान

प्राचीन भारतीय काल इतिहास में एशियाई शेर इंडो -गंगाटिक प्लेन में सिन्ध से लेकर पश्चिम में बिहार तक पाए जाते थे। अगर प्राचीन भारतीय इतिहास के साहित्य, पेंटिंग और राजस्व रिकॉर्ड का अवलोकन किया जाए तो मौर्य काल, गुप्ताकाल ओर मुग़लकालीन सल्तनत के शुरुआती काल में एशियाई शेर को रॉयल एनिमल माना जाता था।

एशियाई शेर-विश्व पटल पर भारत की पहचान
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विश्व भर में लॉयन (शेर) के सरंक्षण और जागरुकता बढ़ाने के लिए विश्व लॉयन दिवस हर वर्ष 10 अगस्त को मनाया जाता है। शेर एक विशालकाय, सर्व-परिचित तथा सर्वाधिक चमत्कारी प्राणी है। शेर भारत में रहने वाली पाँच पंथेरायन कैट्स में से एक है जिसमें बंगाल टाइगर, भारतीय तेंदुआ,हिम तेंदुए भी सम्मिलित है।

प्राचीन भारतीय काल इतिहास में एशियाई शेर इंडो -गंगाटिक प्लेन में सिन्ध से लेकर पश्चिम में बिहार तक पाए जाते थे। अगर प्राचीन भारतीय इतिहास के साहित्य, पेंटिंग और राजस्व रिकॉर्ड का अवलोकन किया जाए तो मौर्य काल, गुप्ताकाल ओर मुग़लकालीन सल्तनत के शुरुआती काल में एशियाई शेर को रॉयल एनिमल माना जाता था। परंतु मुगलकालीन पीरियड से लेकर ब्रिटिश काल तक इनका व्यापक स्तर पर शिकार किया गया जिसके फलस्वरूप ये भारत के अधिकतर क्षेत्रों से लुप्त हो गए थे।

एशियाई शेर के बारे में रोचक तथ्य

शेर सामान्यतः रात को ओर सुबह के जल्दी समय में अपना शिकार करता है। सामान्यतया शेर 2-4 दिन में शिकार करता है परंतु यह एक सप्ताह तक भी बिना शिकार के रह सकता है। शेर सामान्यतः अपने प्राकृतिक आवास में चीतल, नीलगाय सांभर और जंगली सुअर का शिकार करना पसंद करता। एशियाई शेर2-2.5 मीटर लंबाऔर इसका वज़न 115-200 किलोग्राम होता है और यह छोटी दूरी में 65 km/h की गति से अपने शिकार का पीछा कर सकता है।

शेर ओर जंगल के अन्य जानवरो में एक बेहद ख़ास विभिन्नता है शेर केवल तभी शिकार करता है जब वह भूखा होता है यह कभी भी एक्सेस किलिंग में विश्वास नहीं करता है। दिन के समय यह जल स्रोत के पास घास में छिपकर बैठा रहता है और जैसे ही शिकार पानी पिने आता है तो उस पर आक्रमण कर देता है।

शेर एक सामाजिक प्राणी है यह शिकार करना,प्रकर्तिक आवास रहना और अपने छोटे बच्चों की रक्षा एक समूह में रहकर करते हैं। इनके समूह को प्राइड(Pride) कहा जाता है। समूह के सभी सदस्यों को विभिन्न प्रकार के ड्यूटी दी हुई होती है।प्राइड कि साइज़ टेरिटरी, जल स्रोत की उपलब्धता, उचित संख्या में शिकार के होने जैसे विभिन्न घटकों पर निर्भर करती है। एक प्राइड में 1-2 डोमिनेंट नर,4-5 जवान मादाएँ और कुछ बच्चे होते हैं। एक समूह दूसरे समूह से अपने टेरिटरी की रक्षा करता है।जब कोई सब एडल्ट 3-4 साल का हो जाता है तो उसे ज़बरदस्ती ग्रुप से बाहर कर दिया जाता है वह कोई अन्य जगह जाकर वह अपनी नई टेरिटरी खोजता है।

एशियाटिक शेर बनाम अफ़्रीकन शेर

1- आकार-एशियाटिक शेरों का आकार अफ़्रीकन शेर से छोटा लगता है

2- त्वचा की परत एशियाटिक शेर की सबसे विशिष्ट विशेषता त्वचा के एक लंबवत परत होती है जो इसके पेट के साथ साथ विकसित होती है यह लक्षण केवल एशियाई शेरो में पाया जाता है अफ्रीकन में नहीं।

एशियाई शेरों का झुंड आफ्रिकन शेरो की तुलना में छोटा होता है।

गिर राष्ट्रीय उधान और एशियाई शेर

भारत में इसकी जनसंख्या गुजरात के पाँच संरक्षित क्षेत्रों तक ही सीमित है-ये हैं गिर राष्ट्रीय उधान, गिर अभयारण्य, पनिया अभ्यारण्य, मिटिया अभयारण्य और गिरनार अभयारण्य।

गिर अभयारण्य में मलधारी जनजातिके लोग रहते हैं। मलधारी जनजाति के लोग ओर एशियाई शेर सदियों से साथ साथ रहते आए हैं और यह जनजाति शेरो को अपने लिए ख़तरा नहीं मानते हैं।

मलधारी जनजाति के लोग बफ़लो की जाफराबादी ब्रीड ओर गाय की गिर ब्रीड को पालते हैं। इस क्षेत्र में पशुपालन डेयरी प्रोडक्ट के लिए किया जाता है न कि मीट को कंज़्यूमर करने के लिए। समय के साथ काफ़ी ज़्यादा कैटल बूढ़े और कमज़ोर पड़ जाते हैं जिनकी प्राकृतिक मृत्यु दर काफी ज्यादा होने का चांस रहता है। इससे संबंधित रोचक तथ्य है कि मलधारी जनजाति के लोग चराई के समय है अपने पशुओं को समूह को इस तरह व्यवस्थित करते हैं की अनप्रॉडक्टिव पशु समूह में आगे और पीछे रहते हैं जबकि प्रॉडक्टिव पशु बीच में रहते हैं। एशियाई शेरों के लिए यह अरेंजमेंट उनके शिकार के लिए सबसे उचित रहता है ।

एशियाई शेरों के संरक्षण में चुनौतियां

एशियाई शेर को वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 के अनुसूची-1 ओर इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर में इसे लुप्त प्राय श्रेणी में सूचीबद्ध किया गया है।

एशियाई शेरों का साम्राज्य संरक्षित क्षेत्रों से बाहर विस्तृत हो रहा है जिसके फलस्वरूप बाहर के बफर एरिया मेंपालतू जानवरों का शिकार बढ़ता जा रहा है। वन्य जीवों के प्राकृतिक पर्यावास से बाहर जाने पर पशुधन और फसल हानि होने पर वन्यजीव और मानव के बीच संघर्ष की संभावना बढ़ती है।यह सब एशियाई शेरों की बढ़ती संख्या और घटती टेरिटरी के कारण है।

शहरीकरण और बढ़ती जनसंख्या, मानव द्वारा कृषि और बाग़वानी भूमि के विकास के लिए संरक्षित वनों का अतिक्रमण (भूमि उपयोग में परिवर्तन), बदलती कृषि पद्धतियां, पर्यावरण का विखंडन और संकुचन व एशियाई शेरों के आवास को लेकर मलधारी जनजाति के युवाओं का नकारात्मक रवैया इस प्रजाति के सरंक्षण के सामने बड़ी चुनौतियां प्रस्तुत कर रहा है। इसके साथ साथ अनवॉन्टेड जंगली घास और इन्वेसिव एलीयन स्पीसीज गिर राष्ट्रीय उधान मैनेजमेंट के समक्ष प्रमुख चुनौतियां प्रस्तुत कर रहा है।

हाल ही में कैनाइन डिस्टेंपर वायरस और किलनी वाहित बेबसीयोसीस बीमारी के कारण संक्षिप्त अवधि में काफ़ी शेरों की मृत्यु हो गई जो कि इनके संरक्षण के सामने एक चुनौती प्रस्तुत करता है। देश में शेरों की स्थिर और व्यवहारीये आबादी सुनिश्चित करने के लिए पर्यावरण वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा एशियाई शेयर सरंक्षण परियोजना भी प्रारंभ की गई है।

एशियाई शेरों के सरंक्षण को बढ़ावा देने के लिए और बच्चों में इस अद्भुभुत वन्यप्राणी के प्रति उत्सुकता बढ़ाने के लिए छात्र और छात्राओं का नियमित समय अंतराल पर प्राकृतिक शिक्षा शिविर का आयोजन करके इन राष्ट्रीय उधान का भ्रमण करवाया जाए । आइए हम सब मिलकर प्रकृति के इस अमूल्य धरोहर को आने वाली पीढ़ियों को सुपुर्द करने में क़ामयाब हो।याद रखिए कि यह हमारी पीढ़ी की ज़िम्मेदारी है की आने वाली पीढियां वन्य जीवों का सम्मान करें और वनों की शांति बनाए रखें। एशियाई शेर को बचाने के लिए दीर्घकालीन सरंक्षक उपाय जन सहयोग से ही संभव है। एशियाई शेर की आबादी का वैज्ञानिक प्रबंधन, रोग नियंत्रण और पशु चिकित्सीय देखभाल, क्षेत्र विशेष संघर्ष समन योजनाएं, सहायक भूमि उपयोग पद्धतियों को तैयार करना, व्यापक स्तर पर शिक्षा और जागरूकता कार्यक्रम चलवाना एशियाई शेर के सरंक्षण में व्यापक भूमिका निभा सकता है।

लेखक

डॉक्टर सुनील कुमार (भारतीय वन सेवा, हरियाणा कैडर)

यदु भारद्वाज (भारतीय वन सेवा, गुजरात कैडर)

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