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अवधेश कुमार का लेख : अरविंद और उद्धव विफल

महाराष्ट्र और दिल्ली सरकार ने अपने कुप्रबंधन और कुटिल नीति के कारण लोगों को जोखिम में डाल दिया है। अगर पूरा प्रयत्न करते और विफल हो जाते तो इनको क्षमा किया जा सकता था, किंतु इन्होंने अपनी अक्षमता, अयोग्यता और बेईमानी से ऐसी भयावह स्थिति पैदा की है। हमारे संविधान में महामारी के आधार पर राष्ट्रपति शासन लागू करने का प्रावधान नहीं है, लेकिन ऐसे ही चलता रहा तो महाराष्ट्र और दिल्ली दोनों संक्रमितों और मृतकों का रिकॉड बना देंगे।

अवधेश कुमार का लेख : अरविंद और उद्धव विफल
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अवधेश कुमार

अगर आप केवल सरकारों के वक्तव्यों पर विश्वास करने तक सीमित हैं तो निष्कर्ष यह आएगा कि कोविड-19 मरीज इस समय पूरे स्वास्थ्य महकमे की प्राथमिकता है और उनका श्रेष्ठ इलाज चल रहा होगा। दिल्ली देश की राजधानी है और मुंबई को अर्थव्यवस्था की राजनीति मानी जाती है। जाहिर है, यहां श्रेष्ठतम प्रबंधन एवं इलाज उपलब्ध होना चाहिए। किंतु आप किसी सरकारी, निजी अस्पताल या कोविड-19 के लिए बनाए गए केंद्रों पर चले जाएं, घरों में कोरंटाइन किए गए मरीजों से संपर्क करें तो आपकी गलतफहमी दूर हो जाएगी। आप केवल यही कहेंगे कि इन दोनांे राज्यों की सरकारें पूरी दुनिया से झूठ बोलने का अपराध कर रही है और कोविड 19 के संक्रमित केवल भगवान भरोसे हैं। अभी मुंबई की एक खबर चल रही है जिसमें एक मरीज को लक्षण होने पर वीएन देसाई अस्पताल ले जाया गया। वहां छाती का एक्सरे हुआ और निमोनिया बताते हुए कूपर अस्पताल भेज दिया गया। दो दिनों बाद कोविड-19 पॉजिटिव रिपोर्ट आई। मरीज के परिजन शाम 6 बजे से हेल्पलाइन नंबर पर फोन करते रहे। रात 12.30 बजे एम्बुलेंस आई और मरीज को लेकर गुरुनानक अस्पातल गए। वहां बताया गया कि मरीज को आईसीयू की जरुरत है और सेवेन हिल्स अस्पताल ले जाएं। सेवन हिल्स में घंटों प्रतीक्षा के बाद बेड तो नहीं ही मिला। लोगों ने कुछ नेताओं को फोन किया तो 18 घंटे बाद बेड मिला। तब तक देर हो चुकी थी। रात 12 बजे मरीज की मृत्यु हो गई है।

ठीक यही स्थिति दिल्ली की है। आपके यहां किसी को लक्षण दिखे तो हेल्पलाइन नंबर पर फोन करके देखिए, सामान्य तौर पर मदद नहीं मिलेगी। घंटों बाद कोई कहेगा कि आपके यहां स्वास्थ्यकर्मी आएंगे। मंडावली में मनोरंजन सिंह की रिपोर्ट कोविड 19 पोजिटिव आई। उन्होंने जितने नंबर उपलब्ध थे सब पर फोन किया। कोई रिस्पांस नहीं। फिर कोई स्वास्थ्यकर्मी आया जिसने एक व्यक्ति को बाहर से ही फार्म देने के लिए कहकर भेजा जिस पर उन्हें इस वचन पर हस्ताक्षर करने थे कि हम घर में कोरंटाइन रहेंगे। हां, कुछ फोन अवश्य आए कि क्या स्थिति है। बाद मंे वह भी बंद। अब वो ठीक हैं लेकिन कोई बताने वाला नहीं कि क्या करें। कोई काउंसेलिंग नहीं। अस्पतालों की हालत यह है कि आप जयप्रकाश नारायण अस्पताल चले जाइए आपको भारी संख्या में लोग रोते, बिलखते मिल जाएंगे। उनके परिजन भर्ती भी हैं या नहीं, हैं तो कहां हैं इसकी सूचना मिलने तक में आपको कई दिनों लग सकते हैं। आपके परिजन की मृत्यु हो जाए तो प्रायः शव तक स्वाभाविक रुप में नहीं मिल पाता। अस्पताल का व्यवहार ठीक वैसा ही है जिसके लिए सरकारी अस्पताल बदनाम रहे हैं। दिल्ली एवं मुंबई के सारे राज्य अस्पतालों की एक ही दशा है। केंद्र ने स्वास्थ्यकर्मियों की रक्षा के लिए कानून बना दिया और हमलोगों ने तबलीगी जमात के जाहिलों के व्यवहार के कारण समर्थन कर दिया, पर उससे वे निर्भय हो गए। उनकी कोई जिम्मेवारी तय हुई ही नहीं। किंतु जहां सरकारों की ही जिम्मेवारी तय नहीं होती, राज्य सरकारें अपनी जिम्मेवारी की बजाय झूठ, गफलत और कुटिलता से काम कर रही हैं वहां स्वास्थ्यकर्मियों पर नकेल कौन कसेगा?

अभी एक ऑडियो वायरल है जिसमें अरविन्द केजरीवाल के सफदरजंग अस्पताल का एक कर्मचारी कह रहा है कि यहां तो मौत केवल दिख रही है, कुछ व्यवस्था नहीं है। वह यह भी कह रहा है कि जितने लोग मारे गए, उतने सरकार बता ही नहीं रही है। अब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे एवं दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल से पूछने का समय आ गया है कि आपकी जिम्मेवारी क्या है? केजरीवाल का सारा फोकस टीवी और प्रिंट मीडिया में विज्ञापन पर है। सच यह है कि कोविड -19 के मरीज का समुचित इलाज तो छोड़िए उनके साथ उचित व्यवहार, उनके परिजनों के साथ सामान्य सहानुभूति, मृत्यु के बाद बिना भागदौड़ शव मिल जाना, जिनके घर में कोई कोविड 19 संक्रमित हो गया उनके सारे परिवार की टेस्टिंग या काउंसेलिंग तक नहीं की न्यूनतम सामान्य स्थिति नहीं।

दुर्भाग्य यह है कि लगातार मरीजों की संख्या बढ़ने, मृतकों की संदिग्ध संख्या के बावजूद देश का ध्यान श्रमिकों के जाने-आने पर है। इसका भी सच भयावह है। थोड़ी भी गहराई से देखेंगे तो आपका निष्कर्ष यही आएगा कि दोनों जगहों की सरकारों ने ऐसी स्थिति पैदा की कि ज्यादा से ज्यादा बाहर के लोग यहां से निकल जाएं। दिल्ली मे जिस तरह पहले लॉकडाउन के बाद तीन दिनों तक गाजियाबाद सीमा पर भीड़ जुटी रही और उनको वापस लाने का केजरीवाल ने हर संभव तो छोड़िए, एक भी ठोस कदम नहीं उठाया। आज भी उनका बयान है कि केंद्र हमको 100 रेलें प्रतिदिन दे हम लोगों को उनके घर तक पहुंचवा देंगे। क्या मजाक है! वे अभी भी नहीं कहते कि हम उनको रोकना चाहते हैं। लॉकडाउन के बीच निकलने वाले साफ कहते थे कि दिल्ली और उत्तर प्रदेश में जमीन आसमान का अंतर दिखाई देता था। दिल्ली से नोएडा घुसते ही लगता था कि लॉकडाउन में आ गए हैं। महाराष्ट्र में लॉकडाउन पूरी तरह विफल रहा। इसका परिणाम हुआ कि शारीरिक दूरी टूट गई और अकेले महाराष्ट्र में देश के 45 प्रतिशत मरीज एवं इतने ही मृतक हो चुके हैं। दिल्ली में भी लगातार संख्या बढ़ती जा रही है। इसके अपराधी ये सरकारें ही हैं। आखिर इन्होंने उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य से क्यों नहीं सीखा। सबसे ज्यादा संवेदनशील राज्य, सबसे ज्यादा शहर, सबसे ज्यादा बाहर से आने वाले श्रमिक, इसके बाजवूद कोविड-19 ही नियंत्रण में नहीं है, बल्कि श्रमिकों की भी हरसंभव सहायता हो रही है। दूसरी ओर सबसे ज्यादा दुर्घटना ग्रस्त होने वाले श्रमिकों की संख्य महाराष्ट्र की है। प्रश्न है कि रास्ता क्या है? क्या केन्द्र इसमें मूकदर्शक ही बना रहेगा? महाराष्ट्र और दिल्ली ने अपने कुप्रबंधन और कुछ कुटिल नीति के कारण इस अधिकार को ही जोखिम में डाल दिया है। अगर पूरा प्रयत्न करते और विफल हो जाते तो इनको क्षमा किया जा सकता था। किंतु इन्होंने अपनी अक्षमता, अयोग्यता, और बेईमानी से ऐसी भयावह स्थिति पैदा की है। हमारे संविधान में महामारी के आधार पर राष्ट्रपति शासन लागू करने का प्रावधान नहीं है, लेकिन ऐसे ही चलता रहा तो महाराष्ट्र और दिल्ली दोनों संक्रमितों और मृतकों का रिकॉड बना देंगे। इन दोनांे राज्यों में देश भर के लोग हैं जो शिकार हो रहे हैं। स्थिति इनके नियंत्रण से बाहर हो गई है। इसमें केंद्र का हस्तक्षेप अनिवार्य है। कायदे से इन दोनों सरकारों को सत्ता में रहने का अधिकार नहीं है। मोदी सरकार को विरोध और दलों के बीच अलोकप्रियता का जोखिम उठाते हुए भी इन दोनों राज्यों का शासन अपने हाथ में लेकर संक्रमण का विस्तार, लोगों की जान की रक्षा करनी चाहिए। साथ ही अनावश्यक पलायन को रोकने का रास्ता भी उसी से निकलेगा। साहस करे मोदी सरकार।

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