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बगावतों से कांग्रेस नहीं ले रही सबक

अरुणाचल प्रदेश कांग्रेस में बगावत साबित करती है कि राज्यों व विधायकों पर पार्टी की पकड़ बेहद ढीली है।

बगावतों से कांग्रेस नहीं ले रही सबक
राहुल गांधी बेशक टीम पीके के निर्देशन में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की बंजर जमीन को उर्वर बनाने की कोशिश में जुटे हों, लेकिन अरुणाचल प्रदेश कांग्रेस में बगावत साबित करती है कि राज्यों व विधायकों पर पार्टी की पकड़ बेहद ढीली है। यह पहली बार नहीं है जब कांग्रेस की किसी राज्य सरकार में बवंडर मचा हो। अरुणाचल प्रदेश में ही यह दूसरी बार है। इससे पहले कालिखो पुल के नेतृत्व में कांग्रेस में नवंबर, 2015 में बगावत हुई थी। उस समय नबाम तुकी कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री थे।
उत्तराखंड में भी कांग्रेस विधायक बगावत कर चुके हैं। वहां भी सुप्रीम कोर्ट की दखल के बाद जैसे-तैसे कांग्रेस की सरकार बहाल हो पाई। अरुणाचल प्रदेश में भी दो माह पहले सुप्रीम कोर्ट के आदेश से ही कांग्रेस को दोबारा सत्ता हासिल हुई थी। इस बार तो प्रदेश में कांग्रेस की लुटिया ही डूब गई। कुल 44 में से 43 कांग्रेस विधायक बागी हो गए। मुख्यमंत्री पेमा खांडू समेत पूरी सरकार ही भाजपा सर्मथित पीपुल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल (पीपीए) में शामिल हो गए।
खांडू के साथ सरकार में सहयोगी दो निर्दलीय भी उनके साथ ही पीपीए में चले गए। कांग्रेस के लिए चिंता की बात है कि पार्टी हाईकमान की सहमति से ही पेमा खांडू को नई सरकार की कमान दी गई थी। फिर भी खांडू कांग्रेस के साथ नहीं रह सके। इससे साफ है कि कांग्रेस की राज्य इकाइयों में सबकुछ ठीक नहीं है। हरियाणा कांग्रेस में फूट जगजाहिर है। पंजाब कांग्रेस में कैप्टन अमरिंदर बनाम बाजवा की लड़ाई है। छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी ने कांग्रेस छोड़ कर अपनी पार्टी बना ली है।
मध्यप्रदेश में कांग्रेस गुटबाजी की शिकार है। यूपी में कांग्रेस के पास नेता ही नहीं है। दिल्ली से ले जाना पड़ा है। दिल्ली में भी अमरिंदर सिंह लवली व अजय माकन गुटों में कांग्रेस बंटी हुई है। राज्य इकाइयों में फूट और बगावत से साबित होता है कि कांग्रेस नेतृत्व में पार्टी को जोड़कर रखने की क्षमता नहीं रह गई है। राष्ट्रीय स्तर पर भी कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की क्षमता को लेकर कई दिग्गज कांग्रेसी नेताओं को संदेह है।
वे राहुल को नेता मानने को तैयार ही नहीं है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी बेशक पार्टी को मजबूत करना चाहती हैं, लेकिन पार्टी की ‘हाईकमान कार्यप्रणाली’ घुन की तरह कांग्रेस को खोखला कर रही है। घोटालों व अपने हवाई व नकारा नेताओं के चलते 2014 लोकसभा में भाजपा के हाथों करारी शिकस्त खाने के बाद भी कांग्रेस ने अपनी दरबार कल्चर नहीं बदली है। लगता है पार्टी अध्यक्ष ने ‘बड़ी हार’ से भी कोई सबक नहीं लिया है।
कांग्रेस समझ ही नहीं पा रही है कि देश का मिजाज बदल चुका है। युवाओं की आकांक्षाएं बदल चुकी हैं। केवल चापलूस व दरबारी नेताओं के भरोसे पार्टी सत्ता हासिल नहीं कर सकती है। अब नए विचार चाहिए, नया आइडिया चाहिए, नया आत्मविश्वास चाहिए और मजबूत नेता व संगठन चाहिए। संयोग से कांग्रेस इस समय इन सभी नई चीजों की कमी से गुजर रही है। केवल मोदी विरोध के एकमेव एजेंडे पर पार्टी चलाई जा रही है।
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