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कविता और कविता-शिक्षण : संजय राय

कविता जब बनती है; तो बोलती है चिड़िया, खिलते हैं फूल और मोजरा जाता है आम का वह बूढ़ा पेड़ भी

कविता और कविता-शिक्षण : संजय राय

कविता बहुत ही कोमल चीज़ है। कविता जब बनती है; तो बनती है रोशनी, बनती है धरती, बनता है आकाश। कविता जब बनती है; तो बोलती है चिड़िया, खिलते हैं फूल और मोजरा जाता है आम का वह बूढ़ा पेड़ भी। इस तरह आदमी आदमी बनता है, जब बनती है कविता। कह सकते हैं अपने समय, समाज, परिवेश और प्रकृति के बीच सचेत आवाजाही का नाम है कविता। इस प्रकार कोमलता के साथ चुपके-से दायित्वबोध घुस आता है कविता में और कविता व्यक्तिगत वस्तु से सामाजिक वस्तु में तब्दील हो जाती है।

कविता का काम क्या है? यहाँ इस प्रश्न पर विचार करना जरूरी है।

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कविता मूलतः भावबोध और अनुभूति जगत की चीज़ है। अतः इसका मुख्य काम हुआ भावबोध और अनुभूति का स्तर ऊँचा करना। कह सकते हैं सौंदर्यबोध का परिष्कार व उसका विकास ही कविता का मूल लक्ष्य है। यहाँ सौंदर्यबोध दो स्तरों पर है – एक कविता का सौंदर्यबोध और दूसरा व्यक्ति (या पाठक) का सौंदर्यबोध। पाठक का सौंदर्यबोध कविता के सौंदर्यबोध की उँगली पकड़कर यात्रा करता है। यहाँ हम साफ-साफ देख सकते हैं कि कविता अपने आप में साध्य नहीं, बल्कि व्यक्ति (या पाठक) के सौंदर्यबोध के परिष्कार व उसके विकास का साधन है।
कोई कविता कब हमें अच्छी लगती है? कोई कविता क्यों हमें अच्छी लगती है? आखिर क्यों जब हम कई कविताएँ पढ़ते हैं, तो सभी कविताएँ एक ही परिमाण में अच्छी नहीं लगतीं? आखिर क्यों सबसे अच्छी कविता कौन-सी है का जवाब हमारे पास होता है? आखिर क्यों सबसे अच्छी कविता के चुनाव में अलग-अलग व्यक्तियों का अलग-अलग मत होता है? आखिर क्यों एक कविता अलग-अलग व्यक्तियों को एक ही परिमाण में अच्छी नहीं लगती? इन प्रश्नों पर गौर से विचार करें तो कविता से जुड़ी हुई कई गुत्थियाँ खुलती हैं।
कविता की अपनी एक दुनिया होती है, अपना एक भाव-जगत होता है। साथ ही व्यक्ति (या पाठक) की भी अपनी एक दुनिया व अपना एक भाव-जगत होता है। कविता पढ़ते हुए कविता के भाव-जगत व पाठक के भाव-जगत के बीच जितनी मात्रा में एकात्मकता स्थापित होती है, कविता उतनी ही मात्रा में पाठक को अच्छी लगती है। अर्थात् कविता व पाठक के भाव-जगत के मेल के परिमाण पर निर्भर करता है कविता के प्रति पाठक की रुचि का परिमाण। जब हम कई कविताओं के बीच से एक सबसे अच्छी कविता चुनते हैं, तो हमें यह समझना चाहिए कि व्यक्ति (या पाठक) के भाव-जगत के बीच की एकात्मकता तुलनात्मक दृष्टि से सबसे अधिक रही है। जब व्यक्ति (या पाठक) में भिन्नता आती है, तो भाव-जगत भी भिन्न-भिन्न हो जाते हैं। इसलिए कविताओं और पाठकों के भाव-जगत की एकात्मकता की मात्रा भी भिन्न-भिन्न हो जाती है। यही कारण है कि अलग-अलग लोगों को अलग-अलग कविताएँ अच्छी लगती हैं।
जब हम कवित-शिक्षण की बात करते हैं, तो हमें याद आता है – कुछ शब्दों का अर्थ, काव्य-पंक्तियों का सीधे-सीधे गद्य में कह दिया जाना, एक नोट और उसे हू-ब-हू रटने का दबाव। कविता-शिक्षण की इस प्रक्रिया में कविता की व्यक्तिगत वस्तु से सामाजिक वस्तु तक की यात्रा छूट जाती है। छात्र के अनुभूति जगत व सौंदर्यबोध को कहीं नहीं कुरेदती कविता। छात्र का भाव जगत और कविता का भाव जगत दोनों कहीं मिलते ही नहीं। ‘किवता-शिक्षण’ जितना तकनीकी पद है, यह प्रक्रिया दरअसल उतनी तकनीकी नहीं। इस प्रक्रिया में छात्र में काव्य-संस्कार पैदा करना होता है। संस्कार न तो कुछ दिनों में पैदा होता है, न ही कोई पद्धत्ति विशेष इसका वाहक हो सकती है। इसमें जितना धैर्य और संयम चाहिए, उतना ही परिश्रम और लगन भी।
काव्य-संस्कार के लिए जो चीज़ें जरुरी हैं, उसमें पहला है – काव्य-पाठ। यह सबसे महत्वपूर्ण और पहली शर्त है काव्य-संस्कार के विकास के लिए। यह जरुरी नहीं कि काव्य-पाठ के दौरान बांग्ला की तरह उतनी ही नाटकीयता का निर्वाह हो। मुझे लगता है काव्य-पाठ करते समय पाठ करनेवाले को बस इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि एक-एक शब्दों, एक-एक अनुभूतियों को जैसे वह खुद जी रहा हो। मुझे याद है कई बार काव्य-पाठ सुनते हुए मेरे रोंगटे खड़े हुए हैं। अतः शिक्षक के काव्य-पाठ से यह अनुभूति और गहराई अपेक्षित है।
पूरी कविता या काव्य पंक्तियों से बार-बार सामना होते रहने से भी धीरे-धीरे काव्य-संस्कार बनता है। अतः कविता पढ़ाते हुए ही नहीं, बल्कि छात्रों से विभिन्न विषयों पर बात करते हुए अथवा दूसरे विषयों की चर्चा के क्रम में भी काव्य पंक्तियों का उद्धरण देना चाहिए। इससे होगा यह कि कविताएँ छात्रों के भीतर धीरे-धीरे घुलने लगेंगी और कविताओं की व्याख्या के लिए उन्हें नए-नए तरीके भी मिलेंगे। उदाहरण के लिए भवानी प्रसाद मिश्र का एक काव्यांश ले सकते हैं –
कुछ लिख के सो, कुछ पढ़ के सो
तू जिस जगह जागा सवेरे
उस जगह से बढ़के सो।
इन पंक्तियों में लिखना, पढ़ना, सोना, जागना शब्दों का प्रयोग हुआ है। क्या इन शब्दों का जो अर्थ होता है, वही इस कविता का कथ्य है? उत्तर साफ है, नहीं। यहाँ अर्थ के कई स्तर हैं। शब्द अपने अर्थ के स्तर से ऊपर उठकर पाठक की अनुभूति से जुड़ते हैं और देर तक पाठक के भीतर कुछ गूँजता रहता है।
मुझे लगता है संगीत भी व्यक्ति (या पाठक) में काव्य-संस्कार पैदा करने में सहायक हो सकता है। संगीत कला व काव्य कला में आंतरिक रूप में कोई विशेष फर्क नहीं है। दोनों अनुभूति जगत की चीज़ें हैं। बाह्य रूप से ये क्रमशः ध्वनि व शब्दों से जुड़े हुए हैं। ध्वनियों के माध्यम से एक अनुभूति-जगत से दूसरे अनुभूति-जगत के बीच की आवाजाही का नाम है संगीत, और कविता शब्दों के माध्यम से। जब दोनों एक साथ हों, तो इनके प्रभाव की हम सिर्फ कल्पना ही कर सकते हैं। हम अपने छुटपन में माँ, चाची, दादी के मुख से विभिन्न मांगलिक अवसरों के लिए गीत सुनते रहे हैं। सुनते रहे हैं रफ़ी, लता, किशोर आदि के गाने। ग़ज़लों की तो पूछिए ही मत। हमने ध्वनि के साथ-साथ शब्दों को भी बजते सुना है।
आज सिर्फ ध्वनि बजती है, शब्द सिरे से नदारद हैं। अगर हैं भी तो अपनी अस्मिता को खोकर। ऐसे में चुने हुए गीतों और ग़ज़लों का प्रयोग भी उचित होगा। बच्चन के गीत, प्रसाद, महादेवी, निराला व दुष्यंत की गायी गई कविताओं व ग़ज़लों का प्रयोग भी काव्य-संस्कार के विकास में सहायक होगा। यह प्रक्रिया घर से ही शुरू होनी चाहिए।
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