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विचार: कुम्बले की अग्निपरीक्षा

कुंबले बतौर कोच कोरे हैं, इसलिए उन्हें अधिक मेहनत करनी पड़ेगी।

विचार: कुम्बले की अग्निपरीक्षा
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नई दिल्ली. ज्यादा समय नहीं बीता जब भारतीय क्रिकेट के कर्णधार सचिन, सौरभ, सहवाग, द्रविड़, कुंबले और लक्ष्मण थे। क्रिकेट टीम में उनका पदार्पण थोड़ा आगे-पीछे हुआ। अपनी प्रतिभा और मेहनत के बल पर उन्होंने पहले जगह पक्की की और फिर इंडियन टीम को टीम इंडिया बना दिया। छहों की अलग पहचान थी, अलग-अलग योगदान था, किन्तु उनकी संयुक्त शक्ति से देश और दुनिया के क्रिकेट इतिहास में नई इबारतें लिखी गईं।
सौरभ ने कप्तानी को ऊंचाई के अलग मुकाम पर पहुंचाया, भारतीय खिलाड़ियों को प्रतिद्वंद्वी टीम की आंख मिलाने का हुनर सिखाया। सचिन निर्विवाद दुनिया का सर्वर्शेष्ठ बल्लेबाज कहलाया जबकि द्रविड़ बरसों अपने दल की दीवार बना रहा। लक्ष्मण भरोसेमंद पारी का प्रतीक था जबकि कुंबले ने सालों अचूक आक्रमण की बागडोर संभाले रखी। सहवाग के बल्ले की दहशत से तो आज भी गेंदबाजों के रौंगटे खड़े हो जाते हैं।
अच्छा है संन्यास के बाद भी ये छहों खिलाड़ी क्रिकेट से जुड़े हैं। हां, अब उनकी भूमिका थोड़ी बदल गई है। द्रविड़ देश की जूनियर टीम के कोच हैं तो सहवाग कमेंट्री करते दिख जाते हैं। सौरभ, सचिन और लक्ष्मण बीसीसीआई के सलाहकार हैं, जिनकी सिफारिश पर अनिल कुंबले को टीम इंडिया का मुख्य कोच बनाया गया है। भले ही भारतीय प्रशिक्षक का पद ग्लैमर का सूचक है, किन्तु इस कुर्सी पर बैठे व्यक्ति को निरंतर अग्निपरीक्षा से गुजरना पड़ता है।
उसकी प्रत्येक भाव-भंगिमा पर करोड़ों खेल प्रेमियों की नजर रहती है. टीम की जीत पर उसे तालियां और हार पर गालियां मिलती हैं। कुंबले बतौर कोच कोरे हैं, इसलिए उन्हें अधिक मेहनत करनी पड़ेगी। सफलता या विफलता का प्रभाव केवल उन पर नहीं, भविष्य में टीम का कोच बनने की इच्छा रखने वाले हर हिंदुस्तानी पर पड़ेगा। यूं भी लंबे अंतराल के बाद देश के किसी पूर्व खिलाड़ी को यह जिम्मेदारी सौंपी गई है। सोलह बरस पहले कपिल देव कोच बने थे, उसके बाद बीसीसीआई ने निरन्तर विदेशी प्रशिक्षक ही नियुक्त किए हैं।
यह बात जरूर खटकती है कि कुंबले को केवल एक बरस के लिए कोच बनाया गया है। लगता है परखने के बाद ही बोर्ड उन्हें सेवा विस्तार देगा। यदि वह सफल रहे तब 2019 में होने वाले विश्व कप तक उनका कार्यकाल बढ़ाया जा सकता है, अन्यथा पहले छुट्टी हो जाएगी।
भारतीय टीम अगले आठ महीने के दौरान पांच सीरीज खेलेगी, जिनमें से केवल एक के लिए उसे विदेश (वेस्टइंडीज) जाना होगा। बांग्लादेश, न्यूजीलैंड, इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया की टीम तो सीरीज के लिए हिन्दुस्तान आ रही हैं। इसका अर्थ यह भी है कि कुंबले को शुरू में विकट चुनौती का सामना नहीं करना पड़ेगा।
गौरतलब है कि हमारे कुछ खिलाड़ी टेस्ट, एक दिवसयीय और टी-20, तीनों टीम में हैं। अलग कप्तान होने से खिलाड़ियों की वफादारी पर कड़ी नजर रखी जाती है। ऐसे माहौल से खेमेबंदी बढ़ती है। पहले भी कई बार गुटबाजी के कारण भारतीय टीम नुकसान उठा चुकी है।
जीत के लिए सबसे जरूरी शर्त एकता है। जो कप्तान और कोच टीम को एक रखने में कामयाब हो जाते हैं, उन्हें सफलता से कोई नहीं रोक सकता। क्रिकेट में कुंबले का ऊंचा नाम है। कोच पद की घोषणा के बाद उन्होंने कहा है कि ड्रेसिंग रूम में वह खिलाड़ियों से बड़े भाई जैसा व्यवहार करेंगे। आशा है कुंबले कामयाब कोच सिद्ध होंगे।
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