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सुशील राजेश का लेख : अमेरिकी लोकतंत्र कलंकित

अब ट्रंप की भाषा बदल चुकी है। अब वह लोकतंत्र पर हमले की आलोचना कर रहे हैं। अमेरिका में 208 सालों के बाद लोकतंत्र पर ऐसा हमला किया गया है। 1812 में युद्धों का दौर था। तब ब्रिटेन ने अमेरिकी संसद में आग लगा दी थी। उस वक्त वह ‘घरेलू आतंकवाद’ नहीं था।

सुशील राजेश का लेख : अमेरिकी लोकतंत्र कलंकित
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सुशील राजेश

भावार्थ में दुनिया का सबसे पुराना लोकतंत्र पराजित हो गया। अमेरिकी मुक्ति के प्रतीक 'स्टैच्यु आफ लिबर्टी' का भी अपमान हुआ। राष्ट्रीय ध्वज को पांव से कुचला गया। तोड़फोड़, आगजनी की गई, आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े, अराजक पांव मेज पर रखकर निरंकुशता साबित करने की कोशिश की गई। अमेरिकी संसद के 'कैपिटल परिसर' में जिस तरह उन्मादी भीड़ घुसी, उससे अमेरिकी लोकतंत्र कलंकित हुआ। वहां के निर्वाचित राष्ट्रपति जोसेफ आर. बाइडेन की टिप्पणी थी कि लोकतंत्र अप्रत्याशित रूप से खतरे में है। जो हुआ, यकीनन वह राजद्रोह है।' लोकतंत्र में ऐसे राजद्रोह का सूत्रधार कौन है? कमोबेश अमेरिकी लोकतंत्र पर, उसी के नागरिकों के द्वारा, ऐसा आक्रमण अभूतपूर्व है, लिहाजा शांत और लोकतांत्रिक जनता तथा उसके नए राष्ट्रपति ने इस हमले को 'घरेलू आतंकवाद' करार दिया है।

उन्मादी और हिंसक भीड़ के हाथों में किसके नाम के झंडे-बैनर थे? भीड़ के नारों की भाषा क्या थी? बेशक कुछ घंटों के लिए ही सही, लेकिन भीड़तंत्र ने लोकतंत्र को चित कर दिया। बेशक संसद और सांसद प्रत्यक्ष तौर पर ज़ख्मी नहीं हुए, पर हिंसक भीड़ ने लोकतांत्रिक पहरुओं को उनकी औकात दिखा दी। साफ़ दिखता रहा कि अमेरिका लोकतंत्र के मंदिर संसद का कितना सम्मान शेष है? सिर्फ सत्ता की सनक ने लोकतांत्रिक अमेरिका के इतिहास में 6 जनवरी की तारीख 'घरेलू आतंकवाद' के नाम दर्ज कर दी। यकीनन यह सनक व तानाशाह प्रवृत्ति ट्रंप की ही है, जो अब भी अमेरिकी राष्ट्रपति हैं। अमेरिका अपने संवैधानिक पदों और कुल लोकतंत्र का इतना सम्मान करता है कि ऐसा हमला कराने के बावजूद ट्रंप के खिलाफ महाभियोग या उनकी पदेन बर्खास्तगी के आसार नहीं हैं, क्योंकि 20 जनवरी को बाइडेन राष्ट्रपति पद की शपथ ले लेंगे और उसके बाद उन्हीं का प्रशासन अमेरिका की नियति तय करेगा। इतना अराजक विद्रोह कराने के बावजूद ट्रंप ने ट्वीट किया है कि वह शपथ ग्रहण समारोह में शामिल नहीं होंगे। अलबत्ता सत्ता का हस्तांतरण क्रमबद्ध और संवैधानिक तौर पर जरूर होगा। ऐसा बहिष्कार करीब 150 साल पहले हुआ था, जब डेमोक्रेट्स राष्ट्रपति एंड्रयू जाॅनसन चुनाव हार गए थे।

मंथन करती जनता

बहरहाल आज अमेरिकी जनता यह जरूर मंथन कर रही होगी कि ट्रंप को राष्ट्रपति चुनकर उसने भयंकर, लोकतांत्रिक गलती की। लोकतंत्र ट्रंप के संस्कारों में ही नहीं है। बेशक वह चार साल तक सबसे पुराने लोकतंत्र, सर्वशक्तिमान देश अमेरिका के राष्ट्रपति रहे, लेकिन वह कभी इस सर्वोच्च पद के पर्याय नहीं बन पाए। उन्हें मतलबी और अहंकारी करार दिया गया। तानाशाह तो बहुत नरम शब्द है। वाॅशिंगटन पोस्ट सरीखे पुराने और विख्यात अख़बार ने संपादकीय टिप्पणी की है कि राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने कार्यकाल के दौरान 29,000 से अधिक झूठ बोले। ट्रंप अमेरिका के लिए खतरा हैं। उन पर राजद्रोह का केस चलना चाहिए। ऐसी चर्चा अमेरिका की डेमोक्रेटिक पार्टी और कानूनी जानकारों में भी जारी है कि ट्रंप के खिलाफ दंगा भड़काने और राजद्रोह के आपराधिक केस चल सकते हैं, लेकिन अंतिम निर्णय नए राष्ट्रपति बाइडेन और अमेरिकी कांग्रेस को करना होगा।

बहरहाल इस हिंसक परिदृश्य के पीछे ट्रंप की कथित सोच थी कि किसी भी तरह वह राष्ट्रपति बने रहें। उन्होंने जनादेश को पलटने या खारिज कराने की याचिकाएं अदालतों में दाखिल कराईं अथवा सर्वोच्च अदालत में खुद गए। राज्य स्तर पर सरकारी अधिकारियों को हड़काने की कोशिश की और अपने लिए कुछ अतिरिक्त वोट का जुगाड़ करने का आदेश तक दिया, लेकिन ट्रंप की तमाम प्रयास नाकाम रहे।

जब अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव की गहमागहमी शुरू हुई थी, तब वाॅशिंगटन से मेरे एक मित्र नई दिल्ली आए थे। वह मूलतः भारतीय हैं, लेकिन कई दशकों से वहां व्यापार कर रहे हैं। अब वह और उनका परिवार अमेरिकी नागरिक ही हैं। हमारी चर्चा हुई, तो मित्र ने दो संभावनाएं साझा की थीं। एक, यदि अमेरिका में कोरोना वायरस ज्यादा नहीं फैला, तो ट्रंप फिर राष्ट्रपति बन सकते हैं। दो, इस बार के चुनाव में अमेरिका में गृहयुद्ध जैसे आसार हैं। करोड़ों नागरिक पिस्टल, रिवाॅल्वर और बड़े आकार के चाकू सरीखे हथियार खरीद रहे हैं। अमेरिकी इतिहास में ऐसा कभी नहीं देखा गया। मित्र ने यह भी बताया था कि यदि ट्र्ंप चुनाव हारते हैं, तो वह आसानी से डेमोक्रेट्स राष्ट्रपति की जीत स्वीकार नहीं करेंगे। कुछ भी हो सकता है। अमेरिकी संसद पर जो हमला किया गया, कमोबेश वह मित्र द्वारा साझा की गई संभावनाओं का ही खौफनाक सच है। यकीनन अब भी अमेरिकी लोकतंत्र फिर से उभरकर सामने आएगा, लेकिन ट्रंप ने अमेरिका का नस्लभेदी विभाजन कर दिया। ऐसे राजनीतिक प्रत्याशी के पक्ष में भी 7.42 करोड़ वोट डाले गए। यह भी अपने आप में कीर्तिमान है। यकीनन ये वोट रिपब्लिकन पार्टी के पक्ष में आए होंगे।

अब ट्रंप की भाषा बदल चुकी है। अब वह लोकतंत्र पर हमले की आलोचना कर रहे हैं। अमेरिका में करीब 208 सालों के बाद लोकतंत्र पर ऐसा हमला किया गया है। 1812 में युद्धों का दौर था। तब ब्रिटेन ने अमेरिकी संसद में आग लगा दी थी। वह 'घरेलू आतंकवाद' नहीं था। 1954, 1963, 1986 और 1998 के सालों में भी हमलावरों या प्रदर्शनकारियों ने संसद के सुरक्षाकर्मियों पर गोलियां चलाई थीं। वियतनाम ने तो 'कैपिटल हिल्स बिल्डिंग' के नीचे बम भी लगा दिया था, जिसे अमेरिकी सुरक्षाकर्मियों ने निष्प्रभावी किया, लेकिन विद्रोह ऐसी पराकाष्ठा तक नहीं पहुंचा था। इस बार तो अमेरिकी राष्ट्रपति आपातकाल और कर्फ्यू के बीच शपथ लेंगे, क्योंकि वाॅशिंगटन में आशंकाओं के मद्देनजर 15 दिनों तक यही कानूनी धाराएं लागू रहेंगी। संसद भवन को बंद कर दिया गया है। हालांकि संसद अपनी कार्यवाही कर चुकी है। बहरहाल, अमेरिका में लोकतंत्र के हिस्से ऐसा काला, शर्मनाक, विभाजनकारी और दर्दनाक दिन आएगा, इसकी कल्पना तक नहीं की गई थी, क्योंकि अमेरिका और शेष विश्व को उसके लोकतंत्र पर नाज रहा है।

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