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चिंतन: मानमर्दन की सियासत पर लगाम की जरूरत

डीडीसीए में कदाचार मामले में वित्त मंत्री अरुण जेटली फिर बेदाग होकर निकले हैं।

चिंतन: मानमर्दन की सियासत पर लगाम की जरूरत
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डीडीसीए (दिल्ली एंड डिस्ट्रिक्ट क्रिकेट एसोसिएशन) में कदाचार मामले में वित्त मंत्री अरुण जेटली फिर बेदाग होकर निकले हैं। इस मामले में क्लीनचिट भी उन्हें केजरीवाल सरकार की ओर से गठित जांच आयोग की रिपोर्ट में दी गई है। अरुण जेटली पर डीडीसीए में कथित घोटाले का आरोप भी खुद दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल ने ही लगाया था। अरविंद के आरोप के बाद बगावती अंदाज में पूर्व क्रिकेटर व भाजपा सांसद कीर्ति आजाद ने भी बाकायदा मीडिया ब्रीफिंग के जरिये जेटली का नाम लिए बिना उनके कार्यकाल में डीडीसीए में भ्रष्टाचार का आरोप लगाया था।
उन्होंने अपने आरोप के पक्ष में वीडियो फुटेज भी दिखाए थे। उसके बाद दिल्ली की केजरी सरकार ने डीडीसीए में कदाचार की जांच के लिए गोपाल सुब्रrाण्यम की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय आयोग गठित की थी। इस जांच आयोग की रिपोर्ट में कहीं भी वित्त मंत्री अरुण जेटली का नाम नहीं है। 247 पन्नों की इस रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि बतौर डीडीसीए अध्यक्ष अरुण जेटली पर किसी तरह की धोखाधड़ी का मामला नहीं पाया गया है। हां, इस रिपोर्ट में फिरोजशाह कोटला स्टेडियम के निर्माण में आर्थिक अनियमितताओं की बात जरूर कही गई है, लेकिन जेटली के कार्यकाल में किसी तरह की गड़बड़ी का जिक्र नहीं है।
इस रिपोर्ट से यह बात साबित हुई है कि केजरीवाल और कीर्ति आजाद के आरोप निराधार थे। यह दूसरी बार है कि डीडीसीए में कथित कदाचार मामले की जांच में अरुण जेटली पाक-साफ पाए गए हैं। दोनों ही बार विपक्षी दलों की ओर से जांच कराई गई है। इससे पहले डीडीसीए में कदाचार की जांच यूपीए सरकार के समय कॉरपोरेट मंत्रालय के अधीन आर्थिक अपराध जांच इकाई-एसएफआईओ (सीरियस फ्रॉड इन्वेस्टिगेट ऑफिस) ने की थी, जिसमें भी अरुण जेटली को निदरेष बताया गया था। ऐसे में इस रिपोर्ट के बाद अरविंद केजरीवाल और कीर्ति आजाद दोनों के लिए सोचने का वक्त है।
जेटली का 40 साल का राजनीतिक करियर आईने की तरह है, जिसमें उनपर कभी किसी कदाचार की आंच नहीं आई। लेकिन सीएम केजरीवाल के प्रधान सचिव राजेंद्र कुमार के दफ्तर पर सीबीआई की छापेमारी के बाद आम आदमी पार्टी व खुद अरविंद ने जिस तरह जेटली पर डीडीसीए में भ्रष्टाचार करने का आरोप लगाया, वह आरोप बेबुनियाद निकला। इस छापे के बाद केजरीवाल कह रहे थे कि उनके ऑफिस से डीडीसीए घोटाले की फाइल उठाने के लिए यह रेड डाली गई थी। क्योंकि इसमें अरुण जेटली फंसने वाले हैं। लेकिन अपनी ही जांच आयोग के सामने वे झूठे साबित हो गए।
एक सीएम के तौर पर उनकी छवि के लिए यह ठीक नहीं है। राजनीति अलग है, लेकिन सीएम पद की भी गरिमा होती है। केजरी सदन में भी जेटली पर आरोप लगाने से बाज नहीं आए। अब वे अपने सर्मथकों का किस नैतिकता से सामना करेंगे। इतना ही नहीं सीबीआई जांच में अगर प्रधान सचिव राजेंद्र कुमार दोषी पाए गए तो वे जनता को क्या मुंह दिखाएंगे? उनके भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान का क्या होगा? लोग नहीं कहेंगे कि सब सत्ता के लिए था! भाजपा से सस्पेंड किए गए कीर्ति आजाद के लिए भी इस जांच आयोग की रिपोर्ट एक सबक है।
उन्हें भी अपनी आरोप की राजनीति पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है। अपनी हर र्मज के लिए एक शख्स को कसूरवार मानना अच्छी बात नहीं है। 66 साल के गणतंत्र में हमारी राजनीति इतनी तो मैच्योर हो जानी चाहिए थी कि नेताओं में इतनी तमीज हो कि वे बिना आधार, बेवजह किसी का मानर्मदन नहीं करें। मानर्मदन की राजनीति पर तत्काल लगाम लगाने की जरूरत है।

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