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डाॅ. एलएस यादव का लेख : वज्र से बढ़ेगी तोपखाने की ताकत

सेना के तोपखाना बेड़े में 18 फरवरी को उसकी 100वीं तोप के-9 वज्र टी शामिल हो गई है। भारतीय सेना को इस समय 1580 टोड तोपों के अलावा 150 एटैग्स एवं 114 धनुष तोपों की विशेष रूप से जरूरत है। इस तरह सेना को कुल 1800 तोपों की आवश्यकता है। भारतीय सेना लगभग 1600 तोपें खरीदना चाहती है। इसके लिए इजरायल से 400 एथोस तोपें तुरन्त मांगने का विकल्प भी रखा गया है। इसके अलावा फ्रांस से नेक्सटर तोपें भी खरीदी जा सकती हैं। ऐसी तोपें चीन की सीमा या पाकसीमा पर जब तैनात रहेंगी तो दुश्मन का चिन्तित रहना स्वाभाविक है। इनकी तैनाती से भारत का पलड़ा भारी हो गया है।

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डाॅ. एलएस यादव

भारतीय सेना के तोपखाना बेड़े में 18 फरवरी को उसकी 100वीं तोप के-9 वज्र टी शामिल हो गई है। थल सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवने ने सूरत में इसे हरी झंडी दिखाकर इसे भारतीय सेना में शामिल किया। भारतीय सेना को मिलने वाली इन तोपों का निर्माण भारत में ही एलएंड टी कंपनी द्वारा किया गया है। स्वदेशी उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए इस तोप को गुजरात के हजीरा प्लांट में तैयार किया गया है। के-9 वज्र टी तोप एक स्वचालित तोप है। इस श्रेणी की तीन तोपों को लेह पहुंचाया जा चुका है। अब उन्हें परीक्षण के लिए अधिक ऊंचाई वाले इलाकों में पहंुचाया जा रहा है। वहां यह देखा जाएगा कि आवश्यकता पड़ने पर इनका उपयोग शत्रु सेना के खिलाफ ऊंचाई वाले क्षेत्रों में किया जा सकता है या नहीं।

इन तोपों की ऊंचे पहाड़ी इलाकों में सफल परीक्षण के बाद भारतीय सेना पर्वतीय अभियानों के लिए इन स्वचालित तोपों की दो या तीन अतिरिक्त रेजिमेंट बनाने के लिए नई खरीद का आर्डर दे सकती है। लार्सन एंड टुब्रो(एलएंडटी) ने सेना को 100 के-9 वज्र टी स्वचालित तोपों की आपूर्ति की है। इनको पिछले दो वर्षों में विभिन्न रेजिमेंटों में तैनात किया गया है। उल्लेखनीय है कि के-9 वज्र टी तोप दक्षिण अफ्रीका की के-9 थंडर तोप का स्वदेशी संस्करण है। इस स्वचालित तोप की मारक क्षमता 38 किलोमीटर की दूरी तक की है। यह तोप जीरो रेडियस पर घूमकर चारों तरफ हमला करती है। 155 एमएम 52 कैलिबर की यह तोप 50 टन वजन वाली है। यह 47 किलोग्राम का गोला फेंकने की क्षमता रखती है। मात्र 15 सेकेंड में शत्रु पर यह तीन गोले गिराने में सक्षम है। इसके द्वारा फेंका गया गोला 928 मीटर प्रति सेकेंड यानी एक मिनट में 55680 मीटर की दूरी तय करता है। ऐसी तोपें चीन की सीमा या पाकिस्तान की सीमा पर जब तैनात रहेंगी तो दुश्मन का चिन्तित रहना स्वाभाविक है। इनकी तैनाती से पर्वतीय युद्ध क्षेत्र में भारत का पलड़ा भारी हो गया है।

एलएंडटी द्वारा 100वीं तोप दिए जाने के साथ ही कंपनी नें मई 2017 में रक्षा मंत्रालय द्वारा डसे दिए गए मौजूदा ठेके के तहत सभी तोपों की आपूर्ति सफलता पूर्वक कर लिया है। समय से पहले ऐसा करके कंपनी ने अपने पुराने रिकार्ड को बनाए रखा है। विदित हो कि वर्ष 2017 में एलएंडटी कंपनी और रक्षा मंत्रालय में 4500 करोड़ रुपये का एक करार हुआ था। उसके बाद निर्माण कार्य शुरू किया गया था। इसके कुछ समय बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जनवरी 2018 में हजीरा में आर्म्ड सिस्टम काॅम्प्लेक्स राष्ट्र को समर्पित किया था। गौरतलब यह है कि एलएंडटी ने के-9 वज्र टी तोप के लिए वैश्विक बोली के माध्यम से तोप निर्माण का करार हासिल किया था। एलएंडटी दक्षिण कोरियाई रक्षा कंपनी हन्वहा टेकविन डिफेंस के साथ बोली लगाने वाली प्रमुख कंपनी थी। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह पिछले साल जनवरी 2020 में हजीरा में 51वीं के-9 बज्र टी तोप को हरी झंडी दिखाई थी। कंपनी ने अपनी मेक इन इंडिया की पहल के तौर पर तोपों के उत्पादन के लिए सूरत के पास हजीरा विनिर्माण परिसर में एक ग्रीनफील्ड निर्माण और परीक्षण की सुविधा की स्थापना की थी। इसका उपयोग दक्षिण कोरिया के अलावा तुर्की, आस्ट्रेलिया, फिनलैंड, नार्वे, एस्तेनिया एवं मिस्र आदि देश करते हैं।

अब तोपों के प्रदर्शन के आधार पर भारतीय सेना दो या तीन अतिरिक्त रेजीमेंट के लिए इन तोेपों की खरीद का आर्डर दे सकती है। ज्ञातव्य है कि वर्श 1986 में भारतीय सेना में शामिल की गई होवित्जर तोपों ने 1999 के कारगिल संघर्ष के समय पाकिस्तानी घुसपैठियों को भगाने में अहम्ा भूमिका निभाई थी, इसलिए ऐसी तोपों की सेना को विशेष आवश्यकता है जो लद्दाख जैसे पर्वतीय इलाके में युद्ध के समय विजयी भूमिका निभा सकें। भारतीय सेना ने लद्दाख क्षेत्र में दुश्मन को मुहंतोड़ जवाब देने के लिए पिछले वर्श एम-777 अल्ट्रा लाइट होवित्जर तोपें तैनात की थीं जिनकी भूमिका ठीक रही थी। भारतीय सेना की यौद्धिक क्षमता को बढ़ाने के लिए रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) इस समय मेक इन इंडिया योजना के तहत एडवांस्ड आर्टिलरी गन सिस्टम होवित्जर तैयार करने का कार्य कर रहा है। अगले साल इन तोपों को भी भारतीय सेना के तोपखाना बेड़े में शामिल किया जा सकता है। डीआरडीओ ऐसी लगभग 200 तोपों के निर्माण की दिशा में काम कर रहा है। अब नई आधुनिक तोपों के आ जाने से लद्दाख में सेना की आर्टिलरी की ताकत कई गुना बढ़ जाएगी।

इससे पहले 20 दिसम्बर 2020 को डीआरडीओ द्वारा विकसित स्वदेशी होवित्जर तोप एटीएजीएस का परीक्षण ओडिशा के बालासोर फायरिंग रेंज में किया गया था जो कि सफल रहा था। डीआरडीओ के एटीएजीएस प्रोजेक्ट डायरेक्टर शैलेन्द्र गाडे के मुताबिक यह दुनिया की सबसे बेहतर किस्म की तोप है। अभी तक किसी दूसरे देश ने ऐसी तोप विकसित नहीं की है। यह एडवांस्ड टावर आर्टिलरी गन 48 किलोमीटर की दूरी से ही अत्यन्त सटीक तरीके से अपने लक्ष्य को भेद सकती है। अगर इस तोप के आॅपरेशनल पैरामीटर की बात की जाए तो यह 25 किलोमीटर प्रति घण्टा मूव कर सकती है। आने वाले दिनों में भारत इनकी तैनाती चीन से लगती सीमा पर अरुणाचल प्रदेश और लद्दाख के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में कर सकता है।

गत वर्ष 20 जनवरी 2020 को मध्य प्रदेश स्थित वाहन निर्माणी जबलपुर ने 130 मिलीमीटर पुरानी सारंग तोपों को अपग्रेड करके सेना को सौंप दिया था। अब उन्नत सारंग तोप में 28 के बजाय 38 किलोमीटर की अचूक मारक क्षमता है। इसकी विध्वंसक क्षमता में भी काफी वृद्धि हो गई है। यह अत्याधुनिक तोप वजन में भी बेहद हल्की है। इसका लाजवाब प्रदर्शन देखकर सैन्य अधिकारी 200 और पुरानी सारंग तोपों के अपग्रेड करने का आदेश दे दिया है।

विदित हो कि भारतीय सेना को इस समय 1580 टोड तोपों के अलावा 150 एटैग्स एवं 114 धनुष तोपों की विशेष रूप से जरूरत है। इस तरह सेना को कुल 1800 तोपों की आवश्यकता है। भारतीय सेना लगभग 1600 तोपें खरीदना चाहती है। इसके लिए इजरायल से 400 एथोस तोपें तुरन्त मांगने का विकल्प भी रखा गया है। इसके अलावा फ्रांस से नेक्सटर तोपें भी खरीदी जा सकती हैं। इन नई तोपों के मिलने से सेना की यह कमी आने वाले दिनों में पूरी हो जाएगी और भारतीय तोपखाना काफी ताकतवर हो जाएगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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