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डाॅ. रहीस सिंह का लेख : ट्रंपवाद से निकलना चाहेगा अमेरिका

हालांकि 2015 से अब तक भारत-अमेरिका सम्बंधों में खासी गर्माहट बनी रही है। इस दौर में भारत ने अमेरिका के साथ कुल चार में से तीन फाउंडेशनल एग्रीमेंट्स किए-लिमोओ, कामकासा और बेका । दोनों देशों के बीच ‘2 प्लस 2’ वार्ता शुरू हुई और अमेरिका ने भारत को अपना ‘मेजर डिफेंस पार्टनर’ का दर्जा दिया, लेकिन क्या यह केवल भारत की जरूरत थी? स्पष्टतः नहीं, तो अमेरिका की या दोनों की, यह विचारणीय बिंदु है। बहरहाल दुनिया नई संभावनाओं के साथ नई चुनौतियों को देख रही है। नवबाजारवादी शक्ति के रूप में चीन स्थापित होना चाहेगा।

Inauguration of Joe Biden: जानें कौन हैं जो बाइडेन, जो 20 जनवरी को लेंगे अमेरिका के 46वें राष्ट्रपति के तौर पर शपथ
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जो बाइडेन

डाॅ. रहीस सिंह

गत 20 जनवरी को संयुक्त राज्य अमेरिका के 46वें राष्ट्रपति के रूप में जब जो बाइडेन शपथ ले रहे थे तब संभवतः संक्रमणकालीन विश्वव्यवस्था के बीच झांकती दुनिया बहुत से प्रश्नों को अपने में समेटे हुए इसे चुपचाप देख रही थी। उसके समक्ष बहुत सारे प्रश्न भी थे। पहला यह कि क्या अमेरिका अनिश्चितता की विदेश नीति से बाहर आ पाएगा? दूसरा- अमेरिका फर्स्ट की ट्रंपियन थ्योरी आगे भी जारी रहेगी या फिर कमजोर पड़ेगी ? तीसरा- क्या विश्व एक ध्रुवीयता के लिए नए सिरे से टकराव की ओर बढ़ेगा या फिर चुपचाप बहुपक्षीयता को स्वीकार कर लेगा और अमेरिका इसमें सहयोग करते हुए अपनी कप्तानी को बचाए रखने में सफल होगा? चौथा-अमेरिका और यूरोप के बीच की बाॅण्डिंग, जो पिछले कुछ वर्षों में कमजोर पड़ी है, क्या उसको नई ऊर्जा मिलेगी या फिर नई परिदृश्य में चीन बाजी मारेगा? पांचवा- मध्य पूर्व में पैदा हुए नए विभाजनों को व्यक्त करने वाली खाइयां और बढ़ेंगी और अमेरिका की इस मामले में भूमिका क्या होगी? अंतिम प्रश्न यह कि क्या अमेरिका वैश्विक संस्थाओं के प्रति अपने पिछले रवैया में बदलाव लाएगा? इन सबके अतिरिक्त एक और महत्वपूर्ण पहलू है जीयो-रणनीति और जीयो-इकोनाॅमी सम्बंधी, जहां दुनिया अभी फिलहाल अमेरिका को ही कप्तान के रूप में देखना चाहती है, चीन को नहीं। क्या अमेरिका इस मनोविज्ञान के अनुरूप चल पाएगा? एक विभाजित और कई प्रकार के अंतर्द्वंद्वों से सम्पन्न समाज और विभाजित लोकतंत्र के बीच दबा हुआ अमेरिका किस नजरिए से दुनिया को देखने की कोशिश करेगा?

जो बाइडेन ने शपथ लेने के साथ ही श्वेत वर्चस्व और नस्लवाद पर चिंता प्रकट की। इसमें कोई संशय नहीं कि इस समय अमेरिका समाज पिछड़ा और विभाजित सा है। उसे एक प्लेटफार्म पर लाकर समाजिक हितों के साथ संयुक्त करना बेहद मुश्किल कार्य होगा। एक बात और ऐसे आंतरिक विभाजन केवल लोकतंत्र को ही प्रभावित नहीं करते बल्कि देश के सामर्थ्य पर भी प्रश्न चिह्न लगा देते हैं। एक और बात, यह स्थिति दर्शाती है कि अमेरिका फर्स्ट का नारा खोखला था क्योंकि ये दोनों एक-दूसरे के पूरक नहीं हो सकते। इस स्थिति में अमेरिका को समरसता के नए सूत्र तलाशने होंगे, अन्यथा कैपिटल हिल की घटना आने वाले समय में अमेरिका के मौलिक चरित्र को बदलने वाली साबित हो सकती है। ऐसा कुछ दृष्टिकोणों से कहा जा सकता है। प्रथम- ट्रंपियन डेमोक्रेसी ने देश के अंदर जिन विभाजनों को जन्म दिया है, उसके राष्ट्रवादी नजरिए से कुछ बेहतर पक्ष हो सकते हैं, लेकिन खतरे कहीं अधिक गंभीर हैं। ये खतरे इतने गंभीर हैं कि यदि इनसे निपटा नहीं गया तो अमेरिकी लोकतंत्र पतन की ओर चल पड़ेगा। इन खतरों में सबसे बड़ा तो पोस्ट ट्रुथ संबंधी है, जिसने ट्रंपियन थ्योरी के चारों ओर मजबूत दीवारें निर्मित कर दीं, ताकि वह ठोस रूप धारण कर सके। इन का टूटना जरूरी है।

द्वितीय-वर्तमान में वैश्विक अर्थव्यवस्था में अनिश्चितता मौजूद है, जिसके चलते निराशावादी वातावरण है। यह बाइडेन के अमेरिका की राह में विचलन पैदा कर सकता है। इस स्थिति में अमेरिका को रवैया बदलना होगा। ध्यान रहे कि नवबाजारवादी व्यवस्था का अगुआ चीन है और वह किसी भी कीमत पर इसकी बागडोर अमेरिका के हाथ में रहने नहीं देना चाहता है। वैसे इसकी बागडोर अमेरिका के हाथ में है भी नहीं, लेकिन नेतृत्व के संबंध में आगे की राह जीयो इकोनाॅमी तय करेगी जो वर्तमान समय में चीनी गाइडलाइंस पर चलती हुई दिख रही है, इसलिए किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले वैश्विक कूटनीति को नए एवं संभावित समीकरणों को समझने की जरूरत होगी। इसके साथ ही बाइडेन को आर्थिक कुचक्रों से घिरे अमेरिका को अनिश्चितता और चुनौतियों की परिधियों से बाहर लाना होगा ताकि फ्रेंड्स आफ बीजिंग बनने से बचे रहें। हालांकि बाइडेन ने पद ग्रहण करने के साथ ही एक ही झटके में उन 15 नीतियों या फैसलों को जिन्हें पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने लागू किया था, को खत्म कर नया संदेश दिया है। लेकिन अभी और बहुत से कड़े कदम उठाने की जरूरत होगी।

जो बाइडेन का यह मानकर चलना होगा कि यदि चीन वैश्विक पटल पर अपनी मनमानी करने में सफल होता रहेगा तो इसका सीधा संदेश यह जाएगा कि अमेरिका का असर खत्म हो रहा है। वैसे जिस तरह से चीन ने हांगकांग के लोकतंत्रवादियों के खिलाफ कार्रवाई की है और भारत के साथ सीमा पर तनाव...आदि से साबित होता है कि चीन नियम-कायदों पर आधारित व्यवस्था को सम्मान नहीं देता। इस लिहाज से चीन का आगे निकलने की रणनीति की सफलता अमेरिकी छवि पर दाग नहीं लगाएगी बल्कि पूरी विश्व व्यवस्था का नेतृत्व चीन के हवाले करने में कामयाब हो जाएगी। इसके लिए अमेरिका को केवल सचेत ही रहने की नहीं बल्कि रणनीति बनाने की आवश्यकता है। हां यह प्रश्न अहम जरूर है कि यह रणनीति बनेगी कैसे?

अमेरिका-चीन में टकराव की प्रकृति

इस दिशा में आगे बढ़ने से पूर्व यह देखना होगा कि अमेरिका और चीन के बीच टकराव किस प्रकार का है। सामान्य तौर पर तो यह टकराव ट्रेड, टैरिफ और टेक्नोलाॅजी को लेकर है। लेकिन यह टकराव का असल चेहरा नहीं है, असल में तो यह बदलती विश्वव्यवस्था में भावी नेतृत्व के लिए हो रही प्रतिस्पर्धा का हिस्सा है। इसकी शुरुआत वर्ष 2008 से ही हो गई थी जब अमेरिका में सब-प्राइम संकट आया था और इकोनाॅमिक लीडरशिप की शिफ्टिंग की चर्चा शुरू हुई थी। दूसरा यह कि अमेरिका फारस की खाड़ी या फिर सम्पूर्ण मध्य-पूर्व में और हिन्द-प्रशांत में पाॅलिसी रीसेट के दौर से गुजर रहा है। इसमें उसकी न दिशा तय है और नीति। यही स्थिति दक्षिण एशिया को लेकर है। इन दोनों क्षेत्रों में भारत की भूमिका निर्णायक है, लेकिन अमेरिका एक तरफ हिन्द-प्रशांत में भारत के साथ मिलकर 'स्ट्रैटेजिक ट्रैंगल' बनाता है तो दूसरी तरफ चीन के साथ बेल्ट एंड रोड ज्वांइट फंड का निर्माण करता है। उसे भारत के समक्ष अपनी तस्वीर साफ रखने की जरूरत है। हालांकि 2015 से अब तक भारत-अमेरिका सम्बंधों में खासी गर्माहट बनी रही है। इस दौर में भारत ने अमेरिका के साथ कुल चार में से तीन फाउंडेशनल एग्रीमेंट्स किए-लिमोओ, कामकासा और बेका । दोनों देशों के बीच '2 प्लस 2' वार्ता शुरू हुई और अमेरिका ने भारत को अपना 'मेजर डिफेंस पार्टनर' का दर्जा दिया, लेकिन क्या यह केवल भारत की जरूरत थी? स्पष्टतः नहीं, तो अमेरिका की या दोनों की, यह विचारणीय बिंदु है।

बहरहाल दुनिया नई संभावनाओं के साथ नई चुनौतियों को सामने देख रही है। इनके बीच नवबाजारवादी और नवसाम्राज्यवादी शक्ति के रूप में चीन स्थापित होना चाहेगा। अमेरिका को यदि चीन को रोकना है, जो कि अनिवार्य है, तो भारत के साथ सम्मानजनक सहयोगी के तौर पर चलना होगा।

शपथ के बाद परिवर्तन की नींव

अमेरिकी राष्ट्रपति पद की शपथ लेने के कुछ ही देर बाद जो बाइडेन ने पूर्ववर्ती डोनाल्ड ट्रंप के कई अहम फैसलों को पलटने वाले 17 कार्यकारी आदेशों पर हस्ताक्षर किए। इनमें पेरिस जलवायु समझौते से दोबारा जुड़ने, डब्ल्यूएचओ से अमेरिका के अलग होने की प्रक्रिया पर रोक, मैक्सिको सीमा पर दीवार निर्माण के काम पर भी रोक, सात मुस्लिम देशों के नारिकों की यूएस यात्रा पर लगाए गए प्रतिबंध को हटाना और एच-1 बी वीजा नियमों में ढील आदि अहम फैसले हैं। ये फैसले अमेरिका में परिवर्तन की नींव हैं। अमेरिका के नए रक्षा मंत्री जनरल (अवकाश प्राप्त) लॉयड ऑस्टिन पहले ही कह चुके हैं कि अमेरिका भारत के साथ रक्षा साझेदारी जारी रखेगा। बाइडेन की शपथ से पहले ही उनके थिंक टैंक ने चीन व पाक को एक साथ चेतावनी देकर संकेत दे दिया था कि अमेरिका के लिए भारत अहम रहेगा। कहा कि लद्दाख में भारतीय जमीन पर नजरें गड़ाए बैठे चीन के खिलाफ अमेरिकी सख्‍ती ट्रंप प्रशासन की तरह से ही जारी रहेगी। उसने पाकिस्‍तान को भी लश्‍कर-ए-तैयबा और अन्‍य भारत विरोधी आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए आगाह किया है। पीएम नरेंद्र मोदी ने बाइडेन को बधाई दी है। जो ने कहा है दोनों देश मिलकर काम करेंगे।

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